14 जुलाई 2026
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आयुष मंत्रालय की WHO-ICHI वर्कशॉप: आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी को मिलेगी वैश्विक डिजिटल पहचान

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आयुष मंत्रालय की WHO-ICHI वर्कशॉप: आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी को मिलेगी वैश्विक डिजिटल पहचान

सारांश

भारत की सदियों पुरानी चिकित्सा पद्धतियाँ अब वैश्विक डिजिटल स्वास्थ्य मानचित्र पर अपनी जगह बनाने की कगार पर हैं। आयुष मंत्रालय की WHO-ICHI कार्यशाला आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी को अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य सूचना विज्ञान मानकों से जोड़ने की दिशा में एक निर्णायक नीतिगत प्रयास है।

मुख्य बातें

आयुष मंत्रालय ने 14 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में WHO-ICHI फ्रेमवर्क पर 5 दिवसीय कार्यशाला शुरू की।
लक्ष्य: आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी को वैश्विक डिजिटल स्वास्थ्य तंत्र और यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज ढाँचे में शामिल करना।
सिद्ध प्रणाली में 25 विशेषज्ञता क्षेत्र, 130 चिकित्सा पद्धतियाँ और 996 प्रक्रियाएँ दर्ज की गई हैं।
यूनानी प्रणाली में 15 विशेषज्ञता क्षेत्र, 179 चिकित्सा पद्धतियाँ और 551 प्रक्रियाएँ शामिल हैं।
कार्यशाला का आयोजन CCRAS द्वारा NIIMH, हैदराबाद के माध्यम से किया जा रहा है।
WHO के प्रतिनिधि डॉ.
स्टीफन एस्पिनोसा ने वैश्विक अंतर-संचालनीयता पर विचार साझा किए।

आयुष मंत्रालय ने 14 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के ICHI (International Classification of Health Interventions) फ्रेमवर्क पर पाँच दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ किया, जिसका उद्देश्य भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों — आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी — को वैश्विक डिजिटल स्वास्थ्य तंत्र और यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (UHC) ढाँचे में औपचारिक स्थान दिलाना है। यह पहल भारतीय पारंपरिक चिकित्सा को आधुनिक स्वास्थ्य सूचना विज्ञान के मानकों के अनुरूप लाने की दिशा में एक निर्णायक कदम मानी जा रही है।

कार्यशाला का उद्देश्य और संरचना

इस कार्यशाला का आयोजन केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS) द्वारा अपने WHO सहयोग केंद्र, राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा विरासत संस्थान (NIIMH), हैदराबाद के माध्यम से किया जा रहा है। इसमें प्रमुख वैज्ञानिक विशेषज्ञ, संस्थागत प्रमुख और अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य सूचना विज्ञान पेशेवर एक साथ आए हैं।

कार्यशाला का केंद्रीय लक्ष्य आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी (ASU) प्रणालियों के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य हस्तक्षेप कोड (NHIC) के वैज्ञानिक रूप से सुदृढ़ और स्तरित पदानुक्रम को अंतिम रूप देना है।

मुख्य वक्ताओं के विचार

आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने उद्घाटन सत्र में कहा, 'यह भारत के पारंपरिक चिकित्सा तंत्र को वैश्विक वैज्ञानिक, डिजिटल और नीति पारिस्थितिकी तंत्र में स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा परिवर्तनकारी कदम है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि यह पहल महज एक कोडिंग अभ्यास नहीं, बल्कि इससे कहीं व्यापक है।

मंत्रालय की संयुक्त सचिव डॉ. कविता जैन ने पारंपरिक पद्धतियों को डिजिटल दस्तावेज़ीकरण और वैश्विक स्वास्थ्य तंत्र में समाहित करने के दीर्घकालिक नीतिगत प्रभावों पर विस्तार से प्रकाश डाला। GTMC जामनगर की यूनिट प्रमुख डॉ. गीता कृष्णन ने वैश्विक परिचालन संदर्भ साझा किया।

WHO की ओर से डॉ. रॉबर्ट जैकब, डेटा मानक एवं सूचना विज्ञान दल के प्रमुख, और डॉ. स्टीफन एस्पिनोसा, सलाहकार, ने वैश्विक अंतर-संचालनीयता और डिजिटल सूचना विज्ञान के साथ संरेखण पर अपने विचार रखे।

आँकड़ों में पारंपरिक चिकित्सा का विस्तार

कार्यशाला में साझा किए गए आँकड़ों के अनुसार, सिद्ध प्रणाली में 25 विशेषज्ञता क्षेत्र, 130 चिकित्सा पद्धतियाँ और 996 प्रक्रियाएँ हैं। यूनानी प्रणाली में 15 विशेषज्ञता क्षेत्र, 179 चिकित्सा पद्धतियाँ और 551 प्रक्रियाएँ शामिल हैं। मानक स्वास्थ्य शब्दावली को अपनाने से ये सभी हस्तक्षेप आधुनिक स्वास्थ्य सूचना विज्ञान मानकों के अनुरूप बड़े डिजिटल स्वास्थ्य तंत्र का अनिवार्य हिस्सा बन सकेंगे।

वैश्विक संदर्भ में महत्व

यह ऐसे समय में आया है जब WHO पारंपरिक चिकित्सा को वैश्विक स्वास्थ्य नीति की मुख्यधारा में लाने पर ज़ोर दे रहा है। गौरतलब है कि भारत सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में आयुष को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन से जोड़ने की कोशिशें तेज़ की हैं, और यह कार्यशाला उसी रणनीतिक दिशा में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। NHIC के अंतिम रूप लेने के बाद भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियाँ अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य डेटाबेस में दर्ज हो सकेंगी, जो वैश्विक शोध और नीति-निर्माण में उनकी भागीदारी का मार्ग प्रशस्त करेगा।

आगे की राह

पाँच दिवसीय इस कार्यशाला के समापन पर NHIC के मसौदे को अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह कोड वैश्विक स्तर पर स्वीकृत होता है, तो यह भारतीय पारंपरिक चिकित्सा के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी — और आयुष को केवल वैकल्पिक चिकित्सा के दायरे से निकालकर मुख्यधारा के वैश्विक स्वास्थ्य तंत्र में स्थापित करेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली चुनौती कोडिंग से आगे की है — यह है कि क्या इन पद्धतियों की प्रभावशीलता को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य नैदानिक साक्ष्य से प्रमाणित किया जा सकेगा। NHIC के निर्माण से डिजिटल दस्तावेज़ीकरण तो सुनिश्चित होगा, लेकिन वैश्विक स्वास्थ्य नीति में आयुष की वास्तविक स्वीकृति के लिए peer-reviewed शोध की माँग बढ़ेगी। यह पहल तब और सार्थक होगी जब डिजिटल एकीकरण के साथ-साथ साक्ष्य-आधारित अनुसंधान में भी समान निवेश हो।
RashtraPress
14 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आयुष मंत्रालय की WHO-ICHI कार्यशाला क्या है?
यह एक पाँच दिवसीय विशेषज्ञ कार्यशाला है जो 14 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में शुरू हुई, जिसका उद्देश्य आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी चिकित्सा पद्धतियों को WHO के ICHI फ्रेमवर्क के तहत वैश्विक डिजिटल स्वास्थ्य तंत्र में शामिल करना है। इसमें राष्ट्रीय स्वास्थ्य हस्तक्षेप कोड (NHIC) को अंतिम रूप दिया जाएगा।
NHIC क्या है और यह क्यों ज़रूरी है?
राष्ट्रीय स्वास्थ्य हस्तक्षेप कोड (NHIC) आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी प्रणालियों की चिकित्सा पद्धतियों और प्रक्रियाओं का एक मानकीकृत कोडिंग ढाँचा है। यह इन पद्धतियों को अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य डेटाबेस में दर्ज करने और वैश्विक स्वास्थ्य नीति में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
इस कार्यशाला में कौन-कौन भाग ले रहा है?
कार्यशाला में आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा, संयुक्त सचिव डॉ. कविता जैन, GTMC जामनगर की यूनिट प्रमुख डॉ. गीता कृष्णन और WHO के प्रतिनिधि डॉ. रॉबर्ट जैकब व डॉ. स्टीफन एस्पिनोसा सहित प्रमुख वैज्ञानिक विशेषज्ञ और अंतर्राष्ट्रीय सूचना विज्ञान पेशेवर शामिल हैं।
सिद्ध और यूनानी प्रणालियों में कितनी प्रक्रियाएँ कोड की जाएंगी?
आँकड़ों के अनुसार, सिद्ध प्रणाली में 25 विशेषज्ञता क्षेत्र, 130 चिकित्सा पद्धतियाँ और 996 प्रक्रियाएँ हैं, जबकि यूनानी प्रणाली में 15 विशेषज्ञता क्षेत्र, 179 चिकित्सा पद्धतियाँ और 551 प्रक्रियाएँ शामिल हैं।
इस पहल का आम नागरिकों पर क्या असर होगा?
वैश्विक डिजिटल स्वास्थ्य तंत्र में शामिल होने के बाद आयुष उपचार यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज ढाँचे का हिस्सा बन सकते हैं, जिससे इन्हें बीमा और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में मान्यता मिलने की संभावना बढ़ेगी। साथ ही, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय पारंपरिक चिकित्सा की स्वीकार्यता और शोध के अवसर भी बढ़ेंगे।
राष्ट्र प्रेस
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