प्रमोद भगत: पोलियो को मात देकर टोक्यो पैरालंपिक में गोल्ड, पैरा बैडमिंटन के सबसे बड़े सितारे की कहानी
सारांश
मुख्य बातें
भारत के सबसे सफल पैरा बैडमिंटन खिलाड़ियों में शुमार प्रमोद भगत ने पुरुष एकल SL3 वर्ग में अनेक अंतरराष्ट्रीय खिताब अपने नाम किए हैं, और 2020 टोक्यो पैरालंपिक में देश के लिए ऐतिहासिक स्वर्ण पदक जीतकर वैश्विक मंच पर तिरंगा लहराया। बचपन में पोलियो के कारण आई दिव्यांगता को उन्होंने कभी अपनी सीमा नहीं बनने दिया, बल्कि उसे अपनी ताक़त में बदला।
शुरुआती जीवन और संघर्ष
प्रमोद भगत का जन्म 4 जून 1988 को हुआ। मूल रूप से बिहार से ताल्लुक रखने वाले प्रमोद का परिवार ओडिशा के बरगढ़ ज़िले के अट्टाबीरा में बस गया। महज़ 5 वर्ष की आयु में उन्हें पोलियो हो गया, जिससे उनके बाएँ पैर में दिव्यांगता आ गई। पिता रामा भगत गाँव में खेती करते थे, जबकि बेहतर इलाज और परवरिश के लिए उनकी बुआ किशनु देवी ने उन्हें गोद लेकर अपने साथ ओडिशा ले आईं।
बैडमिंटन से पहली मुलाक़ात
प्रमोद ने अपनी पूरी पढ़ाई ओडिशा से की और इंटर के बाद ITI किया। 13 वर्ष की उम्र में एक बैडमिंटन मैच देखने के बाद इस खेल के प्रति उनका जुनून गहरा होता चला गया, और वह घंटों कोर्ट पर अभ्यास करने लगे। 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने सामान्य श्रेणी के खिलाड़ियों के विरुद्ध अपना पहला टूर्नामेंट खेला और पहली ही बार में ज़िला चैंपियन का ख़िताब जीत लिया — एक ऐसा प्रदर्शन जिसने उनके आगे के करियर की नींव रखी।
विश्व मंच पर सिलसिलेवार स्वर्ण
साल 2009 में प्रमोद ने पैरा बैडमिंटन वर्ल्ड चैंपियनशिप के पुरुष एकल वर्ग में पहला स्वर्ण जीता। इसके बाद 2013, 2015, 2019, 2022, 2024 और 2026 की वर्ल्ड चैंपियनशिप में भी उन्होंने सोने का तमगा अपने नाम किया। 2018 और 2022 के एशियन पैरा गेम्स में भी उन्होंने स्वर्ण पदक जीते। उनके करियर का सबसे चमकदार अध्याय 2020 टोक्यो पैरालंपिक रहा, जहाँ उन्होंने पुरुष एकल इवेंट में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता।
राष्ट्रीय सम्मान
खेल में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रमोद भगत को 2019 में अर्जुन पुरस्कार, 2021 में मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार और 2022 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। यह तीनों सम्मान भारत में किसी खिलाड़ी की सर्वोच्च पहचान माने जाते हैं।
प्रेरणा का दूसरा नाम
प्रमोद भगत का सफ़र इस बात की मिसाल है कि शारीरिक चुनौतियाँ अनुशासन और जुनून के सामने टिक नहीं पातीं। वर्ल्ड चैंपियन और पैरालंपिक स्वर्ण पदक विजेता बनने तक का उनका रास्ता आने वाली पीढ़ी के पैरा-एथलीटों के लिए एक स्पष्ट खाका प्रस्तुत करता है — दृढ़ संकल्प, आत्मविश्वास और निरंतर अभ्यास से कोई भी बाधा पार की जा सकती है।