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मच्छरों की अलग-अलग प्रजातियाँ चुनती हैं अलग-अलग इंसान — 119 लोगों पर हुई iScience स्टडी का बड़ा खुलासा

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मच्छरों की अलग-अलग प्रजातियाँ चुनती हैं अलग-अलग इंसान — 119 लोगों पर हुई iScience स्टडी का बड़ा खुलासा

सारांश

क्या आप किसी मच्छर के 'पसंदीदा' इंसान हैं? FIU के नए शोध का जवाब है — हाँ, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि मच्छर कौन-सी प्रजाति का है। 119 लोगों पर किए इस अध्ययन ने साबित किया कि हर प्रजाति शरीर की गंध, रसायन और माइक्रोबायोम को अपने तरीके से 'पढ़ती' है।

मुख्य बातें

फ्लोरिडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी (FIU) के शोधकर्ताओं ने 119 लोगों पर मच्छर-आकर्षण का अध्ययन किया, जो जर्नल iScience में प्रकाशित हुआ।
अध्ययन में एडीज एजिप्टी , एडीज एल्बोपिक्टस और क्यूलेक्स क्विनक्वेफैसिएटस — तीन प्रजातियाँ शामिल थीं, जो डेंगू, जीका, येलो फीवर और वेस्ट नाइल फैलाती हैं।
तीनों प्रजातियों ने अलग-अलग लोगों को प्राथमिकता दी — हर एक ने शरीर की गंध को अपने तरीके से 'पढ़ा'।
मानव शरीर से एक हजार से अधिक वाष्पशील कार्बनिक यौगिक निकलते हैं, जो मच्छरों के लिए दिशा-संकेत का काम करते हैं।
क्यूलेक्स प्रजाति त्वचा के माइक्रोबायोम पर सबसे अधिक निर्भर पाई गई; कुछ बैक्टीरिया मच्छरों को दूर भी रख सकते हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, ये निष्कर्ष भविष्य में मच्छर-जनित बीमारियों की रोकथाम के नए उपाय विकसित करने में सहायक हो सकते हैं।

फ्लोरिडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी (FIU) के शोधकर्ताओं द्वारा 119 प्रतिभागियों पर किए गए एक नए अध्ययन में सामने आया है कि मच्छरों की विभिन्न प्रजातियाँ अलग-अलग इंसानों की ओर आकर्षित होती हैं — और यह आकर्षण हर प्रजाति के लिए अलग तरह से काम करता है। यह शोध वैज्ञानिक जर्नल iScience में प्रकाशित हुआ है और मच्छर-जनित बीमारियों की रोकथाम की दिशा में नई संभावनाएँ खोलता है।

अध्ययन की रूपरेखा और तीन प्रजातियाँ

शोध दल का नेतृत्व FIU के न्यूरोजेनेटिसिस्ट मैथ्यू डीगेनारो ने किया, जबकि पीएचडी छात्रा कायली मारेरो ने इस रिसर्च की अगुवाई की। अध्ययन में तीन प्रजातियों को शामिल किया गया — एडीज एजिप्टी, एडीज एल्बोपिक्टस (एशियन टाइगर मच्छर) और क्यूलेक्स क्विनक्वेफैसिएटस। ये तीनों प्रजातियाँ क्रमशः डेंगू, जीका, येलो फीवर और वेस्ट नाइल जैसी गंभीर बीमारियाँ फैलाने में भूमिका निभाती हैं।

शोधकर्ताओं ने परीक्षण किया कि इन तीनों प्रजातियों को इंसानी शरीर से निकलने वाले रासायनिक संकेत किस तरह प्रभावित करते हैं। नतीजे स्पष्ट थे — तीनों प्रजातियों ने एक जैसे लोगों को पसंद नहीं किया; हर एक ने शरीर की गंध को अपने तरीके से 'पढ़ा'।

मानव शरीर की गंध और रासायनिक संकेत

अध्ययन के अनुसार, मानव शरीर से एक हजार से अधिक प्रकार के वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (Volatile Organic Compounds) उत्सर्जित हो सकते हैं। इनमें से कई के बारे में वैज्ञानिक अभी पूरी तरह से अवगत नहीं हैं। यही रसायन हमारी प्राकृतिक शारीरिक गंध का निर्माण करते हैं और मच्छरों के लिए दिशा-संकेत का कार्य करते हैं।

गौरतलब है कि यह शोध इस धारणा को वैज्ञानिक आधार देता है कि कुछ लोग दूसरों की तुलना में मच्छरों के लिए अधिक 'आकर्षक' होते हैं — लेकिन यह आकर्षण मच्छर की प्रजाति पर भी निर्भर करता है।

तीनों प्रजातियों की अलग-अलग पसंद

एडीज एजिप्टी — जो दिन में सक्रिय रहने वाली प्रजाति है — ऐसे लोगों की ओर अधिक आकर्षित पाई गई जिनकी त्वचा में कुछ विशेष वाष्पशील रसायन कम मात्रा में थे और जो अतिरिक्त खुशबू नहीं लगाते थे। अध्ययन के अनुसार, इस प्रजाति ने पुरुषों की ओर हल्की प्राथमिकता भी दिखाई।

