1993 बोवबाजार बम ब्लास्ट: रशीद खान की रिहाई के खिलाफ पश्चिम बंगाल सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल सरकार ने 18 जून 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल कर दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें 1993 बोवबाजार बम विस्फोट मामले के दोषी मोहम्मद रशीद खान को रिहा करने और सजा में छूट देने का निर्देश दिया गया था। राज्य सरकार ने भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष मामले का उल्लेख कर शीघ्र सुनवाई की माँग की।
मामले की पृष्ठभूमि
मोहम्मद रशीद खान मार्च 1993 से जेल में बंद हैं — यानी 33 वर्षों से अधिक समय से। राज्य सजा समीक्षा बोर्ड ने 2015 में उनकी रिहाई की सिफारिश की थी, लेकिन टाडा मामलों से जुड़े कानूनी विवादों के कारण वह सिफारिश बाद में वापस ले ली गई। यह मामला तीन दशकों से न्यायिक प्रक्रिया में उलझा रहा है।
दिल्ली उच्च न्यायालय का आदेश
5 जून को न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की एकल पीठ ने आदेश दिया कि रशीद खान रिहाई के हकदार हैं। अदालत ने कहा कि जेल में उनका आचरण 'बहुत अच्छा' रहा है और पैरोल पर रिहाई के दौरान वे समय पर वापस लौटे, जिससे पुनरावृत्ति का जोखिम न्यूनतम प्रतीत होता है। उच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अपराध की गंभीरता को रिहाई से इनकार का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता, यदि अन्य सभी मानदंड पूरे होते हों।
पश्चिम बंगाल सरकार का पक्ष
राज्य सरकार ने रिहाई का विरोध करते हुए तर्क दिया कि रशीद खान इस विस्फोट का मास्टरमाइंड था और इस अपराध का समाज पर गंभीर प्रभाव पड़ा था। सर्वोच्च न्यायालय में SLP दाखिल कर राज्य ने उच्च न्यायालय के निर्देश पर रोक लगाने की माँग की है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने राज्य की दलीलें सुनने के बाद आश्वासन दिया कि याचिका पर शीघ्र सुनवाई पर विचार किया जाएगा।
कानूनी महत्व
यह मामला एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न उठाता है — क्या आतंकवाद से जुड़े गंभीर अपराधों में दीर्घकालिक कारावास और अच्छे आचरण के आधार पर सजा माफी दी जा सकती है? गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब टाडा-युग के मामलों में सजा समीक्षा की प्रक्रिया और मानदंड देशभर में न्यायिक विमर्श का हिस्सा बने हुए हैं।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा SLP पर सुनवाई की तारीख जल्द तय होने की उम्मीद है। तब तक दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश पर सर्वोच्च न्यायालय का रुख स्पष्ट होगा। यह फैसला भविष्य में टाडा और इसी तरह के विशेष कानूनों के तहत दोषियों की सजा समीक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।