3 अक्टूबर 2026
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ओलिव रिडले संरक्षण: WII-अदाणी फाउंडेशन की पहले वर्ष की रिपोर्ट ओडिशा में जारी

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ओलिव रिडले संरक्षण: WII-अदाणी फाउंडेशन की पहले वर्ष की रिपोर्ट ओडिशा में जारी

सारांश

करीब 15 वर्षों के अंतराल के बाद ओडिशा में ओलिव रिडले कछुओं की सैटेलाइट ट्रैकिंग फिर शुरू हुई है। WII, धामरा पोर्ट और अदाणी फाउंडेशन की साझेदारी में चल रही इस तीन वर्षीय शोध पहल की पहले वर्ष की रिपोर्ट जारी हुई — जो वैज्ञानिक आधार पर संरक्षण नीति को नई दिशा देने का प्रयास है।

मुख्य बातें

ओडिशा सरकार ने 3 अक्टूबर 2026 को भुवनेश्वर में ओलिव रिडले कछुओं पर तीन वर्षीय शोध पहल की पहले वर्ष की रिपोर्ट जारी की।
अध्ययन का नेतृत्व भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने ओडिशा वन्यजीव संगठन , धामरा पोर्ट कंपनी लिमिटेड (DPCL) और अदाणी फाउंडेशन के साथ मिलकर किया।
यह अध्ययन करीब 15 वर्षों के अंतराल के बाद ओडिशा में ओलिव रिडले की सैटेलाइट ट्रैकिंग की पुनः शुरुआत को दर्शाता है।
ओडिशा के गहिरमाथा (केंद्रापड़ा) और रुशिकुल्या (गंजाम) विश्व के सर्वाधिक महत्वपूर्ण ओलिव रिडले प्रजनन स्थलों में से हैं।
ओलिव रिडले वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के तहत भारत में सर्वोच्च कानूनी संरक्षण प्राप्त प्रजाति है।
अदाणी फाउंडेशन ओडिशा के 7 जिलों के 283 गाँवों में सक्रिय है।

ओडिशा सरकार ने 3 अक्टूबर 2026 को भुवनेश्वर में ओलिव रिडले कछुओं पर चल रही तीन वर्षीय शोध पहल के पहले वर्ष की रिपोर्ट सार्वजनिक की। इस अध्ययन का संचालन भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने ओडिशा वन्यजीव संगठन, धामरा पोर्ट कंपनी लिमिटेड (DPCL) — जो अदाणी पोर्ट्स की अनुषंगी इकाई है — और अदाणी फाउंडेशन के सहयोग से किया है। यह रिपोर्ट करीब 15 वर्षों के अंतराल के बाद ओडिशा में ओलिव रिडले कछुओं की सैटेलाइट ट्रैकिंग की पुनः शुरुआत को रेखांकित करती है।

अध्ययन की कार्यप्रणाली

रिपोर्ट में सैटेलाइट टेलीमेट्री, नौका-आधारित सर्वेक्षण और तटरेखा विश्लेषण जैसी बहु-आयामी वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग किया गया है। इनके माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया है कि ओलिव रिडले कछुए ओडिशा के तटीय जल और घोंसला-निर्माण क्षेत्रों का किस प्रकार उपयोग करते हैं। WII के संकटग्रस्त प्रजाति प्रबंधन विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आर. सुरेश कुमार ने बताया कि इस साझेदारी ने कछुओं की आवाजाही के पैटर्न और आवास उपयोग पर नई जानकारियाँ जुटाने में सहायता की है।

डॉ. कुमार ने कहा, 'ये निष्कर्ष साक्ष्य-आधारित संरक्षण योजना के लिए वैज्ञानिक आधार प्रदान करते हैं। हम अधिक कछुओं की ट्रैकिंग जारी रखेंगे, ताकि एक मज़बूत डेटासेट तैयार किया जा सके, जो प्रबंधन रणनीतियों और दीर्घकालिक संरक्षण में मदद कर सके।'

रिपोर्ट जारी करने का अवसर

वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री गणेश राम सिंह खुंटिया ने आधिकारिक रूप से यह रिपोर्ट जारी की। कार्यक्रम में अदाणी फाउंडेशन की चेयरपर्सन डॉ. प्रीति अदाणी और फाउंडेशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. अभिषेक लखटकिया भी उपस्थित रहे।

डॉ. प्रीति अदाणी ने कहा, 'ओलिव रिडले ओडिशा की प्राकृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसकी सुरक्षा के लिए इसके सफर को गहराई से समझना जरूरी है।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी के नेतृत्व में ओडिशा सरकार का सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान इस तरह के अग्रणी कार्य के लिए मज़बूत आधार प्रदान करता है।

