क्या मोदी-शाह के खिलाफ आपत्तिजनक नारे लगाने वालों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए?
सारांश
Key Takeaways
- अशोक चौधरी ने जेएनयू में नारों की कड़ी आलोचना की।
- कड़ी कार्रवाई की मांग की गई है।
- लोकतांत्रिक असहमति और संविधान का सम्मान जरूरी है।
- जेएनयू प्रशासन ने मामले की जांच शुरू की है।
- सामाजिक सद्भाव बनाए रखने की आवश्यकता।
पटना, 6 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। बिहार सरकार के मंत्री अशोक चौधरी ने जेएनयू में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ आपत्तिजनक नारों की तीव्र निंदा की है। उन्होंने कहा कि इस तरह के कार्य करने वालों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
पटना में मंत्री अशोक चौधरी ने राष्ट्र प्रेस से बातचीत में कहा कि यह ग़लत है। भारत की न्यायिक व्यवस्था में विश्वास रखना आवश्यक है। न्यायिक प्रक्रिया अपने तरीके से चलती है। विरोध प्रदर्शन करना अनुचित है। जिन लोगों ने मोदी और अमित शाह के खिलाफ टिप्पणियां की हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। सरकार जनता द्वारा चुनी गई है, किसी के आशीर्वाद से नहीं। इस प्रकार की भाषा का प्रयोग करना अनुचित है। पीएम मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं, किसी राज्य या पार्टी के नहीं। देश में रहकर ऐसी बातें करना सरासर गलत है। संविधान के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। बोलने की आज़ादी का मतलब यह नहीं कि आप कुछ भी कह सकते हैं।
भाजपा सांसद बृजलाल ने कहा कि जेएनयू में बर्दाश्त करने योग्य नारे लगाए गए हैं, जिन्हें सहन नहीं किया जा सकता। यहां अफज़ल गुरु, याकूब मेमन, उमर खालिद, शरजील इमाम, आतंकियों और नक्सलियों के समर्थन में नारे लगते हैं, यह देशद्रोह है। दोषियों को आतंकी घोषित करके कड़ी कार्रवाई की आवश्यकता है।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की ओर से जारी एक नोटिस में कहा गया है कि जेएनयू प्रशासन ने बीती रात साबरमती कैंपस में हुए प्रदर्शन के वीडियो को गंभीरता से लिया है, जिसमें जेएनयूएसयू से जुड़े छात्रों के एक समूह ने अत्यंत आपत्तिजनक, भड़काऊ और उत्तेजक नारे लगाए थे। सक्षम प्राधिकारी ने इस घटना को गंभीरता से लिया है और सुरक्षा शाखा को जांच में पुलिस के साथ सहयोग करने का निर्देश दिया है। ऐसे नारे लगाना लोकतांत्रिक असहमति के बिल्कुल विपरीत है और जेएनयू कोड ऑफ कंडक्ट का उल्लंघन करता है तथा इससे सार्वजनिक व्यवस्था, कैंपस में सद्भाव और विश्वविद्यालय तथा देश की सुरक्षा एवं संरक्षा के माहौल को गंभीर रूप से प्रभावित होने की संभावना है।
ऐसा कार्य संवैधानिक संस्थाओं तथा सिविल एवं लोकतांत्रिक संवाद के स्थापित नियमों का जानबूझकर अपमान दर्शाता है। सभी को असहमति, गाली-गलौज और घृणा फैलाने वाली भाषा के बीच स्पष्ट अंतर समझना चाहिए, जिससे सार्वजनिक अव्यवस्था फैलती है। सभी से अनुरोध है कि वे ऐसी किसी भी अनावश्यक गतिविधि में शामिल होने से बचें तथा कैंपस में शांति और भाईचारा बनाए रखने में सहयोग करें। ऐसा न करने पर नियमों के अनुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी।