भोजशाला फैसले पर अखिल भारतीय संत समिति का स्वागत, स्वामी जितेंद्रानंद बोले — मथुरा-काशी भी छोड़ें
सारांश
मुख्य बातें
अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने भोजशाला मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले का खुलकर स्वागत किया है। 15 मई को नई दिल्ली में अपनी प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि यह निर्णय हिंदू समाज की दीर्घकालीन आस्था और संघर्ष को न्यायिक मान्यता देता है।
संत समिति की प्रतिक्रिया
स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि संत समिति का यह मानना रहा है कि देश के प्रसिद्ध मंदिरों को तोड़कर मस्जिदें बनाई गईं। उन्होंने आरोप लगाया कि हिंदू समाज को अपमानित करने के उद्देश्य से माँ सरस्वती के परिसर के भीतर जबरदस्ती नमाज़ अदा की जाती रही। उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा नमाज़ की अनुमति देने के निर्णय को भी उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया है, जिसका संत समिति स्वागत करती है।
मथुरा और काशी पर आग्रह
स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने मुस्लिम धर्मगुरुओं और उनके धार्मिक संगठनों से आग्रह किया कि वे मथुरा और काशी के विवादित स्थलों को भी स्वेच्छा से छोड़ दें। उनके अनुसार इन स्थलों के संबंध में भी उतने ही ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध हैं जितने श्रीराम जन्मभूमि और धार भोजशाला के मामले में न्यायालय में प्रस्तुत किए गए थे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि कृष्ण जन्मभूमि और काशी ज्ञानवापी को अंततः छोड़ना ही होगा।
अन्य धर्मगुरुओं की प्रतिक्रिया
मथुरा के दिनेश शर्मा फलाहारी ने उच्च न्यायालय के फैसले को हिंदुओं के लिए एक ऐतिहासिक निर्णय बताया। उन्होंने कहा कि न्यायालय ने भोजशाला को मंदिर माना है। फलाहारी ने यह भी कहा कि मुगल शासकों ने तलवार के बल पर अनगिनत मंदिरों पर अवैध कब्जा किया था और धार्मिक स्थलों को तोड़ा था। उनके अनुसार यह फैसला कृष्ण जन्मभूमि और काशी से जुड़े मामलों में कानूनी दलीलों को और मजबूत करेगा।
अयोध्या धाम स्थित साकेत भवन मंदिर के महंत सीताराम दास ने भी इस फैसले की सराहना की। उन्होंने कहा, 'जो धर्म पथ पर चलेगा, धर्म उसकी रक्षा करेगा।' महंत सीताराम दास ने इस दिन को संपूर्ण हिंदू समाज के लिए गौरव का दिन बताया और अदालत के प्रति आभार व्यक्त किया।
फैसले का व्यापक संदर्भ
गौरतलब है कि भोजशाला विवाद दशकों पुराना है और यह मामला हिंदू-मुस्लिम धार्मिक स्थलों से जुड़े कई अन्य विवादों के साथ राष्ट्रीय चर्चा में रहा है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब कृष्ण जन्मभूमि और काशी ज्ञानवापी से जुड़े मुकदमे भी विभिन्न अदालतों में विचाराधीन हैं। धार्मिक संगठनों का मानना है कि यह निर्णय उन मामलों में एक मिसाल के रूप में काम कर सकता है। आगे इस फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है, जो इस विवाद का अगला निर्णायक पड़ाव होगा।