केजरीवाल बने तानाशाह! 'आप' के 7 सांसदों के इस्तीफे पर वीरेंद्र सचदेवा का तीखा प्रहार
सारांश
Key Takeaways
- आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों ने 24 अप्रैल 2025 को पार्टी से इस्तीफे और भाजपा में शामिल होने की घोषणा की।
- दिल्ली भाजपा अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा ने अरविंद केजरीवाल को 'तानाशाह' करार देते हुए पार्टी में भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग का आरोप लगाया।
- इस्तीफा देने वालों में 'आप' के संगठन महासचिव संदीप पाठक, राघव चड्ढा और स्वाति मालीवाल शामिल हैं।
- भाजपा प्रवक्ता प्रवीण शंकर कपूर ने कहा कि इन नेताओं ने अपने जीवन के 15 वर्ष 'आप' को दिए, फिर भी उन्हें 'गद्दार' कहा गया।
- सचदेवा ने आरोप लगाया कि केजरीवाल पंजाब के किसानों और उद्योगों का शोषण कर गुजरात व गोवा में राजनीतिक विस्तार कर रहे थे।
- 'आप' के 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों का एक साथ पार्टी छोड़ना पार्टी के इतिहास का सबसे बड़ा संगठनात्मक झटका माना जा रहा है।
नई दिल्ली, 24 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। आम आदमी पार्टी (आप) के सात राज्यसभा सांसदों द्वारा पार्टी से इस्तीफे और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने की घोषणा के बाद दिल्ली भाजपा अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा ने 24 अप्रैल 2025 को 'आप' संयोजक अरविंद केजरीवाल पर तीखा हमला बोला और उन्हें सीधे तौर पर 'तानाशाह' करार दिया। यह घटनाक्रम 'आप' के लिए संगठनात्मक रूप से सबसे बड़े झटकों में से एक माना जा रहा है।
सचदेवा का सीधा हमला — 'संयोजक से तानाशाह तक का सफर'
वीरेंद्र सचदेवा ने कहा कि अरविंद केजरीवाल ने राजनीतिक बदलाव का वादा करके आम आदमी पार्टी की स्थापना की थी, लेकिन वे धीरे-धीरे पार्टी के संयोजक से पार्टी तानाशाह में तब्दील हो गए।
सचदेवा ने आरोप लगाया कि केजरीवाल ने सत्ता का दुरुपयोग करते हुए पार्टी को भ्रष्टाचार के दलदल में धकेल दिया। उनके अनुसार, शांति भूषण से लेकर राघव चड्ढा तक, पार्टी के सभी प्रमुख संस्थापक सदस्यों ने एक-एक करके केजरीवाल से दूरी बना ली है — यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक स्पष्ट पैटर्न है।
पंजाब के शोषण और नशे की राजनीति पर गंभीर आरोप
दिल्ली भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि केजरीवाल ने पिछले 10 वर्षों में दिल्ली में एक 'शोषण का शासन मॉडल' चलाया, जिसका उद्देश्य केवल अपने राजनीतिक आधार को विस्तार देना था।
सचदेवा ने यह भी आरोप लगाया कि पिछले चार से अधिक वर्षों से केजरीवाल गुजरात और गोवा में राजनीतिक विस्तार के लिए पंजाब के उद्योगों और किसानों का शोषण कर रहे हैं। इसके साथ ही, पंजाब के युवाओं को नशे की लत की ओर धकेलने का भी गंभीर आरोप उन्होंने लगाया।
यह आरोप ऐसे समय में और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जब पंजाब में नशे की समस्या पहले से ही एक बड़ा सामाजिक संकट बनी हुई है और विपक्ष लगातार 'आप' सरकार को इस मुद्दे पर घेरता रहा है।
संदीप पाठक के इस्तीफे ने सबको चौंकाया
सचदेवा ने कहा कि इस्तीफा देने वाले सात सांसदों में 'आप' के संगठन महासचिव संदीप पाठक का नाम सबसे अधिक चौंकाने वाला है। उन्होंने कहा कि संगठन महासचिव किसी भी पार्टी की वैचारिक नींव के संरक्षक होते हैं।
सचदेवा के अनुसार, संदीप पाठक का इस्तीफा इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आम आदमी पार्टी और उसके संयोजक अरविंद केजरीवाल दोनों अपने मूल वैचारिक मार्ग से पूरी तरह भटक चुके हैं। उन्होंने केजरीवाल से आत्ममंथन और अपनी कार्यशैली की समीक्षा करने की अपील की।
संजय सिंह की प्रतिक्रिया पर भाजपा का पलटवार
दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता प्रवीण शंकर कपूर ने कहा कि जब 'आप' सांसद संजय सिंह ने सात राज्यसभा सांसदों के पार्टी छोड़ने के बाद मीडिया को संबोधित किया, तो उनके चेहरे पर निराशा और बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी।
कपूर ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि संजय सिंह ने राघव चड्ढा, संदीप पाठक और स्वाति मालीवाल को 'गद्दार' कहा, जबकि इन तीनों युवा नेताओं ने अपने जीवन के 15 वर्ष 'आप' और अरविंद केजरीवाल को समर्पित किए थे। उन्होंने कहा कि इन नेताओं का इस तरह अपमान करना पार्टी की आंतरिक संस्कृति को उजागर करता है।
राजनीतिक विश्लेषण — 'आप' के लिए संकट की घड़ी
गौरतलब है कि 'आप' के 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 का एक साथ पार्टी छोड़ना कोई सामान्य घटना नहीं है। यह वही पार्टी है जो 2012 में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की कोख से जन्मी थी और जिसने 2015 में दिल्ली की 70 में से 67 सीटें जीतकर इतिहास रचा था।
पिछले कुछ वर्षों में केजरीवाल की गिरफ्तारी, दिल्ली आबकारी नीति विवाद, और 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में भारी हार के बाद पार्टी पहले से ही दबाव में थी। ऐसे में सात वरिष्ठ सांसदों का एक साथ पार्टी छोड़ना पार्टी के भीतर गहरी亀दरारों का संकेत देता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम आगामी राज्यसभा समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है और भाजपा को उच्च सदन में अपनी स्थिति मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अरविंद केजरीवाल इस संगठनात्मक संकट से कैसे निपटते हैं और क्या 'आप' के अन्य नेता भी पार्टी छोड़ने का फैसला करते हैं।