असम-अरुणाचल सीमा विवाद: 123 गांवों का मामला काफी हद तक सुलझा, CM पेमा खांडू का बड़ा बयान
सारांश
मुख्य बातें
अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने 14 अक्टूबर 2026 को इटानगर में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में असम-अरुणाचल प्रदेश सीमा पर स्थित 123 गांवों से जुड़े दशकों पुराने अंतरराज्यीय सीमा विवाद काफी हद तक सुलझा लिए गए हैं। यह बयान उस समय आया है जब दोनों राज्य 804 किलोमीटर लंबी साझा सीमा पर शांति और प्रशासनिक स्थिरता की दिशा में ठोस कदम उठा रहे हैं।
मुख्य घटनाक्रम
मुख्यमंत्री खांडू ने बताया कि क्षेत्रीय समितियों के हालिया संयुक्त क्षेत्र दौरों के बाद पापुम पारे जिले के 32 विवादित क्षेत्रों में से 31 का सफलतापूर्वक निपटारा हो चुका है। यह प्रगति उल्लेखनीय है क्योंकि यह विवाद वर्षों से दोनों राज्यों के बीच तनाव का कारण बना हुआ था।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि चकमा मुद्दे सहित अन्य लंबित विषयों को सुलझाने की प्रक्रिया भी प्रगति पर है। खांडू के अनुसार, लोगों को उचित समय पर सभी घटनाक्रमों से अवगत कराया जाएगा।
सांस्कृतिक संरक्षण पर जोर
मुख्यमंत्री ने बुधवार को नाहरलागुन के निकट ताराजुली स्थित गालो हेरिटेज सेंटर में डोनी पोलो बहुउद्देशीय हॉल का उद्घाटन किया। उन्होंने इस परियोजना को सामुदायिक भागीदारी और सांस्कृतिक संकल्प का प्रतीक बताया।
गौरतलब है कि नाहरलागुन स्थित मोपिन मैदान गालो समुदाय द्वारा स्वेच्छा से राज्य के पहले मेडिकल कॉलेज — टोमो रिबा इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एंड मेडिकल साइंसेज (TRIHMS) — के निर्माण के लिए सौंपा गया था। खांडू ने इसे सरकारी वित्त पोषण से कहीं बढ़कर जनभावना का उदाहरण बताया।
कौशल विकास और आत्मनिर्भरता का आह्वान
मुख्यमंत्री खांडू ने स्थानीय युवाओं से निर्माण, विद्युत और प्लंबिंग क्षेत्र में प्रशिक्षण लेने का आग्रह किया, ताकि राज्य बाहरी कुशल श्रमिकों पर निर्भरता कम कर सके। उन्होंने हैदराबाद के राष्ट्रीय कौशल केंद्र में प्रशिक्षित 50 युवाओं का उदाहरण दिया, जिन्होंने पासीघाट में एक परियोजना मात्र ₹10 लाख में पूरी की — जबकि बाहरी टीम ने इसके लिए ₹18 लाख का प्रस्ताव रखा था।
उन्होंने कहा कि विकसित देश श्रम को उच्च सम्मान देते हैं और अरुणाचल प्रदेश को भी ऐसी ही कार्य संस्कृति की आवश्यकता है।
आदिवासी पहचान और भाषा संरक्षण की चिंता
खांडू ने चेतावनी दी कि राष्ट्रीय संदर्भ में अरुणाचल प्रदेश की आदिवासी आबादी संख्या में सीमित है, और भाषा एवं परंपरा के लुप्त होने से जनजातीय पहचान खतरे में पड़ सकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार नीतिगत सहायता दे सकती है, लेकिन विरासत को संरक्षित कर अगली पीढ़ी तक पहुँचाने की ज़िम्मेदारी स्वयं समुदायों की है।
आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब पूर्वोत्तर भारत के कई राज्यों के बीच अंतरराज्यीय सीमा विवाद केंद्र सरकार की प्राथमिकता सूची में हैं। असम-मेघालय और असम-मिज़ोरम सीमा वार्ताओं के बाद अब असम-अरुणाचल प्रदेश मामले में भी प्रगति से क्षेत्रीय स्थिरता की उम्मीद बढ़ी है। शेष विवादित क्षेत्रों एवं चकमा मुद्दे पर भविष्य के घटनाक्रमों पर सभी की नज़रें टिकी हैं।