AAP में बड़ा भूचाल: राघव चड्ढा समेत 3 राज्यसभा सांसद BJP में शामिल, केजरीवाल अब 'संजय' से सुनेंगे पार्टी का हाल
सारांश
Key Takeaways
- 24 अप्रैल 2026 को AAP के राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने पार्टी छोड़कर BJP में शामिल होने की घोषणा की।
- राघव चड्ढा ने दावा किया कि राज्यसभा में AAP के 10 में से 7 सांसद इस मुहिम में उनके साथ हैं और हस्ताक्षरित दस्तावेज सभापति को सौंपे गए।
- हरभजन सिंह, विक्रम साहनी, राजेंद्र गुप्ता और स्वाति मालीवाल के भी इस कदम में शामिल होने का दावा किया गया।
- AAP की स्थापना 26 नवंबर 2012 को हुई थी और 2013 में पार्टी ने 70 में से 28 सीटें जीतकर इतिहास रचा था।
- पार्टी से अब तक योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, कुमार विश्वास, किरण बेदी, कपिल मिश्रा समेत दर्जनों संस्थापक सदस्य अलग हो चुके हैं।
- अब केजरीवाल के पास राज्यसभा में केवल संजय सिंह, एनडी गुप्ता और राजिंदर गुप्ता ही शेष हैं।
नई दिल्ली, 24 अप्रैल 2026 — आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए 24 अप्रैल 2026 का दिन किसी सियासी तूफान से कम नहीं रहा। पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने एक साथ पार्टी छोड़ने और भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने की घोषणा कर दी। इसके साथ ही राघव चड्ढा ने दावा किया कि राज्यसभा में AAP के 10 में से 7 सांसद इस मुहिम में उनके साथ हैं और जरूरी दस्तावेज राज्यसभा सभापति को सौंप दिए गए हैं।
सियासी सुनामी: एक दिन में तीन सांसदों का इस्तीफा
राघव चड्ढा ने पार्टी छोड़ते हुए AAP पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा, "जिस AAP को मैंने 15 सालों तक अपने खून से सींचा, वह अपने मूल सिद्धांतों से भटक गई है। यह पार्टी अब देशहित के लिए नहीं, बल्कि निजी फायदों के लिए काम कर रही है।" उन्होंने यह भी बताया कि हरभजन सिंह, राजेंद्र गुप्ता, विक्रम साहनी और स्वाति मालीवाल भी इस कदम में उनके साथ हैं।
यह घटनाक्रम AAP के लिए उस समय और भी घातक साबित हुआ जब यह स्पष्ट हो गया कि राज्यसभा में पार्टी की दो-तिहाई से अधिक संसदीय ताकत एक झटके में बिखर सकती है। अब पार्टी के पास राज्यसभा में केवल संजय सिंह, एनडी गुप्ता और राजिंदर गुप्ता ही शेष बचे हैं।
अन्ना आंदोलन से AAP तक — एक सपने का सफर और उसका टूटना
5 अप्रैल 2011 को जंतर-मंतर, नई दिल्ली पर अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आमरण अनशन शुरू किया था। इस आंदोलन का असली सूत्रधार अरविंद केजरीवाल थे, जिनके साथ मंच पर किरण बेदी, कुमार विश्वास, योगेंद्र यादव, शांति भूषण, प्रशांत भूषण, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और जनरल वीके सिंह जैसे चेहरे नजर आए।
16 अगस्त 2011 को रामलीला मैदान में दूसरे अनशन के दौरान रोज करीब दो लाख लोग जुटे। जनता की इस ताकत को देखकर 2 अगस्त 2012 को केजरीवाल ने राजनीतिक दल बनाने की घोषणा की और 26 नवंबर 2012 को आम आदमी पार्टी अस्तित्व में आई।
दिसंबर 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में AAP ने 70 में से 28 सीटें जीतीं और 28 दिसंबर 2013 को उसी रामलीला मैदान में केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली — वह मैदान जहां से इस सपने की शुरुआत हुई थी।
टूटते विश्वास की लंबी फेहरिस्त — AAP से कौन-कौन गया?
AAP के इतिहास में नेताओं का पार्टी छोड़ना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इसका पैटर्न बेहद चिंताजनक रहा है। संस्थापक सदस्यों में से योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और शाजिया इल्मी सबसे पहले अलग हुए। इसके बाद प्रो. आनंद कुमार, पूर्व विधायक विनोद बिन्नी और पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा ने बगावत की। कपिल मिश्रा ने तो केजरीवाल पर सत्येंद्र जैन से दो करोड़ रुपये लेने का सीधा आरोप लगाया था।
कुमार विश्वास को पंजाब चुनाव प्रचार से दूर रखा गया, पीएसी से हटाया गया और राजस्थान प्रभारी का पद छीना गया। किरण बेदी ने भी AAP छोड़ BJP का दामन थामा और उनके चेहरे पर दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ा गया। आशुतोष, मधु भादुरी, मयंक गांधी, आशीष खेतान, अंजलि दमानिया, सुभाष वारे, अश्विनी उपाध्याय, अजीत झा, कैप्टन जीआर गोपीनाथ और अलका लांबा जैसे दर्जनों चेहरे पार्टी से अलग हो चुके हैं।
गौरतलब है कि शांति भूषण ने AAP की स्थापना के समय एक करोड़ रुपये चंदे के रूप में दिए थे — वे भी जल्द ही पार्टी से मोहभंग के शिकार हो गए।
विरोधाभास और विडंबना — जो पार्टी भ्रष्टाचार से लड़ने आई, वह खुद कटघरे में
यह एक बड़ी विडंबना है कि जो पार्टी भ्रष्टाचार के खिलाफ जनांदोलन की कोख से जन्मी, उसके शीर्ष नेता अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन खुद भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल जा चुके हैं। जनता ने AAP को "स्वच्छ राजनीति" का प्रतीक माना था, लेकिन आलोचकों का कहना है कि पार्टी का आचरण वही हो गया जिसके विरोध में वह खड़ी हुई थी।
पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र की कमी का मुद्दा 2015 में ही उठ गया था जब योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया। "एक व्यक्ति, एक पद" की मांग करने वाले प्रो. आनंद कुमार को भी किनारे कर दिया गया। यह पैटर्न दर्शाता है कि पार्टी में असहमति की कोई जगह नहीं थी।
अब आगे क्या — केजरीवाल और AAP का भविष्य
अब AAP के पास राज्यसभा में मात्र 3 सांसद बचे हैं। अरविंद केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद संजय सिंह ही वह कड़ी हैं जो पार्टी को संसद में आवाज देते हैं। पार्टी के गठन से लेकर आज तक "शांति, विश्वास और आस" — तीनों टूट चुकी हैं। अब केजरीवाल को शिखर पर बैठकर "संजय" से पार्टी के भीतर चल रहे इस महाभारत का हाल सुनना पड़ेगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि 4 और सांसद वाकई पार्टी छोड़ते हैं, तो AAP की राज्यसभा में औपचारिक मान्यता खतरे में पड़ सकती है। 2027 में होने वाले विभिन्न राज्यों के चुनावों से पहले यह संकट पार्टी की साख और संगठनात्मक ढांचे दोनों के लिए अस्तित्व की लड़ाई बन सकता है।