एशियन पैरा गेम्स 2026: अशोक कुमार मलिक ने 192 किलो उठाकर पैरा पावरलिफ्टिंग में जीता सिल्वर मेडल
सारांश
मुख्य बातें
भारत के अशोक कुमार मलिक ने 20 अक्टूबर 2026 को आइची-नागोया एशियन पैरा गेम्स 2026 में पुरुषों की 65 किलोग्राम पैरा पावरलिफ्टिंग स्पर्धा के फाइनल में सिल्वर मेडल जीतकर देश का सिर गर्व से ऊँचा किया। हरियाणा के सोनीपत जिले के एक छोटे से गाँव से उठकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचे अशोक की यह उपलब्धि न केवल उनकी खेल-प्रतिभा, बल्कि उनके अदम्य संघर्ष की भी गवाह है।
फाइनल में कैसा रहा प्रदर्शन
फाइनल मुकाबले में अशोक ने अपने पहले प्रयास में 187 किलोग्राम भार सफलतापूर्वक उठाया। इसके बाद दूसरे प्रयास में उन्होंने 192 किलोग्राम वजन उठाकर पदक की दावेदारी पक्की की। हालाँकि, तीसरे और अंतिम प्रयास में वे 201 किलोग्राम उठाने में सफल नहीं हो सके, जिसके चलते उन्हें रजत से संतोष करना पड़ा।
गौरतलब है कि पैरा पावरलिफ्टिंग उन एथलीटों के लिए आयोजित की जाती है जिनके पैरों में विकलांगता हो या जिनकी शारीरिक संरचना भिन्न हो। यह प्रतियोगिता सामान्य बेंच प्रेस के नियमों के अंतर्गत होती है, जिसमें प्रत्येक एथलीट को तीन प्रयास मिलते हैं और रैंकिंग उठाए गए अधिकतम वजन के आधार पर तय होती है।
शानदार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियाँ
17 बार के राष्ट्रीय चैंपियन अशोक ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी मज़बूत पहचान बनाई है। उन्होंने एशिया ओशिनिया चैंपियनशिप 2022 में गोल्ड मेडल जीता, जो उनके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि रही। इसके अलावा हांगझोऊ एशियन पैरा गेम्स 2022 में ब्रॉन्ज मेडल और 2026 एशियन चैंपियनशिप में भी ब्रॉन्ज मेडल उनके खाते में है।
वर्ल्ड कप सर्किट में भी उनका प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा है। उन्होंने मिस्र में 2023 पैरा पावरलिफ्टिंग वर्ल्ड कप में सिल्वर मेडल, पटाया वर्ल्ड कप 2024 में गोल्ड मेडल और त्बिलिसी वर्ल्ड कप 2024 में ब्रॉन्ज मेडल जीता।
पोलियो से पैरा चैंपियन तक का सफर
हरियाणा के सोनीपत जिले की गोहाना तहसील के मिर्जापुर खेड़ी गाँव में जन्मे अशोक को महज पाँच साल की उम्र में पोलियो ने जकड़ लिया था। इस शुरुआती संघर्ष ने उनके हौसले को तोड़ने की बजाय और मज़बूत किया।
दिल्ली में कॉलेज की पढ़ाई के दौरान कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 ने उनके भीतर खेलों के प्रति जुनून जगाया। 2011 में उन्होंने पावरलिफ्टिंग की शुरुआत की, और तभी से उनके एथलेटिक सफर की नींव पड़ी।
2020 में पिता के निधन के बाद उनकी माँ ने उन्हें और उनके भाई को अकेले संभाला। यह ऐसे समय में आया जब अशोक अपने करियर की सबसे अहम तैयारी में लगे थे।
परिवार और सहयोगियों की भूमिका
अशोक को उनकी मौसी ने सफलता के लिए ज़रूरी संसाधन उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके कोच जेपी सिंह ने उन्हें अपने संरक्षण में लिया और तकनीकी दिशा दी। मित्र विक्रम सिंह मोर ने प्रशिक्षण और पोषण से जुड़ी ज़रूरतों को पूरा करने में सहायता की।
आगे देखें तो अशोक की नज़र अब विश्व स्तर के बड़े मंचों पर पदक जीतने की होगी — नागोया का रजत उस सफर का अगला मज़बूत पड़ाव है।