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110 मीटर हर्डल्स में राष्ट्रीय रिकॉर्ड धारक तेजस शिर्से का लक्ष्य: कॉमनवेल्थ-एशियन गेम्स में पदक और भारत में हर्डल्स को जैवलिन जैसी पहचान

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110 मीटर हर्डल्स में राष्ट्रीय रिकॉर्ड धारक तेजस शिर्से का लक्ष्य: कॉमनवेल्थ-एशियन गेम्स में पदक और भारत में हर्डल्स को जैवलिन जैसी पहचान

सारांश

लकड़ी के हर्डल्स से राष्ट्रीय रिकॉर्ड तक — तेजस शिर्से की कहानी सिर्फ एथलेटिक्स की नहीं, एक सपने की है। टखने की गंभीर चोट के बाद 'मिशन चमत्कार' से वापसी करने वाले इस 23 वर्षीय का लक्ष्य है कि जैसे नीरज चोपड़ा ने जैवलिन को घर-घर पहुँचाया, वैसे ही वे हर्डल्स को भारत की नई पहचान बनाएँ।

मुख्य बातें

तेजस शिर्से (23 वर्ष) 110 मीटर हर्डल्स में भारत के राष्ट्रीय रिकॉर्ड धारक हैं।
टखने की गंभीर चोट के बाद अप्रैल में ट्रेनिंग शुरू कर लुधियाना में 13.27 सेकंड का समय निकालकर क्वालीफिकेशन मानक ( 13.39 सेकंड ) पार किया।
रिकवरी रिलायंस फाउंडेशन की स्पोर्ट्स साइंस टीम की देखरेख में हुई; उन्होंने इसे 'मिशन चमत्कार' नाम दिया।
कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन गेम्स में पदक जीतना उनका घोषित एकमात्र लक्ष्य है।
शिर्से का सपना है कि नीरज चोपड़ा के जैवलिन में ओलंपिक गोल्ड की तरह वे हर्डल्स को भारत में लोकप्रिय बनाएँ।
छत्रपति संभाजीनगर में पले-बढ़े शिर्से ने लकड़ी के हर्डल्स और इंटरनेट ट्यूटोरियल्स से अपना करियर शुरू किया था।

110 मीटर हर्डल्स में भारत के राष्ट्रीय रिकॉर्ड धारक तेजस शिर्से ने साफ कहा है कि कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन गेम्स में उनका एकमात्र लक्ष्य पदक जीतना है — और इससे भी बड़ा सपना है कि हर्डल्स को भारत में वही सम्मान मिले जो आज जैवलिन थ्रो को मिलता है। 23 वर्षीय इस एथलीट ने चोट, संघर्ष और 'मिशन चमत्कार' की पूरी कहानी साझा की।

मुख्य घटनाक्रम: चोट से वापसी और क्वालीफिकेशन

पिछले साल एक रेस के दौरान हर्डल से टकराने के कारण तेजस शिर्से के टखने में कई जगह गंभीर चोट आई — टखना लगभग तीन-चार स्थानों से टूट गया था। इस हादसे के बाद वे गहरे अवसाद में चले गए। उन्होंने कहा, "सब कुछ सही करने के बावजूद, और बिना कुछ गलत किए भी, मेरे साथ ऐसा हो गया।"

रिकवरी रिलायंस फाउंडेशन की स्पोर्ट्स साइंस टीम की देखरेख में हुई, जिसमें कोच जेम्स हिलियर, फिजियोथेरेपिस्ट नीलेश मकवाना और स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग कोच क्षितिज भोइते शामिल थे। शुरुआती लक्ष्य केवल दर्द-मुक्त दौड़ था — कॉमनवेल्थ गेम्स तो तब एक अव्यावहारिक सपना लग रहा था।

