417वाँ मैसूर दशहरा 2026: चामुंडी पहाड़ियों पर उद्घाटन, सीएम शिवकुमार बोले — 'यह शक्ति, ज्ञान और समानता का संगम'
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक के ऐतिहासिक मैसूर दशहरा के 417वें संस्करण का रविवार, 11 अक्टूबर 2026 को भव्य शुभारंभ हुआ। कोप्पल स्थित गविसिद्धेश्वर मठ के अभिनव गविसिद्धेश्वर स्वामीजी ने चामुंडी पहाड़ियों पर वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक पूजा-अर्चना के बीच शुभ धनुर लग्न में माँ चामुंडेश्वरी की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर इस 11 दिवसीय नाडा हब्बा (राज्य उत्सव) का उद्घाटन किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार, उनकी पत्नी उषा शिवकुमार, कई मंत्री, विधायक और वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।
मुख्यमंत्री का संबोधन: संस्कृति और समानता का दर्शन
सभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कहा कि मैसूर दशहरा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि कर्नाटक की सांस्कृतिक पहचान, सौहार्द और आत्मसम्मान का प्रतीक है। उन्होंने कहा, 'दशहरा शक्ति, ज्ञान, संस्कृति और समानता का संगम है — शक्ति उपलब्धि दिलाती है, ज्ञान विकास लाता है, संस्कृति समानता को बढ़ावा देती है और समानता शांति का मार्ग प्रशस्त करती है।'
शिवकुमार ने दर्शन की गहराई से बात करते हुए कहा, 'अज्ञानता के कांटे को ज्ञान के कांटे से निकालना शिक्षा है, जबकि अधर्म के कांटे को धर्म के कांटे से निकालना दशहरा है। मंदिर में भगवान को देखना भक्ति है, लेकिन इंसानों में भगवान को देखना मानवता है।'
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: राजतंत्र से लोकतंत्र तक
मुख्यमंत्री ने बताया कि इस उत्सव की जड़ें विजयनगर साम्राज्य के शासकों तक जाती हैं, जिन्होंने दशहरे की परंपरा की नींव रखी। बाद में मैसूर के वाडियार राजाओं ने इसे कला और संस्कृति के संरक्षण का प्रमुख मंच बनाया। उन्होंने नलवाडी कृष्णराज वाडियार के योगदान का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि 'ब्रांड मैसूर' को गढ़ने में उनकी भूमिका अतुलनीय रही — मैसूर सिल्क, मैसूर सैंडल सोप, मैसूर पेंटिंग, मैसूर पाक और कन्नंबाड़ी बांध ने शहर को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
शिवकुमार ने रेखांकित किया कि दशहरा एक शाही उत्सव से विकसित होकर जनता का उत्सव बन चुका है और यह राजतंत्र से लोकतंत्र तक की गौरवशाली यात्रा को दर्शाता है। गौरतलब है कि अगले 11 दिनों तक देशभर के पर्यटक और श्रद्धालु मैसूर के माध्यम से भारत की संस्कृति और विरासत को करीब से देख सकेंगे।
कला और परंपराओं को मंच: कंबाला से यक्षगान तक
मुख्यमंत्री ने कहा कि दशहरा कर्नाटक की पारंपरिक कला विधाओं जैसे डोल्लू कुनिता, तमाटे, नगारी, वीरगासे, कोलाटा और यक्षगान के लिए एक बड़ा मंच बन चुका है। इस उत्सव के ज़रिए हजारों रंगकर्मी, गायक और संगीतकार अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं।
उन्होंने विजयनगर के शासकों की भैंसा लाने की ऐतिहासिक परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि इस वर्ष पारंपरिक भैंसा दौड़ कंबाला के माध्यम से उसी सांस्कृतिक स्मृति को जीवंत किया जा रहा है, भले ही इसकी कुछ आलोचना भी हुई हो।
सरकारी योजनाएँ और गारंटियाँ
शिवकुमार ने गृह लक्ष्मी योजना का जिक्र करते हुए बताया कि महिलाओं को ₹2,000 की मासिक सहायता देने वाली इस योजना को माँ चामुंडेश्वरी के चरणों में समर्पित किए जाने के 1,139 दिन पूरे हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार अपनी गारंटी योजनाओं के माध्यम से सामाजिक समानता को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।
मुख्यमंत्री ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का आभार व्यक्त किया, जिन्होंने उनकी अपील स्वीकार करते हुए दशहरा समारोह में तीनों सेनाओं के दलों की भागीदारी सुनिश्चित की। कवि कुवेंपु के विश्वमानवता के दर्शन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मानवता को धर्म और सामाजिक विभाजनों से ऊपर उठकर विश्व शांति का आधार बनना चाहिए।
जल संरक्षण का आह्वान
मुख्यमंत्री ने अभिनव गविसिद्धेश्वर स्वामीजी के जल संरक्षण अभियान 'जलदीक्षा' की सराहना करते हुए कहा कि पानी की बर्बादी भविष्य की पीढ़ियों के जीवन-रक्त को बहाने के समान है। उन्होंने राज्यभर के नागरिकों से जल संरक्षण का संकल्प लेने की अपील की।
समारोह से पहले शिवकुमार ने कुप्पन्ना पार्क स्थित ग्लास हाउस में संविधान की प्रतिकृति को पुष्पांजलि अर्पित कर दशहरा फल एवं पुष्प प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। इस भव्य आयोजन में मंत्री रामलिंगा रेड्डी, ईश्वर खंड्रे, यतिंद्र सिद्धारमैया, पुट्टरंगा शेट्टी, सांसद सुनील बोस, विधायक और विभिन्न बोर्डों के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे। आगामी 11 दिनों में मैसूर की सड़कें सांस्कृतिक रंगों, शाही हाथियों के जुलूस और पारंपरिक कलाओं से जीवंत रहेंगी।