दीनदयाल उपाध्याय जयंती पर असम CM हिमंता का नमन — 'अंत्योदय से राष्ट्रोदय' की राह
सारांश
मुख्य बातें
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने 25 सितंबर 2026 को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनका अंत्योदय दर्शन आज भी शासन की दिशा तय करता है — यह सुनिश्चित करते हुए कि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर साझा की गई पोस्ट में सरमा ने अंत्योदय को सुशासन की आत्मा बताया।
मुख्यमंत्री का संदेश
सरमा ने एक्स पर लिखा, 'अंत्योदय से राष्ट्रोदय तक। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर मैं उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। उनका अंत्योदय का दर्शन आज भी हमारा मार्गदर्शन करता है, यह सुनिश्चित करता है कि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे और उसके माध्यम से राष्ट्र सशक्त बने।' यह संदेश असम सरकार की कल्याणकारी प्राथमिकताओं से भी सीधे जुड़ा है, जिसे मुख्यमंत्री अपने शासन एजेंडे के केंद्र में रखते हैं।
दीनदयाल उपाध्याय: विचार और विरासत
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 1916 में हुआ था। वे भारतीय जनसंघ के वरिष्ठ नेता और प्रमुख विचारक थे — जनसंघ ही आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) बना। उन्होंने एकात्म मानववाद का दर्शन प्रस्तुत किया और अंत्योदय की अवधारणा को सामाजिक-आर्थिक उत्थान के सिद्धांत के रूप में स्थापित किया, जिसमें समाज की सबसे निचली पायदान पर खड़े व्यक्ति के कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई।
प्रधानमंत्री मोदी ने भी किया स्मरण
इसी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पूर्व जनसंघ नेता को याद किया। उन्होंने समाज की आखिरी पंक्ति में खड़े व्यक्ति के उत्थान पर उपाध्याय के बल को रेखांकित किया और अंत्योदय को जन कल्याण व राष्ट्रीय प्रगति की प्रेरणाशक्ति बताया। गौरतलब है कि 25 सितंबर को राष्ट्रीय स्तर पर दीनदयाल उपाध्याय जयंती के रूप में मनाया जाता है, और BJP तथा उससे संबद्ध संगठन इस दिन देशभर में कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
असम में शासन एजेंडे से जुड़ाव
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा अक्सर कल्याणकारी योजनाओं और समावेशी विकास को अपनी सरकार के शासन एजेंडे के प्रमुख स्तंभ के रूप में सामने रखते हैं। उनकी यह श्रद्धांजलि भी उसी सोच की निरंतरता है — उपाध्याय के अंत्योदय दर्शन को समकालीन नीतिगत विमर्श से जोड़ने का प्रयास। यह ऐसे समय में आया है जब BJP शासित राज्यों में उपाध्याय की वैचारिक विरासत को प्रशासनिक प्रेरणा के रूप में सक्रिय रूप से उद्धृत किया जा रहा है।