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अग्रे और मालवन एएसडब्ल्यू क्राफ्ट जल्द नौसेना में शामिल, हांगोर पनडुब्बियों से निपटने की तैयारी

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अग्रे और मालवन एएसडब्ल्यू क्राफ्ट जल्द नौसेना में शामिल, हांगोर पनडुब्बियों से निपटने की तैयारी

सारांश

भारतीय नौसेना के दो नए एएसडब्ल्यू क्राफ्ट — अग्रे और मालवन — कमीशनिंग की दहलीज पर हैं, ठीक उसी समय जब पाकिस्तान की पहली हांगोर क्लास पनडुब्बी चीन से रवाना होकर श्रीलंका में रुकी है और कराची की ओर बढ़ रही है। यह संयोग नहीं, रणनीतिक तैयारी है।

मुख्य बातें

अग्रे और मालवन एएसडब्ल्यू शैलो वॉटर क्राफ्ट जल्द भारतीय नौसेना में औपचारिक रूप से शामिल होंगे; इन्हें नौसेना को सौंपा जा चुका है।
2019 में 16 एएसडब्ल्यू क्राफ्ट के निर्माण का अनुबंध हुआ था — 8 कोचिन शिपयार्ड और 8 जीआरएसई, कोलकाता में।
इस श्रृंखला में अब तक आईएनएस अर्णाला, अंद्रोत्त, माहे और अंजदीप — चार पोत कमीशन हो चुके हैं।
पाकिस्तान की पहली हांगोर क्लास पनडुब्बी वर्तमान में श्रीलंका में रुकी है; पीएनएस तैमूर और पीएनएस असलत एस्कॉर्ट कर रहे हैं।
हांगोर क्लास टाइप-039बी युआन क्लास का निर्यात संस्करण है; 2015 में 5-6 अरब डॉलर का चीन-पाकिस्तान समझौता हुआ था।
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार हांगोर की एआईपी प्रणाली और प्रोपल्शन तकनीक में विश्वसनीयता संबंधी कमियाँ कथित तौर पर मौजूद हैं।

भारतीय नौसेना की एंटी-सबमरीन वॉरफेयर (एएसडब्ल्यू) शैलो वॉटर क्राफ्ट श्रृंखला में दो नए युद्धपोत — 'अग्रे' और 'मालवन' — जल्द ही औपचारिक रूप से शामिल किए जाएंगे। इन्हें नौसेना को सौंपा जा चुका है और इनका कमीशनिंग समारोह निकट भविष्य में होने की उम्मीद है। यह कदम ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान की पहली हांगोर क्लास पनडुब्बी हिंद महासागर क्षेत्र से होते हुए कराची नौसैनिक अड्डे की ओर बढ़ रही है।

एएसडब्ल्यू परियोजना का विस्तार

वर्ष 2019 में भारत सरकार ने 16 एएसडब्ल्यू शैलो वॉटर क्राफ्ट के निर्माण का अनुबंध किया था। इनमें से आठ का निर्माण कोचिन शिपयार्ड और आठ का निर्माण गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई), कोलकाता में हो रहा है। नौसेना के अनुसार, अब तक इस श्रृंखला में आईएनएस अर्णाला, आईएनएस अंद्रोत्त, आईएनएस माहे और आईएनएस अंजदीप — चार पोत कमीशन किए जा चुके हैं। 'अग्रे' और 'मालवन' इस कड़ी की अगली कड़ी हैं।

युद्धपोतों की तकनीकी क्षमताएँ

इन क्राफ्ट की सबसे बड़ी ताकत उनकी उन्नत पनडुब्बी-रोधी प्रणाली है। ये एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर, लाइटवेट टॉरपीडो, 30 मिमी नौसैनिक तोप, एएसडब्ल्यू कॉम्बैट सूट, हल-माउंटेड सोनार और लो-फ्रीक्वेंसी वैरिएबल डेप्थ सोनार से लैस हैं। इनकी अधिकतम गति लगभग 25 नॉट है और ये एक बार में करीब 3,300 किलोमीटर की दूरी तय कर सकते हैं।

ये पोत तट से 100 से 150 नॉटिकल मील की दूरी तक दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने में सक्षम हैं। विशेष रूप से 30 से 40 मीटर की गहराई वाले उथले समुद्री क्षेत्रों में संचालित पनडुब्बियों को खोजना, उनका पीछा करना और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें नष्ट करना इनका प्राथमिक उद्देश्य है। इसके अतिरिक्त ये बड़े युद्धपोतों के लिए समुद्री मार्ग को सुरक्षित बनाने का कार्य भी करते हैं।

पाकिस्तान की हांगोर पनडुब्बी की गतिविधि

खुफिया सूचनाओं के अनुसार पाकिस्तान की हांगोर क्लास की पहली पनडुब्बी इस समय हिंद महासागर क्षेत्र में है। यह चीन से रवाना होकर मलेशिया और इंडोनेशिया के रास्ते सुंडा जलडमरूमध्य से गुजरते हुए वर्तमान में श्रीलंका में रुकी हुई है। इसका अंतिम गंतव्य कराची नौसैनिक अड्डा बताया जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, चीन से रवाना होने के बाद इस पनडुब्बी ने अब तक एक बार भी गोता नहीं लगाया और पूरी यात्रा सतह पर रहते हुए तय की है। इसे पीएनएस तैमूर और पीएनएस असलत — दो पाकिस्तानी युद्धपोत एस्कॉर्ट कर रहे हैं। खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक इस पनडुब्बी पर पाकिस्तानी और चीनी, दोनों देशों के चालक दल मौजूद हैं।

