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बड़ा फैसला: पश्चिम बंगाल SIR मामले में 65 चुनाव अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली राहत

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बड़ा फैसला: पश्चिम बंगाल SIR मामले में 65 चुनाव अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली राहत

सारांश

पश्चिम बंगाल SIR मामले में 65 चुनाव ड्यूटी अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली। CJI सूर्यकांत ने अपीलीय प्राधिकरण जाने का निर्देश दिया। जो अधिकारी चुनाव करा रहे हैं, वे खुद मतदान से वंचित हैं — यह विडंबना लोकतंत्र पर सवाल उठाती है।

मुख्य बातें

सुप्रीम कोर्ट ने 24 अप्रैल को 65 चुनाव ड्यूटी अधिकारियों की याचिका पर सुनवाई से इनकार किया।
पश्चिम बंगाल SIR प्रक्रिया में इन अधिकारियों के नाम बिना कारण बताओ नोटिस के मतदाता सूची से हटाए गए।
CJI सूर्यकांत ने कहा कि ऐसे मामलों में अपीलीय प्राधिकरण अधिक उपयुक्त मंच है।
वरिष्ठ अधिवक्ता एमआर शमशाद ने इसे प्रथमदृष्टया मनमाना और असंवैधानिक बताया।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देश के अनुसार, 21 या 27 अप्रैल तक अपील स्वीकृत होने पर ही मतदान की अनुमति मिलेगी।
अधिकारियों को अब अपीलीय ट्रिब्यूनल में जाना होगा, जिससे तत्काल राहत की संभावना कम है।

नई दिल्ली, 24 अप्रैल: पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को 65 चुनाव ड्यूटी अधिकारियों की याचिका पर सुनवाई से स्पष्ट इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को पहले अपीलीय प्राधिकरण का दरवाजा खटखटाना होगा।

क्या है पूरा मामला?

पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा चलाई जा रही SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया के दौरान सैकड़ों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए। इन्हीं में 65 ऐसे अधिकारी भी शामिल हैं जो स्वयं चुनाव ड्यूटी पर तैनात हैं। इन अधिकारियों ने आरोप लगाया कि उनके EPIC नंबर बिना किसी पूर्व सूचना या कारण बताओ नोटिस के ड्यूटी आदेशों से हटा दिए गए।

विडंबना यह है कि जो अधिकारी दूसरों को मतदान कराने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं, वे स्वयं अपने मताधिकार से वंचित हो गए। इस स्थिति को याचिकाकर्ताओं के वकील ने प्रथमदृष्टया मनमाना और असंवैधानिक करार दिया।

सुप्रीम कोर्ट का रुख और मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में विस्तृत तथ्यात्मक जांच की आवश्यकता होती है, जो सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर संभव नहीं है। अदालत ने कहा कि अपीलीय ट्रिब्यूनल इस प्रकार के मामलों की गहन सुनवाई के लिए अधिक उपयुक्त मंच है।

शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ताओं को पहले उपलब्ध वैधानिक उपायों का इस्तेमाल करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल अपील लंबित रहने से मतदान का अधिकार स्वतः नहीं मिलेगा।

वरिष्ठ अधिवक्ता की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट एमआर शमशाद ने पीठ के समक्ष दलील दी कि यह स्थिति पूरी तरह विरोधाभासी है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति चुनाव प्रक्रिया को संचालित कर रहा है, वही मतदान के अधिकार से वंचित है।

एडवोकेट शमशाद ने यह भी तर्क दिया कि बिना कारण बताओ नोटिस के नाम हटाना न केवल प्रक्रियागत रूप से गलत है, बल्कि यह संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन भी है। हालांकि, अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए भी याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया।

पूर्व में सुप्रीम कोर्ट का निर्देश और आगे की राह

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश दिया था कि जिन व्यक्तियों की अपील 21 या 27 अप्रैल तक स्वीकार हो जाती है, उन्हें संबंधित चरण में मतदान की अनुमति दी जाए। यह निर्देश उन नागरिकों के लिए एक सीमित राहत थी जिनके नाम SIR प्रक्रिया में हटाए गए थे।

