110 मीटर हर्डल्स में राष्ट्रीय रिकॉर्ड धारक तेजस शिर्से का लक्ष्य: कॉमनवेल्थ-एशियन गेम्स में पदक और भारत में हर्डल्स को जैवलिन जैसी पहचान
सारांश
मुख्य बातें
110 मीटर हर्डल्स में भारत के राष्ट्रीय रिकॉर्ड धारक तेजस शिर्से ने साफ कहा है कि कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन गेम्स में उनका एकमात्र लक्ष्य पदक जीतना है — और इससे भी बड़ा सपना है कि हर्डल्स को भारत में वही सम्मान मिले जो आज जैवलिन थ्रो को मिलता है। 23 वर्षीय इस एथलीट ने चोट, संघर्ष और 'मिशन चमत्कार' की पूरी कहानी साझा की।
मुख्य घटनाक्रम: चोट से वापसी और क्वालीफिकेशन
पिछले साल एक रेस के दौरान हर्डल से टकराने के कारण तेजस शिर्से के टखने में कई जगह गंभीर चोट आई — टखना लगभग तीन-चार स्थानों से टूट गया था। इस हादसे के बाद वे गहरे अवसाद में चले गए। उन्होंने कहा, "सब कुछ सही करने के बावजूद, और बिना कुछ गलत किए भी, मेरे साथ ऐसा हो गया।"
रिकवरी रिलायंस फाउंडेशन की स्पोर्ट्स साइंस टीम की देखरेख में हुई, जिसमें कोच जेम्स हिलियर, फिजियोथेरेपिस्ट नीलेश मकवाना और स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग कोच क्षितिज भोइते शामिल थे। शुरुआती लक्ष्य केवल दर्द-मुक्त दौड़ था — कॉमनवेल्थ गेम्स तो तब एक अव्यावहारिक सपना लग रहा था।
अप्रैल में ट्रेनिंग शुरू हुई और क्वालीफिकेशन मई के अंत से जून की शुरुआत तक होना था। इतने कम समय में शिर्से ने इसे 'मिशन चमत्कार' का नाम दिया — और चमत्कार हुआ भी। रांची में फेडरेशन कप में उन्होंने 13.67 सेकंड और 13.50 सेकंड का समय दर्ज किया। इसके बाद लुधियाना में उन्होंने 13.27 सेकंड का समय निकाला, जो 13.39 सेकंड के ज़रूरी क्वालीफिकेशन मानक से बेहतर था।
मानसिक मज़बूती: 'फ्री हिट' वाली सोच
शिर्से का मानना है कि भावनात्मक संतुलन ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहा, "जब आप अच्छा प्रदर्शन नहीं करते, तो लगता है सब खत्म हो गया — और जब बहुत अच्छा करते हैं, तो लगता है मैं सर्वश्रेष्ठ हूं। मैं बहुत उतार-चढ़ाव से गुजरा हूं। इसलिए, जीतने या हारने पर मैं न तो बहुत खुश होता हूं और न ही बहुत दुखी — और मुझे लगता है कि इससे मुझे बेहतर परफॉर्म करने में मदद मिल रही है।"
लुधियाना रेस से पहले उन्होंने खुद से कहा कि यह एक 'फ्री हिट' जैसा मौका है — अगर हार भी जाएं तो और नीचे नहीं जा सकते, इसलिए बेझिझक सर्वश्रेष्ठ देने का वक्त है।
साधारण पृष्ठभूमि से राष्ट्रीय मंच तक
छत्रपति संभाजीनगर में पले-बढ़े शिर्से के पास शुरुआत में आधुनिक हर्डल्स तक नहीं थे — वे लकड़ी के हर्डल्स बनाकर अभ्यास करते थे और इंटरनेट ट्यूटोरियल्स से तकनीक सीखते थे। आर्थिक कठिनाइयों और पारिवारिक चुनौतियों का सामना करते हुए उन्होंने राष्ट्रीय रिकॉर्ड तक का सफर तय किया।
उन्होंने कहा, "हर्डल्स ने मुझे चुना है, मैंने उसे नहीं चुना। कुछ रुकावटें होती हैं जिन्हें आपको पार करना होता है और फिर आप बस आगे बढ़ते रहते हैं।"
हर्डल्स को जैवलिन जैसी पहचान दिलाने का संकल्प
शिर्से का एक बड़ा सपना है — भारत में 110 मीटर हर्डल्स को वही लोकप्रियता दिलाना जो नीरज चोपड़ा के ओलंपिक गोल्ड के बाद जैवलिन थ्रो को मिली। उन्होंने कहा, "पहले लोग जैवलिन थ्रो के बारे में जानते भी नहीं थे। जब से नीरज ने गोल्ड जीता, तब लोगों को पता चला कि यह खेल भी होता है।"
उन्होंने 1983 विश्व कप से पहले क्रिकेट की स्थिति का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत में हीरोज़ की ज़रूरत होती है — ऐसे लोग जिन्हें देखकर युवा सोचें कि यह हमारे बीच से निकला है और हम भी कर सकते हैं। उनका लक्ष्य है कि हर्डल्स में ऐसा प्रदर्शन करें जो इस खेल को देश में एक नई पहचान दे।
ग्लोबल चुनौती और आगे की राह
कॉमनवेल्थ गेम्स के लाइनअप में जमैका और कैरिबियन के शीर्ष हर्डलर्स शामिल हैं, खासकर डेमारियो प्रिंस। एशियाई मोर्चे पर जापान और चीन कड़ी टक्कर देते हैं। शिर्से की रणनीति सरल है — बाहरी दबाव से ध्यान हटाकर खुद पर फोकस करना।
वे ज्योति याराजी, गुरिंदरवीर सिंह और अनिमेष कुजूर जैसे शीर्ष स्प्रिंटर्स के साथ 'हाई-परफॉर्मेंस बबल' में रोज़ाना ट्रेनिंग करते हैं, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धी धार बनी रहती है। उन्होंने कहा, "दबाव एक अच्छी चीज़ है — जब दबाव को सही प्रक्रिया के साथ मिलाया जाए, तो वह अच्छा होता है।" कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स में पदक जीतना उनका घोषित लक्ष्य है — और उनके अनुसार, यही एकमात्र स्वीकार्य नतीजा है।