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पीवी सिंधु: 8 साल में थामा रैकेट, दो ओलंपिक पदक जीतकर बनीं भारत की पहली एथलीट

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पीवी सिंधु: 8 साल में थामा रैकेट, दो ओलंपिक पदक जीतकर बनीं भारत की पहली एथलीट

सारांश

8 साल की उम्र में रैकेट, गोपीचंद की जीत से प्रेरणा, और मोबाइल से दूरी बनाकर की साधना — पीवी सिंधु की कहानी सिर्फ पदकों की नहीं, उस अनुशासन की है जिसने एक हैदराबादी लड़की को भारत की सबसे बड़ी ओलंपिक नायिका बनाया।

मुख्य बातें

पीवी सिंधु का जन्म 5 जुलाई 1995 को हैदराबाद में हुआ; माता-पिता दोनों राष्ट्रीय स्तर के वॉलीबॉल खिलाड़ी थे।
उन्होंने 8 वर्ष की आयु में बैडमिंटन रैकेट थामा और गोपीचंद बैडमिंटन अकादमी में प्रशिक्षण लिया।
2016 रियो ओलंपिक में रजत और टोक्यो ओलंपिक 2020 में कांस्य पदक जीतकर ओलंपिक में दो व्यक्तिगत पदक जीतने वाली भारत की पहली एथलीट बनीं।
2019 में विश्व चैंपियनशिप खिताब जीतकर इतिहास रचा।
2018 कॉमनवेल्थ गेम्स में महिला एकल स्वर्ण पदक जीता।
अर्जुन पुरस्कार (2013) , मेजर ध्यानचंद खेल रत्न (2016) और पद्म भूषण (2020) से सम्मानित।

भारतीय बैडमिंटन की सबसे चमकदार सितारा पुसर्ला वेंकट सिंधु (पीवी सिंधु) ने अपने खेल-प्रेमी परिवार से मिली प्रेरणा और अथक परिश्रम के बल पर ओलंपिक में दो व्यक्तिगत पदक जीतकर इतिहास रचा। 5 जुलाई 1995 को हैदराबाद में जन्मी सिंधु ऐसी पहली भारतीय एथलीट हैं जिन्होंने ओलंपिक खेलों में दो व्यक्तिगत पदक अपने नाम किए। उनकी यह यात्रा महज 8 वर्ष की आयु में रैकेट थामने से शुरू होकर विश्व चैंपियनशिप की स्वर्णिम ऊँचाइयों तक पहुँची।

खेल-परिवार से मिली नींव

सिंधु के माता-पिता दोनों ही राष्ट्रीय स्तर के वॉलीबॉल खिलाड़ी रहे हैं, जिससे घर में खेल का माहौल स्वाभाविक रूप से बना रहा। बेटी की प्रतिभा को पहचानते हुए उन्होंने हर कदम पर उसका साथ दिया। सिंधु के जीवन का निर्णायक मोड़ तब आया जब साल 2001 में पुलेला गोपीचंद ने इंग्लैंड ओपन बैडमिंटन चैंपियनशिप जीती — उस ऐतिहासिक जीत ने बालिका सिंधु के मन में बैडमिंटन के प्रति गहरी ललक जगा दी और उन्होंने इसी खेल को अपना लक्ष्य बना लिया।

गोपीचंद अकादमी में कड़ी साधना

बैडमिंटन की बारीकियाँ सीखने के लिए सिंधु ने गोपीचंद बैडमिंटन अकादमी में प्रवेश लिया और घंटों अभ्यास में डूबी रहीं। उनके समर्पण का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने प्रशिक्षण के दौरान लंबे समय तक मोबाइल फोन से भी दूरी बनाए रखी। यह एकाग्रता और अनुशासन ही आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत साबित हुई।

अंतरराष्ट्रीय करियर की शानदार शुरुआत

राष्ट्रीय स्तर पर मज़बूत प्रदर्शन के बाद सिंधु ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी तेज़ी से पहचान बनाई। साल 2011 में महज 16 वर्ष की उम्र में उन्होंने मालदीव इंटरनेशनल चैलेंज खिताब जीता। 2012 में वे एशियन जूनियर चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने में सफल रहीं, और 2013 में मलेशिया ओपन ग्रैंड प्रिक्स का खिताब उनके नाम हुआ।