अब 65 चुनाव ड्यूटी अधिकारियों को अपनी शिकायत के समाधान के लिए अपीलीय प्राधिकरण के समक्ष जाना होगा। यह प्रक्रिया समय लेने वाली हो सकती है, जिससे आगामी मतदान चरणों में उनके मतदान की संभावना अनिश्चित बनी हुई है।

व्यापक संदर्भ: SIR विवाद और लोकतांत्रिक निहितार्थ

पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया को लेकर पहले से ही राजनीतिक विवाद चल रहा है। विपक्षी दलों का आरोप है कि इस प्रक्रिया में मनमाने ढंग से नाम हटाए जा रहे हैं, जबकि चुनाव आयोग इसे नियमित प्रशासनिक कार्यवाही बताता है। गौरतलब है कि जब चुनाव ड्यूटी पर तैनात अधिकारी ही मतदाता सूची से बाहर हो जाएं, तो यह पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है।

यह मामला इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि भारत के चुनावी इतिहास में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो जब चुनाव कराने वाले अधिकारी स्वयं मतदाता सूची से बाहर हो गए हों। यह घटना SIR प्रक्रिया की पारदर्शिता और उसके क्रियान्वयन पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।

आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अपीलीय प्राधिकरण इन मामलों में कितनी तेजी से निर्णय लेता है और क्या इन अधिकारियों को अगले मतदान चरण से पहले न्याय मिल पाता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

वे खुद लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित हैं। सुप्रीम कोर्ट का अपीलीय मंच की ओर भेजना प्रक्रियागत रूप से सही हो सकता है, लेकिन यह उस तात्कालिकता को नजरअंदाज करता है जो चुनाव के ठीक पहले इन अधिकारियों को झेलनी पड़ रही है। मुख्यधारा की मीडिया इस खबर को सिर्फ कोर्ट रिपोर्टिंग तक सीमित कर रही है, जबकि असली सवाल यह है कि SIR प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही की व्यवस्था कहां है?
RashtraPress
27 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पश्चिम बंगाल SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने 65 चुनाव ड्यूटी अधिकारियों की याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। CJI सूर्यकांत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता पहले अपीलीय प्राधिकरण के समक्ष अपनी शिकायत दर्ज करें।
SIR प्रक्रिया क्या है और इसमें नाम क्यों हटाए गए?
SIR यानी Special Intensive Revision एक प्रक्रिया है जिसके तहत चुनाव आयोग मतदाता सूची की समीक्षा और सफाई करता है। पश्चिम बंगाल में इस प्रक्रिया के दौरान कई नागरिकों और चुनाव अधिकारियों के नाम बिना पूर्व सूचना के हटा दिए गए।
क्या चुनाव ड्यूटी पर तैनात अधिकारी अब मतदान कर सकते हैं?
फिलहाल नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल अपील लंबित रहने से मतदान का अधिकार नहीं मिलेगा। जिनकी अपील 21 या 27 अप्रैल तक स्वीकार होगी, उन्हें ही संबंधित चरण में मतदान की अनुमति दी जाएगी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में क्या दलीलें दी गईं?
वरिष्ठ अधिवक्ता एमआर शमशाद ने कहा कि बिना कारण बताओ नोटिस के नाम हटाना मनमाना है और संविधान के विरुद्ध है। उन्होंने यह भी कहा कि जो अधिकारी चुनाव करा रहे हैं, वे खुद मतदान से वंचित हैं।
अब इन अधिकारियों के पास क्या विकल्प बचे हैं?
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार, इन 65 अधिकारियों को अब संबंधित अपीलीय ट्रिब्यूनल में अपनी शिकायत दर्ज करनी होगी। वहां उनके मामले की विस्तार से सुनवाई की जाएगी।
राष्ट्र प्रेस
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