13 जुलाई 2026
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यूपी में बालवाटिका क्रांति: 3-6 वर्ष के बच्चों को मिलेगी गतिविधि-आधारित प्री-प्राइमरी शिक्षा

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यूपी में बालवाटिका क्रांति: 3-6 वर्ष के बच्चों को मिलेगी गतिविधि-आधारित प्री-प्राइमरी शिक्षा

सारांश

योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश में पहली बार प्री-प्राइमरी शिक्षा को संस्थागत रूप देते हुए आंगनबाड़ी केंद्रों और बालवाटिकाओं में 3-6 वर्ष के बच्चों के लिए 'चहक', 'कदम', 'कलांकुर' जैसी आधुनिक शिक्षण सामग्री का वितरण शुरू किया है — और 'किताब वितरण ऐप' से रियल-टाइम निगरानी भी।

मुख्य बातें

योगी आदित्यनाथ सरकार ने 27 मई 2026 को प्रदेश के सभी को-लोकेटेड आंगनबाड़ी केंद्रों और बालवाटिकाओं में गतिविधि-आधारित शिक्षण सामग्री का वितरण शुरू किया।
वितरित सामग्री में 'चहक-1, 2, 3' , 'कदम' , 'कलांकुर' , 12 प्रकार की बिग बुक , होलिस्टिक रिपोर्ट कार्ड और बालवाटिका हस्तपुस्तिका शामिल हैं।
यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के ECCE विजन को लागू करने की दिशा में उठाया गया कदम है।
'किताब वितरण ऐप' के माध्यम से रियल-टाइम डिजिटल मॉनिटरिंग लागू की गई है; BSA, BEO, ARP, SRG और डायट मेंटर निगरानी के लिए जिम्मेदार।
लक्ष्य ग्रामीण और वंचित परिवारों के 3 से 6 वर्ष के बच्चों तक गुणवत्तापूर्ण प्री-प्राइमरी शिक्षा पहुंचाना।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने 27 मई 2026 को प्री-प्राइमरी शिक्षा को नई दिशा देते हुए प्रदेश के समस्त को-लोकेटेड आंगनबाड़ी केंद्रों और बालवाटिकाओं में 3 से 6 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों के लिए आधुनिक गतिविधि-आधारित शिक्षण सामग्री का वितरण शुरू किया है। यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (ECCE) के विजन को ज़मीन पर उतारने की दिशा में उठाया गया अब तक का सबसे व्यापक कदम माना जा रहा है।

शिक्षण सामग्री में क्या है खास

वितरित की जा रही सामग्री में 'चहक-1', 'चहक-2', 'चहक-3', 'कदम', 'कलांकुर', बालवाटिका हस्तपुस्तिका, 12 प्रकार की बिग बुक, होलिस्टिक रिपोर्ट कार्ड और शिक्षण तालिकाएं शामिल हैं। 'चहक' श्रृंखला की पुस्तिकाएं बच्चों में भाषा विकास, बोलने-सुनने की क्षमता और बुनियादी सीखने की दक्षताओं को पोषित करने के लिए तैयार की गई हैं।

'कदम' और 'कलांकुर' सामग्री बच्चों की रचनात्मकता, जिज्ञासा और बौद्धिक विकास को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। इसके साथ ही बिग बुक और टीचर गाइड के माध्यम से ECCE एजुकेटर्स और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को आधुनिक शिक्षण तकनीकों से सुसज्जित किया जाएगा।

आंगनबाड़ी से शिक्षा केंद्र तक का सफर

यह ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश पहले से ही स्मार्ट स्कूल, ऑपरेशन कायाकल्प, डिजिटल मॉनिटरिंग और निपुण भारत मिशन जैसे बड़े शिक्षा सुधार अभियान चला रहा है। गौरतलब है कि अब तक सरकारी शिक्षा व्यवस्था में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक कक्षाओं पर ही मुख्य फोकस रहता था — प्री-प्राइमरी स्तर को इस दायरे में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर संस्थागत रूप दिया जा रहा है।

बाल विकास विशेषज्ञों के अनुसार 3 से 6 वर्ष की आयु बच्चों के मानसिक, भाषाई और सामाजिक विकास की सबसे संवेदनशील अवस्था होती है। इसीलिए खेल-आधारित और बाल-केंद्रित शिक्षण पद्धतियों को इस चरण में प्राथमिकता देना वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