अप्रैल में ट्रेनिंग शुरू हुई और क्वालीफिकेशन मई के अंत से जून की शुरुआत तक होना था। इतने कम समय में शिर्से ने इसे 'मिशन चमत्कार' का नाम दिया — और चमत्कार हुआ भी। रांची में फेडरेशन कप में उन्होंने 13.67 सेकंड और 13.50 सेकंड का समय दर्ज किया। इसके बाद लुधियाना में उन्होंने 13.27 सेकंड का समय निकाला, जो 13.39 सेकंड के ज़रूरी क्वालीफिकेशन मानक से बेहतर था।

मानसिक मज़बूती: 'फ्री हिट' वाली सोच

शिर्से का मानना है कि भावनात्मक संतुलन ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहा, "जब आप अच्छा प्रदर्शन नहीं करते, तो लगता है सब खत्म हो गया — और जब बहुत अच्छा करते हैं, तो लगता है मैं सर्वश्रेष्ठ हूं। मैं बहुत उतार-चढ़ाव से गुजरा हूं। इसलिए, जीतने या हारने पर मैं न तो बहुत खुश होता हूं और न ही बहुत दुखी — और मुझे लगता है कि इससे मुझे बेहतर परफॉर्म करने में मदद मिल रही है।"

लुधियाना रेस से पहले उन्होंने खुद से कहा कि यह एक 'फ्री हिट' जैसा मौका है — अगर हार भी जाएं तो और नीचे नहीं जा सकते, इसलिए बेझिझक सर्वश्रेष्ठ देने का वक्त है।

साधारण पृष्ठभूमि से राष्ट्रीय मंच तक

छत्रपति संभाजीनगर में पले-बढ़े शिर्से के पास शुरुआत में आधुनिक हर्डल्स तक नहीं थे — वे लकड़ी के हर्डल्स बनाकर अभ्यास करते थे और इंटरनेट ट्यूटोरियल्स से तकनीक सीखते थे। आर्थिक कठिनाइयों और पारिवारिक चुनौतियों का सामना करते हुए उन्होंने राष्ट्रीय रिकॉर्ड तक का सफर तय किया।

उन्होंने कहा, "हर्डल्स ने मुझे चुना है, मैंने उसे नहीं चुना। कुछ रुकावटें होती हैं जिन्हें आपको पार करना होता है और फिर आप बस आगे बढ़ते रहते हैं।"

हर्डल्स को जैवलिन जैसी पहचान दिलाने का संकल्प

शिर्से का एक बड़ा सपना है — भारत में 110 मीटर हर्डल्स को वही लोकप्रियता दिलाना जो नीरज चोपड़ा के ओलंपिक गोल्ड के बाद जैवलिन थ्रो को मिली। उन्होंने कहा, "पहले लोग जैवलिन थ्रो के बारे में जानते भी नहीं थे। जब से नीरज ने गोल्ड जीता, तब लोगों को पता चला कि यह खेल भी होता है।"

उन्होंने 1983 विश्व कप से पहले क्रिकेट की स्थिति का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत में हीरोज़ की ज़रूरत होती है — ऐसे लोग जिन्हें देखकर युवा सोचें कि यह हमारे बीच से निकला है और हम भी कर सकते हैं। उनका लक्ष्य है कि हर्डल्स में ऐसा प्रदर्शन करें जो इस खेल को देश में एक नई पहचान दे।

ग्लोबल चुनौती और आगे की राह

कॉमनवेल्थ गेम्स के लाइनअप में जमैका और कैरिबियन के शीर्ष हर्डलर्स शामिल हैं, खासकर डेमारियो प्रिंस। एशियाई मोर्चे पर जापान और चीन कड़ी टक्कर देते हैं। शिर्से की रणनीति सरल है — बाहरी दबाव से ध्यान हटाकर खुद पर फोकस करना।

