भोजशाला फैसले पर अखिल भारतीय संत समिति का स्वागत, स्वामी जितेंद्रानंद बोले — मथुरा-काशी भी छोड़ें

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भोजशाला फैसले पर अखिल भारतीय संत समिति का स्वागत, स्वामी जितेंद्रानंद बोले — मथुरा-काशी भी छोड़ें

सारांश

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भोजशाला को मंदिर माना और ASI की नमाज़ अनुमति खारिज की — अखिल भारतीय संत समिति ने इसे ऐतिहासिक बताया। स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने मुस्लिम संगठनों से मथुरा और काशी भी स्वेच्छा से छोड़ने का आग्रह किया।

मुख्य बातें

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भोजशाला को मंदिर मानते हुए फैसला सुनाया और ASI द्वारा दी गई नमाज़ की अनुमति को खारिज किया।
अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने फैसले का स्वागत किया।
स्वामी जितेंद्रानंद ने मुस्लिम धर्मगुरुओं से कृष्ण जन्मभूमि (मथुरा) और काशी ज्ञानवापी स्वेच्छा से छोड़ने का आग्रह किया।
मथुरा के दिनेश शर्मा फलाहारी ने कहा कि यह फैसला कृष्ण जन्मभूमि और काशी मामलों में कानूनी दलीलों को मजबूत करेगा।
अयोध्या धाम के महंत सीताराम दास ने फैसले को संपूर्ण हिंदू समाज के लिए गौरव का दिन बताया।

अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने भोजशाला मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले का खुलकर स्वागत किया है। 15 मई को नई दिल्ली में अपनी प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि यह निर्णय हिंदू समाज की दीर्घकालीन आस्था और संघर्ष को न्यायिक मान्यता देता है।

संत समिति की प्रतिक्रिया

स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि संत समिति का यह मानना रहा है कि देश के प्रसिद्ध मंदिरों को तोड़कर मस्जिदें बनाई गईं। उन्होंने आरोप लगाया कि हिंदू समाज को अपमानित करने के उद्देश्य से माँ सरस्वती के परिसर के भीतर जबरदस्ती नमाज़ अदा की जाती रही। उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा नमाज़ की अनुमति देने के निर्णय को भी उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया है, जिसका संत समिति स्वागत करती है।

मथुरा और काशी पर आग्रह

स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने मुस्लिम धर्मगुरुओं और उनके धार्मिक संगठनों से आग्रह किया कि वे मथुरा और काशी के विवादित स्थलों को भी स्वेच्छा से छोड़ दें। उनके अनुसार इन स्थलों के संबंध में भी उतने ही ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध हैं जितने श्रीराम जन्मभूमि और धार भोजशाला के मामले में न्यायालय में प्रस्तुत किए गए थे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि कृष्ण जन्मभूमि और काशी ज्ञानवापी को अंततः छोड़ना ही होगा।

अन्य धर्मगुरुओं की प्रतिक्रिया

मथुरा के दिनेश शर्मा फलाहारी ने उच्च न्यायालय के फैसले को हिंदुओं के लिए एक ऐतिहासिक निर्णय बताया। उन्होंने कहा कि न्यायालय ने भोजशाला को मंदिर माना है। फलाहारी ने यह भी कहा कि मुगल शासकों ने तलवार के बल पर अनगिनत मंदिरों पर अवैध कब्जा किया था और धार्मिक स्थलों को तोड़ा था। उनके अनुसार यह फैसला कृष्ण जन्मभूमि और काशी से जुड़े मामलों में कानूनी दलीलों को और मजबूत करेगा।

अयोध्या धाम स्थित साकेत भवन मंदिर के महंत सीताराम दास ने भी इस फैसले की सराहना की। उन्होंने कहा, 'जो धर्म पथ पर चलेगा, धर्म उसकी रक्षा करेगा।' महंत सीताराम दास ने इस दिन को संपूर्ण हिंदू समाज के लिए गौरव का दिन बताया और अदालत के प्रति आभार व्यक्त किया।

फैसले का व्यापक संदर्भ

गौरतलब है कि भोजशाला विवाद दशकों पुराना है और यह मामला हिंदू-मुस्लिम धार्मिक स्थलों से जुड़े कई अन्य विवादों के साथ राष्ट्रीय चर्चा में रहा है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब कृष्ण जन्मभूमि और काशी ज्ञानवापी से जुड़े मुकदमे भी विभिन्न अदालतों में विचाराधीन हैं। धार्मिक संगठनों का मानना है कि यह निर्णय उन मामलों में एक मिसाल के रूप में काम कर सकता है। आगे इस फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है, जो इस विवाद का अगला निर्णायक पड़ाव होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

वह यह है कि इस फैसले का कानूनी प्रभाव और धार्मिक संगठनों की माँगें दो अलग-अलग धाराएँ हैं — एक न्यायिक, दूसरी राजनीतिक। इन दोनों को एक साथ रखकर देखना ज़रूरी है।
RashtraPress
15 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भोजशाला मामले में उच्च न्यायालय का फैसला क्या है?
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भोजशाला को मंदिर माना है और ASI द्वारा वहाँ नमाज़ की दी गई अनुमति को खारिज कर दिया है। यह फैसला हिंदू पक्ष की दीर्घकालीन माँग के अनुरूप माना जा रहा है।
अखिल भारतीय संत समिति ने फैसले पर क्या कहा?
संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने फैसले का स्वागत किया और कहा कि माँ सरस्वती के परिसर में जबरदस्ती नमाज़ अदा की जाती रही, जो हिंदू समाज का अपमान था। उन्होंने ASI की नमाज़ अनुमति खारिज होने को भी सकारात्मक बताया।
स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने मथुरा और काशी के बारे में क्या कहा?
उन्होंने मुस्लिम धर्मगुरुओं और धार्मिक संगठनों से आग्रह किया कि वे कृष्ण जन्मभूमि (मथुरा) और काशी ज्ञानवापी को स्वेच्छा से छोड़ दें। उनके अनुसार इन स्थलों के ऐतिहासिक प्रमाण श्रीराम जन्मभूमि और भोजशाला जितने ही सशक्त हैं।
भोजशाला फैसले का कृष्ण जन्मभूमि और काशी मामलों पर क्या असर होगा?
दिनेश शर्मा फलाहारी के अनुसार यह फैसला इन दोनों मामलों में कानूनी दलीलों को मजबूत करेगा। हालाँकि, ये मामले अभी भी अलग-अलग अदालतों में स्वतंत्र रूप से विचाराधीन हैं और भोजशाला का फैसला उन पर सीधे बाध्यकारी नहीं है।
महंत सीताराम दास ने फैसले पर क्या प्रतिक्रिया दी?
अयोध्या धाम स्थित साकेत भवन मंदिर के महंत सीताराम दास ने फैसले को अत्यंत सराहनीय बताया और अदालत के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने इस दिन को संपूर्ण हिंदू समाज के लिए गौरव का दिन कहा।
राष्ट्र प्रेस
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