ओडिशा में ओलिव रिडले का महत्व

ओडिशा में ओलिव रिडले कछुओं के विश्व के कुछ सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रजनन एवं अंडे देने वाले स्थल हैं। केंद्रापड़ा जिले का गहिरमाथा और गंजाम जिले का रुशिकुल्या इनमें प्रमुख हैं, जहाँ हर वर्ष बड़ी संख्या में कछुए सामूहिक रूप से अंडे देने पहुँचते हैं। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के अंतर्गत संरक्षित यह प्रजाति भारत में कानूनी संरक्षण का सर्वोच्च स्तर प्राप्त करती है। गौरतलब है कि इस प्रजाति की आबादी पर मानवीय गतिविधियों, मत्स्य पालन और तटीय विकास का दीर्घकालिक दबाव रहा है।

अदाणी फाउंडेशन की ओडिशा में भूमिका

अदाणी फाउंडेशन करीब एक दशक से ओडिशा में सक्रिय है और इसके कार्यक्रम राज्य के सात जिलों के 283 गाँवों तक पहुँच चुके हैं। फाउंडेशन की गतिविधियों में शिक्षा एवं छात्रवृत्ति, वेलनेस सेंटर, मोबाइल मेडिकल यूनिट, विशेष स्वास्थ्य शिविर तथा किसानों, महिलाओं और युवाओं के लिए आजीविका कार्यक्रम शामिल हैं। इसके अलावा फाउंडेशन ने सड़क, पेयजल, स्वच्छता और ग्रामीण विद्युतीकरण जैसी बुनियादी सामुदायिक सुविधाओं के विकास में भी सहयोग दिया है।

आगे की राह

शोध दल ने संकेत दिया है कि अध्ययन के शेष दो वर्षों में और अधिक कछुओं को ट्रैक किया जाएगा, जिससे एक व्यापक डेटासेट तैयार होगा। यह डेटा भविष्य में संरक्षण नीति-निर्माण और तटीय प्रबंधन रणनीतियों को वैज्ञानिक दिशा देने में सहायक होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

WII-अदाणी फाउंडेशन की ओलिव रिडले शोध पहल क्या है?
यह ओडिशा में ओलिव रिडले कछुओं पर चल रही तीन वर्षीय शोध परियोजना है, जिसका नेतृत्व भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) कर रहा है। इसमें ओडिशा वन्यजीव संगठन, धामरा पोर्ट कंपनी लिमिटेड और अदाणी फाउंडेशन सहयोगी हैं। अध्ययन में सैटेलाइट टेलीमेट्री, नौका-सर्वेक्षण और तटरेखा विश्लेषण के ज़रिए कछुओं की आवाजाही और आवास उपयोग को समझा जा रहा है।
ओडिशा में ओलिव रिडले कछुओं के प्रमुख घोंसला-निर्माण स्थल कौन-से हैं?
ओडिशा में केंद्रापड़ा जिले का गहिरमाथा और गंजाम जिले का रुशिकुल्या विश्व के सबसे महत्वपूर्ण ओलिव रिडले प्रजनन स्थलों में गिने जाते हैं। यहाँ हर वर्ष हज़ारों कछुए सामूहिक रूप से अंडे देने पहुँचते हैं।
ओलिव रिडले कछुए को भारत में क्या कानूनी संरक्षण प्राप्त है?
ओलिव रिडले कछुआ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के तहत संरक्षित है, जो भारत में किसी प्रजाति को दिए जाने वाले कानूनी संरक्षण का सर्वोच्च स्तर है। इस श्रेणी में आने वाली प्रजातियों के शिकार या व्यापार पर कड़ी रोक है।
15 वर्षों के अंतराल के बाद सैटेलाइट ट्रैकिंग फिर क्यों शुरू की गई?
WII के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आर. सुरेश कुमार के अनुसार, कछुओं की आवाजाही के पैटर्न और आवास उपयोग पर अद्यतन डेटा की कमी थी, जो साक्ष्य-आधारित संरक्षण नीति के लिए आवश्यक है। नई साझेदारी ने तकनीकी और वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए, जिससे यह अध्ययन संभव हो सका।
अदाणी फाउंडेशन ओडिशा में और क्या कार्य करता है?
अदाणी फाउंडेशन करीब एक दशक से ओडिशा के 7 जिलों के 283 गाँवों में सक्रिय है। इसके कार्यक्रमों में शिक्षा, छात्रवृत्ति, स्वास्थ्य सेवाएँ (मोबाइल मेडिकल यूनिट सहित), किसानों-महिलाओं-युवाओं के लिए आजीविका कार्यक्रम तथा सड़क, पेयजल और ग्रामीण विद्युतीकरण जैसी बुनियादी सुविधाओं का विकास शामिल है।
राष्ट्र प्रेस
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