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दक्षिण चीन सागर विवाद: 12 देशों ने 2016 के ऐतिहासिक फैसले की 10वीं वर्षगांठ पर 'मुक्त हिंद-प्रशांत' का संकल्प दोहराया

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दक्षिण चीन सागर विवाद: 12 देशों ने 2016 के ऐतिहासिक फैसले की 10वीं वर्षगांठ पर 'मुक्त हिंद-प्रशांत' का संकल्प दोहराया

सारांश

2016 के ऐतिहासिक मध्यस्थता फैसले की 10वीं वर्षगांठ पर अमेरिका की अगुवाई में 12 देशों ने साफ संदेश दिया — दक्षिण चीन सागर में चीन के 'ऐतिहासिक अधिकारों' का कोई कानूनी आधार नहीं। यह बयान केवल रस्म नहीं, बल्कि नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की रक्षा के लिए पश्चिमी और एशियाई देशों की बढ़ती एकजुटता का संकेत है।

मुख्य बातें

अमेरिका सहित 12 देशों ने 12 जुलाई 2025 को संयुक्त बयान जारी कर 'मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत' के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई।
बयान हेग मध्यस्थता फैसले की 10वीं वर्षगांठ पर जारी किया गया, जिसमें चीन के समुद्री दावों को कानूनी आधारहीन बताया गया था।
हस्ताक्षरकर्ताओं में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान, फिलीपींस, यूनाइटेड किंगडम सहित कुल 12 देश शामिल हैं।
बयान में तटरक्षक बल, सैन्य जहाजों और समुद्री मिलिशिया के ज़रिये उत्पीड़न और डराने-धमकाने की कड़ी आलोचना की गई।
दक्षिण चीन सागर पर चीन, फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान के आपसी दावे इस क्षेत्र को हिंद-प्रशांत का सबसे संवेदनशील रणनीतिक केंद्र बनाते हैं।
सभी देशों ने आसियान के क्षेत्रीय दृष्टिकोण का समर्थन किया और शांतिपूर्ण समाधान की अपील की।

वाशिंगटन से जारी एक संयुक्त बयान में अमेरिका सहित 12 देशों ने 12 जुलाई 2025 को 'मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत' के प्रति अपनी अटल प्रतिबद्धता पुनः रेखांकित की और दक्षिण चीन सागर पर 2016 में आए ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता फैसले को एक बार फिर वैध ठहराया। यह बयान उस फैसले की 10वीं वर्षगांठ के अवसर पर जारी किया गया, जो संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (यूएनसीएलओएस) के तहत गठित न्यायाधिकरण ने 12 जुलाई 2016 को सुनाया था।

संयुक्त बयान में क्या कहा गया

बयान पर हस्ताक्षर करने वाले देशों में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, एस्टोनिया, जापान, लातविया, लिथुआनिया, न्यूजीलैंड, फिलीपींस, रोमानिया, स्लोवेनिया और यूनाइटेड किंगडम शामिल हैं। इन देशों ने कहा कि वे 'एक शांतिपूर्ण, स्थिर, नियम-आधारित और अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित मुक्त एवं खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र' के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।

बयान में स्पष्ट किया गया कि समुद्री विवादों का समाधान बल प्रयोग या दबाव के ज़रिये नहीं, बल्कि यूएनसीएलओएस के अनुसार शांतिपूर्ण तरीके से होना चाहिए। देशों ने दोहराया कि 2016 का फैसला चीन और फिलीपींस के बीच समुद्री अधिकारों और दावों से जुड़े मामलों में 'अंतिम, कानूनी रूप से बाध्यकारी और निर्णायक' है।

चीन के दावों पर न्यायाधिकरण का रुख

हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय ने 12 जुलाई 2016 को फिलीपींस के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा था कि दक्षिण चीन सागर में चीन के तथाकथित 'ऐतिहासिक अधिकारों' का अंतरराष्ट्रीय कानून में कोई आधार नहीं है। संयुक्त बयान में भी इसी निष्कर्ष को दोहराया गया। गौरतलब है कि चीन ने उस फैसले को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था और आज भी अपने व्यापक समुद्री दावों पर कायम है।