ओलंपिक पदक और विश्व खिताब

साल 2016 सिंधु के करियर का स्वर्णिम अध्याय बना — उन्होंने चाइना ओपन जीता और रियो ओलंपिक में देश के लिए रजत पदक लाकर करोड़ों भारतीयों का दिल जीत लिया। 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स में उन्होंने महिला एकल स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता। 2019 में उन्होंने विश्व चैंपियनशिप का खिताब जीतकर इतिहास रचा — यह उपलब्धि हासिल करने वाली वे पहली भारतीय महिला बैडमिंटन खिलाड़ी बनीं। टोक्यो ओलंपिक 2020 में कांस्य पदक जीतकर सिंधु ने ओलंपिक में दो व्यक्तिगत पदक जीतने वाली भारत की पहली एथलीट बनने का गौरव प्राप्त किया।

सम्मान और पुरस्कार

बैडमिंटन में असाधारण योगदान के लिए सिंधु को 2013 में अर्जुन पुरस्कार, 2016 में राजीव गांधी खेल रत्न (अब मेजर ध्यानचंद खेल रत्न) और 2020 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। सिंधु की यह यात्रा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का अटूट स्रोत बनी रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

कोच और एथलीट तीनों एक ही दिशा में चले। गोपीचंद अकादमी का कठोर अनुशासन और सिंधु का मोबाइल-मुक्त प्रशिक्षण उस 'सिस्टम' की झलक देता है जो भारतीय खेलों में अभी भी अपवाद है, नियम नहीं। यह सवाल उठता है कि जब एक खिलाड़ी इतने पदक जीत सकती है, तो बाकी प्रतिभाएँ क्यों नहीं उभर पा रहीं — जवाब ढाँचागत निवेश और संस्थागत समर्थन की कमी में छुपा है।
RashtraPress
4 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पीवी सिंधु ने ओलंपिक में कौन-कौन से पदक जीते हैं?
पीवी सिंधु ने 2016 के रियो ओलंपिक में रजत पदक और टोक्यो ओलंपिक 2020 में कांस्य पदक जीता। इस तरह वे ओलंपिक में दो व्यक्तिगत पदक जीतने वाली भारत की पहली एथलीट बनीं।
पीवी सिंधु ने बैडमिंटन कब और कहाँ से सीखा?
सिंधु ने 8 साल की उम्र में बैडमिंटन रैकेट थामा और हैदराबाद स्थित गोपीचंद बैडमिंटन अकादमी में प्रशिक्षण लिया। 2001 में पुलेला गोपीचंद की इंग्लैंड ओपन जीत से प्रेरित होकर उन्होंने इस खेल को अपनाने का फैसला किया था।
पीवी सिंधु को कौन-कौन से राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं?
सिंधु को 2013 में अर्जुन पुरस्कार, 2016 में राजीव गांधी खेल रत्न (अब मेजर ध्यानचंद खेल रत्न) और 2020 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। ये तीनों पुरस्कार भारतीय खेल जगत के सर्वोच्च सम्मानों में गिने जाते हैं।
पीवी सिंधु विश्व चैंपियन कब बनीं?
पीवी सिंधु ने 2019 में विश्व चैंपियनशिप का खिताब जीता और यह उपलब्धि हासिल करने वाली पहली भारतीय महिला बैडमिंटन खिलाड़ी बनीं। इससे पहले वे इस प्रतियोगिता में कई बार उपविजेता रह चुकी थीं।
पीवी सिंधु के माता-पिता कौन हैं और उनका खेल से क्या संबंध है?
पीवी सिंधु के माता-पिता दोनों राष्ट्रीय स्तर के वॉलीबॉल खिलाड़ी रहे हैं। खेल-प्रेमी पारिवारिक माहौल ने सिंधु को बचपन से ही खेल में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी और हर मुकाम पर उनका साथ दिया।
राष्ट्र प्रेस
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