तकनीक से होगी रियल-टाइम निगरानी

योगी सरकार ने वितरण प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए 'किताब वितरण ऐप' के ज़रिए रियल-टाइम मॉनिटरिंग व्यवस्था लागू की है। बीएसए (BSA), बीईओ (BEO), प्रधानाध्यापक, एआरपी, एसआरजी और डायट मेंटर — इन सभी को वितरण की निगरानी और सामग्री की स्कैनिंग की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस डिजिटल तंत्र के ज़रिए शासन स्तर पर यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि कौन-सी बालवाटिका तक सामग्री पहुंची और कौन-सी अभी बाकी है।

ग्रामीण और वंचित बच्चों पर असर

इस अभियान का सबसे बड़ा लाभार्थी वर्ग ग्रामीण और आर्थिक रूप से वंचित परिवारों के बच्चे होंगे, जिनकी निजी प्री-स्कूलों तक पहुंच सीमित है। आंगनबाड़ी केंद्रों को केवल पोषण और देखभाल का स्थान न मानकर उन्हें प्रारंभिक शिक्षा के केंद्र के रूप में विकसित करने की यह सोच, आलोचकों के उस तर्क को भी संबोधित करती है जो सरकारी प्री-स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल उठाते रहे हैं।

आगे की राह

यदि क्रियान्वयन योजना के अनुरूप रहा, तो यह पहल उत्तर प्रदेश को प्री-प्राइमरी शिक्षा के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में स्थापित कर सकती है। अब असली परीक्षा यह होगी कि किताब वितरण ऐप की निगरानी व्यवस्था ज़मीनी स्तर पर कितनी प्रभावी साबित होती है और शिक्षण सामग्री का उपयोग कक्षाओं में वास्तव में हो रहा है या नहीं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी वितरण के बाद की है — क्या ये किताबें कक्षाओं में खुलेंगी या अलमारियों में बंद रहेंगी? 'किताब वितरण ऐप' से सामग्री की पहुंच तो नापी जा सकती है, पर शिक्षण की गुणवत्ता नहीं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण और प्रेरणा पर ध्यान दिए बिना सामग्री का वितरण अधूरा साबित हो सकता है। निपुण भारत मिशन के अनुभव से यह सबक मिला है कि लक्ष्य और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई को पाटने के लिए निरंतर जवाबदेही ज़रूरी है।
RashtraPress
13 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यूपी में बालवाटिका शिक्षा कार्यक्रम क्या है?
यह उत्तर प्रदेश सरकार की वह पहल है जिसके तहत प्रदेश के सभी को-लोकेटेड आंगनबाड़ी केंद्रों और बालवाटिकाओं में 3 से 6 वर्ष के बच्चों को 'चहक', 'कदम', 'कलांकुर' जैसी गतिविधि-आधारित शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के ECCE विजन को ज़मीन पर लागू करना है।
'चहक', 'कदम' और 'कलांकुर' सामग्री बच्चों के लिए कैसे उपयोगी है?
'चहक' श्रृंखला बच्चों में भाषा विकास, बोलने-सुनने की क्षमता और बुनियादी सीखने की दक्षताएं विकसित करती है। 'कदम' और 'कलांकुर' बच्चों की रचनात्मकता, जिज्ञासा और बौद्धिक विकास को बढ़ावा देने के लिए तैयार की गई हैं।
बालवाटिका शिक्षण सामग्री वितरण की निगरानी कैसे होगी?
योगी सरकार ने 'किताब वितरण ऐप' के माध्यम से रियल-टाइम डिजिटल मॉनिटरिंग व्यवस्था लागू की है। BSA, BEO, प्रधानाध्यापक, ARP, SRG और डायट मेंटर वितरण की निगरानी और सामग्री की स्कैनिंग के लिए जिम्मेदार हैं।
इस पहल से किन बच्चों को सबसे ज़्यादा फायदा होगा?
इस कार्यक्रम का सबसे बड़ा लाभ ग्रामीण और आर्थिक रूप से वंचित परिवारों के 3 से 6 वर्ष के बच्चों को मिलेगा, जिनकी निजी प्री-स्कूलों तक पहुंच सीमित है। आंगनबाड़ी केंद्रों को शिक्षा केंद्र के रूप में विकसित कर इन बच्चों को गुणवत्तापूर्ण प्रारंभिक शिक्षा दी जाएगी।
यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 से कैसे जुड़ी है?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (ECCE) को बच्चों की सीखने की बुनियाद माना गया है। उत्तर प्रदेश की यह पहल उसी नीतिगत ढांचे के अनुरूप आंगनबाड़ी केंद्रों को केवल पोषण केंद्र की बजाय प्रारंभिक शिक्षा केंद्र के रूप में विकसित करती है।
राष्ट्र प्रेस
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