दक्षिण चीन सागर मध्यस्थता फैसला अवैध और अमान्य: संयुक्त राष्ट्र में चीन का दो-टूक रुख
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र में चीन के उप स्थायी प्रतिनिधि सुन लेई ने 17 जून 2025 को न्यूयॉर्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) के सदस्य देशों की 36वीं बैठक में स्पष्ट किया कि तथाकथित 'दक्षिण चीन सागर मध्यस्थता मामले' का फैसला अवैध और अमान्य है। कुछ देशों द्वारा इस मुद्दे को बहुपक्षीय मंच पर फिर से उठाए जाने के बाद चीन ने अपना दृढ़ रुख सार्वजनिक किया।
मध्यस्थता मामले पर चीन की आपत्ति
सुन लेई ने कहा कि मध्यस्थ न्यायाधिकरण ने 'राज्य की सहमति' के मूलभूत सिद्धांत का उल्लंघन करते हुए अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निर्णय दिया। उन्होंने इस मध्यस्थता को 'कानूनी मामले की आड़ में राजनीतिक उकसावा' करार दिया, जिसका एकमात्र उद्देश्य दक्षिण चीन सागर में चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता और समुद्री अधिकारों को नकारना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि चीन ने इस फैसले को कभी स्वीकार नहीं किया और किसी भी परिस्थिति में यह फैसला चीन के समुद्री अधिकारों एवं हितों को प्रभावित नहीं करेगा।
मंच की उपयुक्तता पर सवाल
सुन लेई ने यह भी रेखांकित किया कि UNCLOS सदस्य देशों की यह बैठक दक्षिण चीन सागर विवाद पर चर्चा के लिए उपयुक्त मंच नहीं है। फिर भी, कुछ देशों द्वारा भ्रामक दावों को बार-बार उठाए जाने के कारण चीन को अपना पक्ष स्पष्ट करना आवश्यक लगा। यह ऐसे समय में आया है जब दक्षिण चीन सागर में तनाव के नए दौर को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चिंता बढ़ रही है।
आसियान के साथ सहयोग और स्थिरता का दावा
चीनी प्रतिनिधि ने बताया कि चीन और आसियान देशों के संयुक्त प्रयासों से दक्षिण चीन सागर में स्थिति वर्तमान में सामान्यतः स्थिर है। चीन, आसियान देशों के साथ मिलकर दक्षिण चीन सागर में पक्षकारों के आचरण संबंधी घोषणापत्र को पूर्ण और प्रभावी ढंग से लागू करने तथा आचार संहिता पर परामर्श प्रक्रिया को गति देने के लिए प्रतिबद्ध है। उनका कहना था कि चीन दक्षिण चीन सागर को 'शांति, मित्रता और सहयोग का सागर' बनाने का पक्षधर है।
संबंधित देशों से चीन की अपील
सुन लेई ने संबंधित देशों से आग्रह किया कि वे बहुपक्षीय मंचों पर इस मुद्दे का प्रचार बंद करें और द्विपक्षीय परामर्श के माध्यम से विवादों को सुलझाने के रास्ते पर लौटें। गौरतलब है कि चीन लंबे समय से इस विवाद को अंतरराष्ट्रीय न्यायिक मंचों के बजाय सीधी बातचीत से हल करने का समर्थक रहा है, जबकि फिलीपींस और अन्य दावेदार देश बहुपक्षीय दबाव को प्राथमिकता देते हैं।