हांगोर क्लास की तकनीकी सीमाएँ

पाकिस्तान की आठ हांगोर क्लास पनडुब्बियों में से चार का निर्माण चीन में और शेष चार का निर्माण ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (टीओटी) के तहत कराची शिपयार्ड में हो रहा है। हांगोर क्लास, चीन की टाइप-039बी युआन क्लास पनडुब्बी का निर्यात संस्करण है। वर्ष 2015 में चीन और पाकिस्तान के बीच लगभग 5 से 6 अरब डॉलर का यह समझौता हुआ था।

हालाँकि हांगोर क्लास अपेक्षाकृत नई है, विभिन्न रिपोर्टों में इसकी तकनीकी कमियों की ओर भी संकेत किया गया है। रक्षा जानकारों का कहना है कि प्रतिबंधों के कारण जर्मनी के एमटीयू डीजल इंजन उपलब्ध नहीं हो सके, जिससे चीन को अपने सीएचडी-620 इंजन का उपयोग करना पड़ा। विशेषज्ञों के अनुसार कुछ चीनी डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियाँ आधुनिक पश्चिमी पनडुब्बियों की तुलना में अधिक शोर उत्पन्न करती हैं, जिससे उनका पता लगाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।

एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एआईपी) प्रणाली की विश्वसनीयता को लेकर भी रक्षा विश्लेषकों में संशय बना हुआ है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान को उपलब्ध कराई जा रही तकनीक चीन की अपनी नौसेना में इस्तेमाल हो रही अत्याधुनिक प्रणालियों की तुलना में कम उन्नत है। आकार में बड़ी होने के कारण इसकी गतिशीलता भी सीमित मानी जाती है।

आगे की राह

अग्रे और मालवन के कमीशन होने के बाद भारतीय नौसेना के पास इस श्रृंखला में छह एएसडब्ल्यू शैलो वॉटर क्राफ्ट हो जाएंगे, और शेष दस के निर्माण का कार्य जारी है। गौरतलब है कि यह परियोजना भारत की 'आत्मनिर्भर भारत' रक्षा नीति के तहत स्वदेशी जहाज निर्माण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जो हिंद महासागर में बढ़ती पनडुब्बी गतिविधियों के बीच भारत की समुद्री सुरक्षा को नई मजबूती देगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन भारत के लिए असली चुनौती तब होगी जब सभी आठ हांगोर पनडुब्बियाँ परिचालन में आएंगी। 16 एएसडब्ल्यू क्राफ्ट की पूरी श्रृंखला के पूर्ण होने में अभी समय है, और इस बीच की खिड़की रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। स्वदेशी निर्माण की गति और गुणवत्ता दोनों पर नज़र रखना ज़रूरी है।
RashtraPress
4 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अग्रे और मालवन एएसडब्ल्यू शैलो वॉटर क्राफ्ट क्या हैं?
ये भारतीय नौसेना के लिए निर्मित पनडुब्बी-रोधी युद्धपोत हैं, जो 2019 में अनुबंधित 16 एएसडब्ल्यू शैलो वॉटर क्राफ्ट श्रृंखला का हिस्सा हैं। इन्हें नौसेना को सौंपा जा चुका है और जल्द ही औपचारिक कमीशनिंग होगी।
भारतीय एएसडब्ल्यू क्राफ्ट की मुख्य क्षमताएँ क्या हैं?
ये क्राफ्ट एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर, लाइटवेट टॉरपीडो, 30 मिमी नौसैनिक तोप, हल-माउंटेड सोनार और लो-फ्रीक्वेंसी वैरिएबल डेप्थ सोनार से लैस हैं। ये 25 नॉट की गति से चलते हैं और तट से 100-150 नॉटिकल मील तक पनडुब्बियों का पता लगा सकते हैं।
पाकिस्तान की हांगोर क्लास पनडुब्बी अभी कहाँ है?
खुफिया सूचनाओं के अनुसार यह पनडुब्बी वर्तमान में श्रीलंका में रुकी हुई है और पीएनएस तैमूर व पीएनएस असलत के एस्कॉर्ट में कराची नौसैनिक अड्डे की ओर बढ़ रही है। चीन से रवाना होने के बाद इसने सुंडा जलडमरूमध्य के रास्ते यात्रा की है।
हांगोर क्लास पनडुब्बी में क्या तकनीकी कमियाँ बताई जा रही हैं?
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार प्रतिबंधों के कारण जर्मन एमटीयू इंजन न मिलने से चीनी सीएचडी-620 इंजन का उपयोग करना पड़ा, जो अधिक शोर उत्पन्न करता है। एआईपी प्रणाली की विश्वसनीयता को लेकर भी संशय है और आकार में बड़ी होने से इसकी गतिशीलता सीमित मानी जाती है।
भारत में एएसडब्ल्यू क्राफ्ट का निर्माण कहाँ हो रहा है?
2019 के अनुबंध के तहत 16 में से 8 क्राफ्ट कोचिन शिपयार्ड और 8 गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई), कोलकाता में बन रहे हैं। यह परियोजना भारत के स्वदेशी रक्षा निर्माण कार्यक्रम का हिस्सा है।
राष्ट्र प्रेस
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