वे ज्योति याराजी, गुरिंदरवीर सिंह और अनिमेष कुजूर जैसे शीर्ष स्प्रिंटर्स के साथ 'हाई-परफॉर्मेंस बबल' में रोज़ाना ट्रेनिंग करते हैं, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धी धार बनी रहती है। उन्होंने कहा, "दबाव एक अच्छी चीज़ है — जब दबाव को सही प्रक्रिया के साथ मिलाया जाए, तो वह अच्छा होता है।" कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स में पदक जीतना उनका घोषित लक्ष्य है — और उनके अनुसार, यही एकमात्र स्वीकार्य नतीजा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

उसका खेल अस्तित्व में नहीं माना जाता। नीरज चोपड़ा का उदाहरण सटीक है, लेकिन यह भी सच है कि जैवलिन की लोकप्रियता एक ओलंपिक गोल्ड के बाद रातोरात आई — उससे पहले दशकों की मेहनत और बुनियादी ढाँचे की उपेक्षा रही। शिर्से जैसे एथलीट लकड़ी के हर्डल्स से राष्ट्रीय रिकॉर्ड तक पहुँचते हैं, यह उनकी प्रतिभा का प्रमाण है — लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठाता है कि अगर बुनियादी सुविधाएँ समय पर मिलती तो क्या भारत और भी तेज़ हो सकता था। हर्डल्स में सांस्कृतिक बदलाव के लिए एक पदक ज़रूरी है, पर पदक के लिए पहले निवेश ज़रूरी है — यह चक्र तब तक नहीं टूटेगा जब तक खेल नीति परिणाम के बाद नहीं, बल्कि परिणाम से पहले सक्रिय हो।
RashtraPress
21 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तेजस शिर्से कौन हैं और उनकी उपलब्धि क्या है?
तेजस शिर्से 23 वर्षीय भारतीय एथलीट हैं जो 110 मीटर हर्डल्स (बाधा दौड़) में राष्ट्रीय रिकॉर्ड धारक हैं। उन्होंने लुधियाना में 13.27 सेकंड का समय निकालकर कॉमनवेल्थ गेम्स का क्वालीफिकेशन मानक पार किया।
तेजस शिर्से का 'मिशन चमत्कार' क्या था?
टखने की गंभीर चोट के बाद अप्रैल में ट्रेनिंग शुरू कर मई-जून में क्वालीफिकेशन हासिल करने के लक्ष्य को शिर्से ने 'मिशन चमत्कार' नाम दिया था। रिलायंस फाउंडेशन की स्पोर्ट्स साइंस टीम की मदद से उन्होंने यह लक्ष्य पूरा किया।
तेजस शिर्से कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स में किन प्रतिद्वंद्वियों का सामना करेंगे?
कॉमनवेल्थ गेम्स में जमैका और कैरिबियन के शीर्ष हर्डलर्स, खासकर डेमारियो प्रिंस, कड़ी चुनौती देंगे। एशियन गेम्स में जापान और चीन के एथलीट प्रमुख प्रतिद्वंद्वी होंगे।
शिर्से हर्डल्स को भारत में जैवलिन जैसी लोकप्रियता कैसे दिलाना चाहते हैं?
शिर्से का मानना है कि नीरज चोपड़ा के ओलंपिक गोल्ड ने जैसे जैवलिन को घर-घर पहुँचाया, वैसे ही अगर वे कॉमनवेल्थ या एशियन गेम्स में पदक जीतें तो हर्डल्स को भी भारत में नई पहचान मिल सकती है। उनका कहना है कि भारत में हीरोज़ की ज़रूरत होती है जिन्हें देखकर युवा प्रेरित हों।
तेजस शिर्से की ट्रेनिंग की पृष्ठभूमि क्या है?
छत्रपति संभाजीनगर में पले-बढ़े शिर्से के पास शुरुआत में आधुनिक हर्डल्स नहीं थे — उन्होंने लकड़ी के हर्डल्स बनाकर और इंटरनेट ट्यूटोरियल्स से सीखकर अभ्यास किया। आर्थिक और पारिवारिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने राष्ट्रीय रिकॉर्ड तक का सफर तय किया।
राष्ट्र प्रेस
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