समुद्री और हवाई स्वतंत्रता पर जोर

हस्ताक्षरकर्ता देशों ने समुद्री और हवाई मार्गों की स्वतंत्र आवाजाही तथा समुद्र के अन्य वैध अंतरराष्ट्रीय उपयोगों को बनाए रखने के महत्व पर जोर दिया। बयान में तटरक्षक बल, सैन्य जहाजों और समुद्री मिलिशिया के इस्तेमाल से दूसरे देशों की वैध गतिविधियों में बाधा डालने, डराने-धमकाने या उत्पीड़न करने की कड़ी आलोचना की गई। कहा गया कि ऐसी कार्रवाइयों से समुद्र में मौजूद कर्मियों और मछुआरों की सुरक्षा खतरे में पड़ती है।

दक्षिण चीन सागर का रणनीतिक महत्व

दक्षिण चीन सागर दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक है। इस क्षेत्र पर चीन, फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान पूरे या आंशिक दावे करते हैं। इन दावों को लेकर कई बार तटरक्षक और नौसैनिक जहाज आमने-सामने आ चुके हैं, जिससे यह इलाका हिंद-प्रशांत क्षेत्र का सबसे संवेदनशील रणनीतिक केंद्र बन गया है। यह ऐसे समय में आया है जब इस क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ रहा है और आसियान (एएसईएएन) देश भी स्थिरता की दिशा में सक्रिय प्रयास कर रहे हैं।

आगे की राह

सभी हस्ताक्षरकर्ता देशों ने संबंधित पक्षों से 2016 के फैसले का सम्मान करने और बातचीत तथा अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत उपलब्ध वैध तरीकों से विवादों का शांतिपूर्ण समाधान निकालने की अपील की। बयान में आसियान के क्षेत्रीय दृष्टिकोण का भी समर्थन किया गया और दक्षिण चीन सागर को 'शांति, स्थिरता, सहयोग और समृद्धि का समुद्र' बनाने की साझा इच्छाशक्ति जताई गई।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसकी व्यावहारिक सीमाएँ भी स्पष्ट हैं — चीन ने 2016 का फैसला मानने से पहले भी इनकार किया था और आज भी उसका रुख नहीं बदला है। 12 देशों की यह एकजुटता पश्चिमी गठबंधन की बढ़ती चिंता को दर्शाती है, परंतु भारत जैसे प्रमुख हिंद-प्रशांत देश का इस बयान से अनुपस्थित रहना उल्लेखनीय है। असली परीक्षा यह है कि क्या यह बयान केवल वार्षिक रस्म बनकर रह जाएगा, या इसके पीछे ठोस कूटनीतिक और सैन्य समन्वय भी होगा। जब तक चीन पर वास्तविक दबाव नहीं बनता, ऐसे बयान क्षेत्रीय स्थिति को बदलने में सीमित भूमिका ही निभाते हैं।
RashtraPress
12 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

12 देशों का 'मुक्त हिंद-प्रशांत' संयुक्त बयान क्या है?
यह 12 जुलाई 2025 को वाशिंगटन से जारी एक संयुक्त कूटनीतिक बयान है, जिसमें अमेरिका सहित 12 देशों ने 'मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत' के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई और दक्षिण चीन सागर पर 2016 के मध्यस्थता फैसले को वैध ठहराया। यह बयान उस फैसले की 10वीं वर्षगांठ के अवसर पर जारी किया गया।
2016 का दक्षिण चीन सागर मध्यस्थता फैसला क्या था?
12 जुलाई 2016 को हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय ने फिलीपींस के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा था कि दक्षिण चीन सागर में चीन के 'ऐतिहासिक अधिकारों' का यूएनसीएलओएस के तहत कोई कानूनी आधार नहीं है। चीन ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया था।
इस संयुक्त बयान पर किन देशों ने हस्ताक्षर किए?
बयान पर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, एस्टोनिया, जापान, लातविया, लिथुआनिया, न्यूजीलैंड, फिलीपींस, रोमानिया, स्लोवेनिया और यूनाइटेड किंगडम — कुल 12 देशों — ने हस्ताक्षर किए।
दक्षिण चीन सागर पर किन देशों के दावे हैं और विवाद क्यों है?
दक्षिण चीन सागर पर चीन, फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान पूरे या आंशिक दावे करते हैं। यह क्षेत्र दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक है और इन दावों को लेकर कई बार तटरक्षक व नौसैनिक जहाज आमने-सामने आ चुके हैं।
इस बयान का चीन पर क्या असर पड़ेगा?
बयान कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है और चीन ने पहले भी 2016 के फैसले को मानने से इनकार किया है। हालाँकि, यह 12 देशों की राजनीतिक एकजुटता को दर्शाता है और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सामूहिक दबाव बनाने की कोशिश है।
राष्ट्र प्रेस
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