दक्षिण चीन सागर: 14 देशों के संयुक्त बयान पर भड़का बीजिंग, जापानी दूत तलब
सारांश
मुख्य बातें
बीजिंग ने 13 जुलाई 2025 को जापानी दूतावास के वरिष्ठ अधिकारी को तलब कर कड़ा विरोध दर्ज कराया, जब जापान सहित 14 देशों ने दक्षिण चीन सागर पर 2016 के हेग मध्यस्थता फैसले के समर्थन में संयुक्त बयान जारी किया। चीन ने टोक्यो पर क्षेत्रीय शांति एवं स्थिरता को कमज़ोर करने का आरोप लगाया और इस बयान को अपनी संप्रभुता पर सीधा हमला बताया।
संयुक्त बयान में क्या कहा गया
जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, कनाडा, फिलीपींस और कई यूरोपीय देशों ने मिलकर हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय के 12 जुलाई 2016 के फैसले की पुष्टि की। इस बयान में स्पष्ट किया गया कि यह फैसला अंतिम, कानूनी रूप से बाध्यकारी और चीन तथा फिलीपींस के बीच समुद्री दावों के संबंध में निर्णायक है।
उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) के तहत दिए गए उस ऐतिहासिक फैसले में न्यायाधिकरण ने कहा था कि दक्षिण चीन सागर में चीन की तथाकथित 'नाइन-डैश लाइन' के आधार पर किए गए व्यापक दावों का अंतरराष्ट्रीय कानून में कोई आधार नहीं है।
चीन की तीखी प्रतिक्रिया
चीनी विदेश मंत्रालय ने एक बार फिर इस फैसले को 'बेकार कागज़ का टुकड़ा' बताते हुए खारिज कर दिया। मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि बाहरी शक्तियाँ इस फैसले का इस्तेमाल दक्षिण चीन सागर में हस्तक्षेप और अस्थिरता पैदा करने के बहाने के रूप में कर रही हैं।
प्रवक्ता ने जापान के विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोतेगी के बयान की विशेष रूप से निंदा की और कहा कि उन्होंने चीन के वैध दावों पर हमला करते हुए जापान को दक्षिण चीन सागर का 'वैध हितधारक' बताकर तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया। चीन का तर्क है कि जापान इस विवाद का पक्षकार नहीं है और उसे चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं।
चीन ने द्वितीय विश्व युद्ध के इतिहास का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि टोक्यो एक बार फिर क्षेत्रीय मामलों में हस्तक्षेप करने की कोशिश कर रहा है। प्रवक्ता के अनुसार, इससे जापान के अतीत के सैन्य विस्तारवाद की याद आती है और उसकी कथित नव-सैन्यवाद (नियो-मिलिटैरिज्म) की नीति को लेकर चिंता बढ़ती है।
जापान का पक्ष
जापान के मुख्य कैबिनेट सचिव मिनोरू किहारा ने स्पष्ट किया कि उनका देश समुद्री क्षेत्रों में कानून के शासन को बनाए रखने और मज़बूत करने का लगातार समर्थन करता रहा है। उन्होंने कहा कि 14 देशों का यह संयुक्त बयान अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर शांतिपूर्ण, स्थिर और मुक्त एवं खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दोहराता है।
चीन ने यह भी आरोप लगाया कि जापान फिलीपींस के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाकर दक्षिण चीन सागर में तनाव को और बढ़ावा दे रहा है।
विवाद की पृष्ठभूमि
बीजिंग का दावा है कि दक्षिण चीन सागर के लगभग 90 प्रतिशत हिस्से पर उसका ऐतिहासिक अधिकार है। हालाँकि, इस क्षेत्र पर वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया, ब्रुनेई और इंडोनेशिया भी अपने-अपने विशेष आर्थिक क्षेत्रों (EEZ) के आधार पर दावा करते हैं। चीन ने 2016 के फैसले को कभी स्वीकार नहीं किया और आज भी उसे अवैध, अमान्य और गैर-बाध्यकारी करार देता है।
यह ऐसे समय में आया है जब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में पश्चिमी देशों और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा पहले से ही तीव्र है। गौरतलब है कि यह कोई पहली बार नहीं है जब चीन ने इस फैसले के समर्थन पर किसी देश के राजनयिक को तलब किया हो — यह बीजिंग की उस स्थापित कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वह किसी भी बाहरी आलोचना को संप्रभुता पर हमला बताकर दबाने की कोशिश करता है।
आगे क्या होगा
इस घटनाक्रम के बाद बीजिंग और टोक्यो के बीच कूटनीतिक तनाव और गहरा होने की आशंका है। विशेषज्ञों के अनुसार, फिलीपींस के साथ जापान का बढ़ता रक्षा सहयोग और 14 देशों का यह समन्वित बयान संकेत देता है कि दक्षिण चीन सागर पर अंतरराष्ट्रीय दबाव आने वाले महीनों में और बढ़ सकता है।