मैसूर दशहरा 2026: 417वीं जंबू सवारी शुरू, CM शिवकुमार ने देवी चामुंडेश्वरी को अर्पित किए पुष्प
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने 21 अक्टूबर 2026 को मैसूर पैलेस में 750 किलोग्राम वजनी सोने के हौदे में विराजमान देवी चामुंडेश्वरी की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर ऐतिहासिक 417वीं जंबू सवारी शोभायात्रा का औपचारिक शुभारंभ किया। यह भव्य आयोजन मैसूर दशहरा उत्सव का सबसे प्रतीक्षित और भव्य समापन समारोह है, जो हर वर्ष विजयादशमी के दिन निकाला जाता है।
शुभारंभ का अनुष्ठान
यह विशेष अनुष्ठान महल परिसर में शुभ 'मीन लग्न' के दौरान संपन्न किया गया, जिसके साथ ही जुलूस की औपचारिक शुरुआत हुई। सुबह से ही महल के बाहर जमा हजारों श्रद्धालुओं ने देवी चामुंडेश्वरी की स्तुति में नारे लगाए और इस ऐतिहासिक क्षण का उत्साहपूर्वक स्वागत किया।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री शिवकुमार की पत्नी उषा शिवकुमार, तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी, केरल के मुख्यमंत्री वी.डी. सतीसन, शहरी विकास मंत्री एवं मैसूर जिले के प्रभारी यतींद्र सिद्धारमैया, कन्नड़ और संस्कृति मंत्री शिवराज तंगदगी, मैसूर पुलिस आयुक्त सीमा लातकर, मुख्य सचिव शालिनी रजनीश, मैसूर के शाही वंशज एवं भारतीय जनता पार्टी (BJP) सांसद यदुवीर वाडियार तथा उपायुक्त लक्ष्मिकांत रेड्डी उपस्थित रहे।
कैप्टन प्रशांत की ऐतिहासिक भूमिका
इस वर्ष सोने का हौदा 'कैप्टन प्रशांत' नाम के हाथी पर आरूढ़ किया गया। यह हाथी अब तक 16 बार जंबू सवारी जुलूस में भाग ले चुका है, परंतु यह पहला अवसर है जब उसने मुख्य देवता की प्रतिमा सहित सोने के हौदे को लेकर जुलूस का नेतृत्व किया। कैप्टन प्रशांत के दोनों ओर 'रूपा' और 'कावेरी' नामक 'कुम्की' (सहायक) हाथी मार्गदर्शन कर रहे हैं। इस साल कुल 12 प्रशिक्षित हाथी जंबू सवारी में शामिल हैं।
देवी चामुंडेश्वरी की प्रतिमा को इस अवसर के लिए हरी साड़ी से सुसज्जित किया गया था, जो परंपरागत रूप से शुभता और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है।
जंबू सवारी का महत्व और परंपरा
जंबू सवारी कर्नाटक के 10 दिवसीय राज्योत्सव मैसूर दशहरा का सबसे भव्य अंतिम जुलूस है। इसमें देवी चामुंडेश्वरी की प्रतिमा को 750 किलोग्राम के सोने के हौदे में रखकर सुसज्जित हाथी मैसूर पैलेस से बन्नीमंटप तक ले जाता है। जुलूस में सजे-धजे हाथी, पुलिस बैंड, सैन्य घुड़सवार, लोक नर्तक और सरकारी विभागों की रंग-बिरंगी झांकियाँ सम्मिलित होती हैं। यह परेड बन्नीमंटप में पारंपरिक मशाल परेड (टॉर्चलाइट परेड) के साथ समाप्त होती है।
गौरतलब है कि यह उत्सव 'नादा हब्बा' (राज्य उत्सव) के रूप में मनाया जाता है और 'शरण नवरात्रि' के नाम से भी जाना जाता है। यह कर्नाटक की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और शाही परंपराओं की जीवंत अभिव्यक्ति है।
लाखों श्रद्धालुओं का जमावड़ा
मैसूर दशहरा की जंबू सवारी को देखने के लिए प्रतिवर्ष लाखों पर्यटक और श्रद्धालु कर्नाटक की सांस्कृतिक राजधानी मैसूर पहुँचते हैं। इस वर्ष का आयोजन विशेष रूप से भव्य रहा, जिसमें 11 दिवसीय उत्सव का समापन अभूतपूर्व उत्साह के साथ हुआ। 417 वर्षों की अटूट परंपरा के साथ यह जुलूस भारत के सबसे पुराने और भव्यतम सांस्कृतिक आयोजनों में से एक बना हुआ है, और आने वाले वर्षों में भी इसकी गरिमा बनाए रखने की दिशा में सरकारी प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखती है।