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सुधा सिंह: 3000 मीटर स्टीपलचेज की पहली एशियाई चैंपियन, दो ओलंपिक और पद्मश्री तक का सफर

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सुधा सिंह: 3000 मीटर स्टीपलचेज की पहली एशियाई चैंपियन, दो ओलंपिक और पद्मश्री तक का सफर

सारांश

रायबरेली की सुधा सिंह ने 2010 में ग्वांगझू एशियाई खेलों की पहली महिला स्टीपलचेज चैंपियन बनकर इतिहास रचा। दो ओलंपिक, कई एशियाई पदक और पद्मश्री — उनका सफर भारतीय एथलेटिक्स की एक मिसाल है।

मुख्य बातें

सुधा सिंह का जन्म 25 जून 1986 को रायबरेली, उत्तर प्रदेश में हुआ; उन्होंने 2005 से अंतरराष्ट्रीय करियर शुरू किया।
2010 ग्वांगझू एशियाई खेलों में 9:55.67 मिनट के साथ स्वर्ण जीतकर वह महिला 3,000 मीटर स्टीपलचेज की पहली एशियाई चैंपियन बनीं।
2012 में राष्ट्रीय रिकॉर्ड 9:47.70 मिनट तोड़ा; 2012 लंदन और 2016 रियो ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया।
2017 भुवनेश्वर एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में स्वर्ण और 2018 जकार्ता एशियाई खेलों में रजत पदक जीता।
भारत सरकार ने 2012 में अर्जुन पुरस्कार और 2021 में पद्मश्री से सम्मानित किया।
2022 में सक्रिय प्रतिस्पर्धी एथलेटिक्स से संन्यास लिया।

सुधा सिंह भारतीय एथलेटिक्स की उन विरल प्रतिभाओं में से एक हैं, जिन्होंने 3,000 मीटर स्टीपलचेज (बाधा दौड़) को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की पहचान दिलाई। रायबरेली, उत्तर प्रदेश में 25 जून 1986 को जन्मी सुधा ने 2005 से अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश का प्रतिनिधित्व शुरू किया और अगले डेढ़ दशक तक एशियाई एथलेटिक्स में अपना दबदबा बनाए रखा।

ऐतिहासिक स्वर्ण: एशियाई खेलों की पहली चैंपियन

सुधा सिंह की सबसे बड़ी उपलब्धि 2010 में ग्वांगझू, चीन में आयोजित एशियाई खेलों में आई। उन्होंने 9:55.67 मिनट का समय निकालकर स्वर्ण पदक जीता। यह एशियाई खेलों के इतिहास में महिलाओं की 3,000 मीटर स्टीपलचेज स्पर्धा का पहला आयोजन था, और सुधा इस इवेंट की पहली एशियाई चैंपियन बनीं — एक ऐसा कीर्तिमान जो भारतीय एथलेटिक्स के इतिहास में दर्ज हो गया।

राष्ट्रीय रिकॉर्ड और ओलंपिक मंच

2012 में सुधा ने अपना ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ते हुए 9:47.70 मिनट का समय दर्ज किया और लंदन ओलंपिक के लिए क्वालिफाई किया। इसके बाद उन्होंने 2012 लंदन और 2016 रियो — लगातार दो ओलंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। दोनों ओलंपिक में पदक नहीं मिला, लेकिन इस स्तर पर लगातार दो बार पहुँचना अपने आप में भारतीय एथलेटिक्स की बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।

पदकों की पूरी सूची

सुधा के करियर में पदकों की एक लंबी श्रृंखला है। एशियाई खेलों में उन्होंने 2010 ग्वांगझू में स्वर्ण और 2018 जकार्ता में रजत पदक जीता। एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंने 2017 भुवनेश्वर में स्वर्ण तथा 2009 ग्वांगझू, 2011 कोबे और 2013 पुणे में रजत पदक हासिल किए। ये सभी पदक 3,000 मीटर स्टीपलचेज स्पर्धा में जीते गए।

सम्मान और विदाई

भारत सरकार ने सुधा सिंह की उपलब्धियों को मान्यता देते हुए 2012 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार और 2021 में देश के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मश्री से नवाज़ा। 2022 में सुधा ने सक्रिय प्रतिस्पर्धी एथलेटिक्स से संन्यास लिया। उनका करियर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस रास्ते में है जो उन्होंने उत्तर प्रदेश की छोटी बस्तियों से निकलकर दो ओलंपिक तक बनाया।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुधा सिंह ने एशियाई खेलों में कौन-सा ऐतिहासिक कीर्तिमान बनाया?
सुधा सिंह ने 2010 ग्वांगझू एशियाई खेलों में 9:55.67 मिनट के समय के साथ स्वर्ण पदक जीता और महिलाओं की 3,000 मीटर स्टीपलचेज स्पर्धा की पहली एशियाई चैंपियन बनीं, क्योंकि यह इस इवेंट का एशियाई खेलों में पहला आयोजन था।
सुधा सिंह ने कितने ओलंपिक में भाग लिया?
सुधा सिंह ने 2012 लंदन और 2016 रियो — लगातार दो ओलंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। दोनों में वह पदक नहीं जीत सकीं, लेकिन लगातार दो ओलंपिक में जगह बनाना भारतीय एथलेटिक्स में एक उल्लेखनीय उपलब्धि मानी जाती है।
सुधा सिंह को कौन-कौन से सरकारी सम्मान मिले?
भारत सरकार ने सुधा सिंह को 2012 में अर्जुन पुरस्कार और 2021 में पद्मश्री से सम्मानित किया। पद्मश्री भारत का चौथा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है।
सुधा सिंह का राष्ट्रीय रिकॉर्ड क्या है?
सुधा सिंह ने 2012 में 3,000 मीटर स्टीपलचेज में 9:47.70 मिनट का समय निकालकर अपना ही पिछला राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ा। इसी प्रदर्शन के आधार पर उन्होंने लंदन ओलंपिक के लिए क्वालिफाई किया।
सुधा सिंह ने एथलेटिक्स से संन्यास कब लिया?
सुधा सिंह ने 2022 में सक्रिय प्रतिस्पर्धी एथलेटिक्स से संन्यास लिया। उन्होंने 2005 से 2022 तक करीब डेढ़ दशक तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया।
राष्ट्र प्रेस
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