अफगानिस्तान में भूख का कहर: परिवार जिंदा रहने के लिए बच्चों को बेचने पर मजबूर, 2.8 करोड़ गरीबी में
सारांश
मुख्य बातें
अफगानिस्तान में मानवीय संकट अब एक अकल्पनीय मोड़ पर पहुँच गया है — कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अत्यधिक गरीबी और भुखमरी से घिरे परिवार अपने बच्चों को — और अक्सर अपनी बेटियों को — भोजन, इलाज या कर्ज से राहत पाने के लिए बेचने पर मजबूर हो रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN) के आँकड़ों के अनुसार, 2025 में अफगानिस्तान में लगभग 2.8 करोड़ लोग गरीबी में जी रहे थे, और हर चार में से तीन अफगान अपनी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने में असमर्थ हैं। यह संकट अब कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक व्यापक पैटर्न बनता जा रहा है।
मुख्य घटनाक्रम: घोर प्रांत से आई दिल दहलाने वाली रिपोर्ट
इस सप्ताह घोर प्रांत से आई एक मीडिया रिपोर्ट में कई ऐसे परिवारों को दिखाया गया जो भूख और बेरोजगारी के चलते अपनी बेटियाँ बेचने पर विवश हो गए। एक पिता, सईद अहमद, ने बताया कि उन्हें अपनी पाँच साल की बेटी शाइका को 2,00,000 अफगानी (लगभग 3,200 अमेरिकी डॉलर से कम) में बेचना पड़ा — ताकि उसकी लिवर सिस्ट और अपेंडिसाइटिस की सर्जरी का खर्च उठाया जा सके। उन्होंने यह शर्त रखी थी कि खरीदार शाइका को तभी ले जा सकेगा जब सर्जरी पूरी हो जाए। सर्जरी सफल रही।
एक अन्य परेशान पिता ने एक ब्रिटिश पब्लिक ब्रॉडकास्टर को बताया कि वह इतने गरीब, कर्ज में डूबे और बेबस हो चुके हैं कि अपनी सात साल की जुड़वाँ बेटियों — रोकिया और रोहिला — को बेचने के लिए भी तैयार हैं। उनका कहना था कि भुखमरी से बचने का कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा।
संकट की गहराई: आँकड़े जो झकझोर देते हैं
रिपोर्टों के अनुसार, अफगानिस्तान में लगभग 50 लाख लोग भूख के आपातकालीन स्तर का सामना कर रहे हैं। कुपोषण और स्वास्थ्य सेवाओं के ठप होने के कारण बच्चों की मौतें बढ़ रही हैं। बेरोजगारी अपने चरम पर है और स्वास्थ्य ढाँचा बुरी तरह चरमरा गया है।
यूएन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में अफगानिस्तान की वास्तविक जीडीपी में केवल 1.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई — जो पिछले साल के 2.3 प्रतिशत से कम है। वहीं, आबादी में बढ़ोतरी की दर 6.5 प्रतिशत तक पहुँच गई, जिसके परिणामस्वरूप प्रति व्यक्ति वास्तविक जीडीपी में अनुमानित 2.1 प्रतिशत की गिरावट आई।
तालिबान और अंतरराष्ट्रीय मदद की कटौती: संकट के मूल कारण
जानकारों का कहना है कि तालिबान के सत्ता में लौटने और अधिकांश अंतरराष्ट्रीय सहायता बंद हो जाने के बाद से यह संकट और गहरा गया है। तालिबान द्वारा महिलाओं और लड़कियों पर लगाई गई पाबंदियों ने स्थिति को और भी बदतर बना दिया है। गौरतलब है कि वह सहायता, जो कभी लाखों लोगों की बुनियादी ज़रूरतें पूरी करती थी, अब घटकर बेहद कम रह गई है।
यह ऐसे समय में आया है जब बड़ी संख्या में लोगों की वापसी, लगातार सूखे की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय मदद में कमी ने मिलकर एक ऐसा वातावरण बना दिया है जहाँ घोर गरीबी अपवाद नहीं, बल्कि आम बात बन गई है।
बच्चों की बिक्री: अब इक्का-दुक्का नहीं, एक पैटर्न
इससे पहले आई रिपोर्टों में भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें माता-पिता ने बताया कि उन्होंने एक बच्चे को इसलिए बेचा क्योंकि दूसरे बच्चे भूख से मर रहे थे। रिपोर्टें इस बात को उजागर करती हैं कि यह कोई अलग-थलग घटना नहीं, बल्कि एक व्यापक और बढ़ता हुआ चलन है। आने वाले समय में यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह संकट और अधिक परिवारों को इसी दिशा में धकेल सकता है।