एडीज एल्बोपिक्टस (एशियन टाइगर मच्छर) भी दिन में सक्रिय रहता है और यह त्वचा से प्राकृतिक रूप से उत्सर्जित होने वाले विशेष केटोन्स तथा पौधों जैसी गंध वाले रसायनों की ओर अधिक आकर्षित हुआ।

क्यूलेक्स क्विनक्वेफैसिएटस — जो रात में अधिक सक्रिय होता है — की पसंद सबसे अलग निकली। यह प्रजाति मानव त्वचा पर मौजूद माइक्रोबायोम यानी बैक्टीरिया, फंगस और अन्य सूक्ष्मजीवों के समुदाय को पहचानने पर अधिक निर्भर करती है।

त्वचा का माइक्रोबायोम और मच्छर

हमारी त्वचा पर हमेशा लाखों-करोड़ों सूक्ष्मजीव उपस्थित रहते हैं। ये सूक्ष्मजीव त्वचा की गंध को प्रभावित करते हैं। अध्ययन में पाया गया कि कुछ बैक्टीरियल परिवार मच्छरों को इंसान की ओर आकर्षित कर सकते हैं, जबकि कुछ अन्य बैक्टीरिया उन्हें दूर रखने वाले संकेत दे सकते हैं। यह खोज भविष्य में व्यक्तिगत स्तर पर मच्छर-विकर्षक उपाय विकसित करने की नई राह खोल सकती है।

शोध का महत्त्व और आगे की राह

शोधकर्ताओं के अनुसार, इस अध्ययन के निष्कर्ष भविष्य में मच्छर-जनित बीमारियों की रोकथाम के नए तरीके विकसित करने में सहायक हो सकते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब डेंगू और जीका जैसी बीमारियाँ दुनिया भर में, विशेषकर उष्णकटिबंधीय देशों में, सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। आने वाले शोधों में वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश करेंगे कि किन रासायनिक यौगिकों या माइक्रोबायोम संरचनाओं को लक्षित कर मच्छरों को मनुष्यों से दूर रखा जा सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसके निहितार्थ कहीं अधिक गहरे हैं। डेंगू और जीका जैसी बीमारियाँ भारत में हर साल लाखों को प्रभावित करती हैं, और अब तक मच्छर-नियंत्रण की रणनीतियाँ 'एक आकार सबके लिए' के सिद्धांत पर चली हैं। यदि हर प्रजाति अलग रासायनिक संकेतों पर निर्भर करती है, तो प्रजाति-विशिष्ट विकर्षक विकसित करना संभव हो सकता है — जो मौजूदा DEET-आधारित उपायों से कहीं अधिक प्रभावी होगा। असली सवाल यह है कि इस प्रयोगशाला-स्तरीय खोज को व्यावहारिक सार्वजनिक स्वास्थ्य उपकरण में बदलने में कितना समय और निवेश लगेगा।
RashtraPress
8 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या सच में मच्छर कुछ लोगों को दूसरों से ज़्यादा काटते हैं?
हाँ, iScience में प्रकाशित FIU के अध्ययन के अनुसार मच्छरों की अलग-अलग प्रजातियाँ अलग-अलग इंसानों की ओर आकर्षित होती हैं। यह आकर्षण शरीर से निकलने वाले वाष्पशील रसायनों और त्वचा के माइक्रोबायोम पर निर्भर करता है।
FIU के मच्छर अध्ययन में कौन-सी तीन प्रजातियाँ शामिल थीं?
अध्ययन में एडीज एजिप्टी, एडीज एल्बोपिक्टस (एशियन टाइगर मच्छर) और क्यूलेक्स क्विनक्वेफैसिएटस को शामिल किया गया। ये तीनों क्रमशः डेंगू, जीका, येलो फीवर और वेस्ट नाइल जैसी बीमारियाँ फैलाने में भूमिका निभाती हैं।
मच्छर इंसान की गंध को कैसे पहचानते हैं?
मानव शरीर से एक हजार से अधिक प्रकार के वाष्पशील कार्बनिक यौगिक उत्सर्जित होते हैं, जो हमारी प्राकृतिक गंध बनाते हैं। इसके अलावा त्वचा का माइक्रोबायोम — यानी बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीव — भी इस गंध को प्रभावित करते हैं, जिसे मच्छर अपने तरीके से 'पढ़ते' हैं।
क्या त्वचा पर खुशबू लगाने से मच्छर ज़्यादा आकर्षित होते हैं?
अध्ययन के अनुसार, एडीज एजिप्टी ऐसे लोगों की ओर अधिक आकर्षित हुआ जो शरीर पर कोई अतिरिक्त खुशबू नहीं लगा रहे थे। हालाँकि यह निष्कर्ष सभी मच्छर प्रजातियों पर समान रूप से लागू नहीं होता, क्योंकि हर प्रजाति की प्राथमिकताएँ अलग पाई गईं।
इस शोध से भविष्य में क्या फायदा होगा?
शोधकर्ताओं के अनुसार, ये निष्कर्ष मच्छर-जनित बीमारियों की रोकथाम के नए और अधिक प्रभावी तरीके विकसित करने में सहायक हो सकते हैं। प्रजाति-विशिष्ट रासायनिक संकेतों की पहचान से भविष्य में लक्षित विकर्षक बनाना संभव हो सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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