ईरान का अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी रणनीति पर पलटवार, फारस की खाड़ी में तनाव बढ़ने की चेतावनी
सारांश
Key Takeaways
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन और संसद स्पीकर एमबी गालिबाफ ने 30 अप्रैल को अमेरिकी प्रशासन की कथित नौसैनिक नाकेबंदी रणनीति को सीधे तौर पर खारिज करते हुए कहा कि यह न केवल अंतरराष्ट्रीय कानून के विरुद्ध है, बल्कि फारस की खाड़ी में तनाव को और गहरा करेगी। तस्नीम न्यूज एजेंसी के अनुसार, पेजेश्कियन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ऐसी कोई भी नाकेबंदी "विफल होकर ही रहेगी"।
पेजेश्कियन का कड़ा बयान
पर्शियन गल्फ नेशनल डे के अवसर पर दिए अपने संदेश में राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और फारस की खाड़ी को ईरानियों की राष्ट्रीय पहचान का अभिन्न अंग और ईरान की संप्रभुता का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि समुद्री नाकेबंदी जैसे कदम क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के बजाय तनाव बढ़ाते हैं और स्थायी शांति को बाधित करते हैं। यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका-ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों को लेकर तनाव पहले से ही चरम पर है।
गालिबाफ का ट्रंप और बेसेंट पर तंज
ईरानी संसद के स्पीकर गालिबाफ ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट के बयानों पर सीधा तंज कसते हुए कहा, "तीन दिन बीत गए, कोई तेल कुआं नहीं फटा। इसे 30 दिन तक बढ़ाकर लाइव भी दिखाया जा सकता है।" उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिकी प्रशासन को गलत सलाह दी जा रही है, जिसके चलते वैश्विक तेल कीमतों में उछाल आया है और स्थिति और जटिल हो गई है।
ट्रंप और बेसेंट के दावे
इससे पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया था कि अमेरिकी नाकेबंदी जारी रहने पर ईरान का तेल ढांचा "तीन दिनों में फट सकता है।" वहीं, ट्रेजरी सेक्रेटरी बेसेंट ने सोशल मीडिया पर कहा था कि अमेरिकी 'ब्लॉकेड' के चलते ईरान का तेल उत्पादन ठप होने की कगार पर है और जल्द ही पेट्रोल की कमी हो सकती है। गालिबाफ के बयान को इन्हीं दावों के प्रत्युत्तर के रूप में देखा जा रहा है।
वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर असर
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और फारस की खाड़ी वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण जलमार्ग हैं, जहां से दुनिया के एक बड़े हिस्से को कच्चा तेल निर्यात होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की नाकेबंदी या सैन्य तनाव वैश्विक तेल आपूर्ति और व्यापार को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। गौरतलब है कि अमेरिका और ईरान के बीच दशकों से चले आ रहे तनाव — विशेषकर ईरान के परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों को लेकर — इस क्षेत्र को बार-बार टकराव का केंद्र बनाते रहे हैं।
आगे क्या होगा
ईरान की ओर से इस तरह की कड़ी प्रतिक्रिया संकेत देती है कि तेहरान किसी भी दबाव के आगे झुकने के मूड में नहीं है। आलोचकों का कहना है कि यदि दोनों पक्षों के बीच कूटनीतिक संवाद नहीं बढ़ा, तो फारस की खाड़ी में सैन्य टकराव की आशंका और गहरी हो सकती है, जिसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ेगा।