सुप्रीम कोर्ट ने रोकी राशिद खान की रिहाई, 1993 कोलकाता बम धमाके के दोषी पर 28 जुलाई को अगली सुनवाई
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 23 जून 2025 को 1993 के कोलकाता बहूबाजार बम धमाके के दोषी मोहम्मद राशिद खान की रिहाई पर रोक लगा दी है। न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के 5 जून के उस आदेश को निलंबित कर दिया जिसमें 33 वर्षों से जेल में बंद राशिद की समयपूर्व रिहाई की अनुमति दी गई थी। अब इस मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को होगी।
मामले की पृष्ठभूमि
16 मार्च 1993 की रात कोलकाता के बहूबाजार इलाके में हुए भीषण बम विस्फोट में 69 लोगों की जान चली गई थी और कई इमारतें ध्वस्त हो गई थीं। इस मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे मोहम्मद राशिद खान को दिल्ली उच्च न्यायालय ने जेल में उसके दीर्घ प्रवास और अच्छे आचरण को देखते हुए रिहाई का आदेश दिया था।
बंगाल सरकार की आपत्ति
पश्चिम बंगाल सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय के इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि राज्य सजा समीक्षा बोर्ड ने राशिद की रिहाई के विरुद्ध अपनी राय दी थी। साथ ही यह भी कहा गया कि आतंकवाद जैसे जघन्य अपराध में दोषसिद्ध व्यक्ति को समय से पहले रिहा करना पीड़ितों और उनके परिजनों के साथ अन्याय होगा।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि राशिद खान इस मामले का एक मास्टरमाइंड था। न्यायालय ने यह भी कहा कि किसी एक मामले में एक से अधिक मास्टरमाइंड नहीं हो सकते — यह टिप्पणी राशिद की भूमिका की गंभीरता को रेखांकित करती है। न्यायालय ने राशिद खान और केंद्र सरकार दोनों को नोटिस जारी कर जवाब माँगा है।
बचाव पक्ष के तर्क
राशिद खान के वकील ने सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया कि उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप न किया जाए। उन्होंने कहा कि राशिद को गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ हैं, वह 30 वर्षों से अधिक समय से जेल में है और उसका आचरण सदैव अनुकरणीय रहा है। बचाव पक्ष ने यह भी उल्लेख किया कि इसी मामले के एक अन्य दोषी पन्नालाल जायसूरा को 2014 में समयपूर्व रिहा कर दिया गया था।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश पर अंतरिम रोक बनाए रखते हुए अगली सुनवाई की तारीख 28 जुलाई तय की है। इस बीच राशिद खान जेल में ही रहेगा। यह मामला न केवल समयपूर्व रिहाई की नीति बल्कि आतंकवाद से जुड़े मामलों में दोषियों के अधिकारों और पीड़ितों के न्याय के बीच संतुलन के व्यापक प्रश्न को भी उजागर करता है।