उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन का गयाजी में संदेश: वोट से चुनाव, भरोसा निस्वार्थ सेवा से
सारांश
मुख्य बातें
उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने 11 जुलाई 2026 को गयाजी, बिहार में बिहार इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन एंड रूरल डेवलपमेंट (BIPARD) में आयोजित बिहार विधानसभा के 18वें सत्र के सदस्यों के लिए दो दिवसीय ओरिएंटेशन-सह-प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने विधायकों को स्पष्ट संदेश दिया कि चुनाव वोटों से जीते जाते हैं, लेकिन लोगों का सम्मान और भरोसा निस्वार्थ सेवा से अर्जित होता है, सत्ता से नहीं।
कार्यक्रम का उद्देश्य और पहल की सराहना
बिहार विधानसभा और बिहार विधान परिषद के पीठासीन अधिकारियों तथा लोकसभा सचिवालय के पार्लियामेंट्री रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसीज (PRIDE) की इस पहल की सराहना करते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम विधायकों को उनकी संवैधानिक जिम्मेदारियाँ प्रभावी ढंग से निभाने के लिए सक्षम बनाते हैं और लोकतांत्रिक संस्थाओं को सुदृढ़ करते हैं।
उन्होंने स्पीकर का धन्यवाद करते हुए कहा कि गयाजी में इस आयोजन ने प्रतीकात्मक रूप से पटना को गयाजी तक पहुँचाने का काम किया है।
लोकतंत्र की जड़ें और बिहार की विरासत
वैशाली की प्राचीन गणतंत्रात्मक परंपराओं का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत में लोकतंत्र की जड़ें अत्यंत गहरी हैं और इसे सही मायनों में लोकतंत्र की जननी माना जाता है। उन्होंने बिहार को भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का मार्गदर्शक राज्य बताते हुए विधायकों से इस गौरवशाली विरासत को अक्षुण्ण रखने का आग्रह किया।
भगवान बुद्ध की धरती से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने कहा कि जन-प्रतिनिधि शासन करने के लिए नहीं, बल्कि सेवा करने के लिए चुने जाते हैं — यही सच्चे ज्ञान की पहचान है।
विकसित बिहार और रोज़गार का आह्वान
राधाकृष्णन ने इस बात पर विशेष बल दिया कि विकसित भारत की परिकल्पना विकसित बिहार के बिना पूरी नहीं हो सकती। उन्होंने विधायकों से आह्वान किया कि वे ऐसे अवसर सृजित करें जो बिहार को रोज़गार और विकास का केंद्र बनाएँ तथा अन्य राज्यों से प्रवासी श्रमिकों को आकर्षित करें।
उन्होंने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए संपूर्ण क्रांति आंदोलन से अपने जुड़ाव का स्मरण कराया और कहा कि इसी आंदोलन ने उनकी राजनीतिक यात्रा की नींव रखी। स्वतंत्रता संग्राम और आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा में बिहार की अग्रणी भूमिका को भी उन्होंने रेखांकित किया।
संसदीय प्रक्रियाएँ और तकनीक का महत्व
उपराष्ट्रपति ने प्रश्नकाल, शून्यकाल और कार्य मंत्रणा समिति के महत्व को रेखांकित करते हुए सदस्यों से विधायी कामकाज को सुचारू और उत्पादक ढंग से संचालित करने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि ये संसदीय प्रक्रियाएँ विधायकों को दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर अपने क्षेत्र की जनता के मुद्दे उठाने का अवसर देती हैं।
सदस्यों को निरंतर अध्ययन और तैयारी की सलाह देते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि विधायी प्रक्रियाओं, समिति प्रणालियों और संसदीय परंपराओं की गहरी समझ अपरिहार्य है। साथ ही उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग (NLP) जैसी उभरती तकनीकों को अपनाने पर भी ज़ोर दिया ताकि विधायी कामकाज अधिक कुशल, पारदर्शी और नागरिक-केंद्रित बन सके।
धैर्य, लगन और नेतृत्व का संदेश
राजनीति की तुलना टेस्ट क्रिकेट से करते हुए उन्होंने कहा कि सफलता धैर्य, लगन और सही अवसरों को पहचानने से मिलती है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजनीतिक सफर का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि मात्र सात दिन की सरकार का नेतृत्व करने के बावजूद वे आगे चलकर बिहार के सबसे लंबे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री बने — यह संघर्ष और धैर्य की जीत है।
उन्होंने कहा कि नेतृत्व की असली पहचान सदन के भीतर मिलने वाली तालियाँ नहीं, बल्कि सदन के बाहर जनता में जगाया गया भरोसा है। उनके अनुसार, सोच-समझकर किया गया हस्तक्षेप किसी नीति को बदल सकता है, सुविचारित कानून पीढ़ियों का भविष्य संवार सकता है और सहानुभूतिपूर्ण निर्णय अनगिनत नागरिकों में आशा का संचार कर सकता है।