बर्नस्टीन ने निफ्टी का साल-अंत लक्ष्य घटाकर 25,000 किया, आय दबाव और ट्रेड अनिश्चितता बनी वजह
सारांश
मुख्य बातें
ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन ने 21 अक्टूबर 2026 को निफ्टी के लिए वर्ष-अंत टारगेट प्राइस 26,000 से घटाकर 25,000 कर दिया है। फर्म ने यह कदम अमेरिका के साथ ट्रेड डील पर बनी अनिश्चितता और भारतीय इक्विटी की आय में सुधार को लेकर गहराती चिंताओं के मद्देनज़र उठाया है। यह लगातार दूसरी बार है जब बर्नस्टीन ने निफ्टी के टारगेट में कटौती की है।
टारगेट कटौती की पृष्ठभूमि
बर्नस्टीन ने इस साल की शुरुआत में निफ्टी के लिए 28,100 का लक्ष्य निर्धारित किया था और पिछले साल के अंत के टारगेट से 7 प्रतिशत की बढ़ोतरी की उम्मीद जताई थी। हालाँकि, वैश्विक आर्थिक हालात लगातार बिगड़ते रहने, ऊर्जा की ऊँची कीमतों और कमज़ोर कॉरपोरेट आय के दृष्टिकोण ने फर्म को अपने अनुमान में दो बार संशोधन के लिए मजबूर किया।
फर्म ने अपनी भारत स्ट्रेटजी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि सकारात्मक रिटर्न की उनकी उम्मीद बाज़ार में गिरावट के बाद होने वाली रिकवरी पर टिकी है, न कि भारतीय इक्विटी के व्यापक दृष्टिकोण में किसी बुनियादी सुधार पर।
वैल्यूएशन छह साल के निचले स्तर पर
बर्नस्टीन के अनुसार, निफ्टी का आगामी 12 महीनों का प्राइस-टू-अर्निंग्स (PE) रेशियो गिरकर 16.6 गुना पर आ गया है — जो पिछले छह वर्षों में सबसे निचला स्तर है। जून 2022 के बाद पहली बार इंडेक्स का वैल्यूएशन 17 गुना से नीचे आया है।
फर्म ने नोट किया कि यह स्तर लगभग वैसा ही है, जैसा कोविड-19 महामारी के दौरान आई बाज़ार गिरावट और 2022 की करेक्शन के समय देखा गया था। फर्म ने अपनी रिपोर्ट में कहा, 'पिछले दो वर्षों में कमाई में मामूली वृद्धि के बावजूद, निफ्टी का मूल्यांकन छह साल के निचले स्तर पर होना एक आकर्षक विकल्प लग सकता है।' हालाँकि साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि इंडेक्स के अपने इतिहास से तुलना करना 'भ्रामक' हो सकता है।
एशियाई बाज़ारों की तुलना में भारत अभी भी महंगा
फर्म का कहना है कि हालिया गिरावट के बावजूद, भारतीय शेयर कई एशियाई बाज़ारों की तुलना में अभी भी अपेक्षाकृत महंगे बने हुए हैं। ऊँचे वैल्यूएशन के लिए बर्नस्टीन ने व्यापक बाज़ार की कमज़ोरी और घरेलू फंड के मज़बूत प्रवाह को ज़िम्मेदार ठहराया है।
यह ऐसे समय में आया है जब कच्चे तेल की ऊँची कीमतें और वैश्विक व्यापार नीति को लेकर अनिश्चितता भारतीय बाज़ार के लिए दोहरी चुनौती बनी हुई है। गौरतलब है कि घरेलू संस्थागत निवेशक (DII) की खरीदारी ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की बिकवाली के असर को आंशिक रूप से थाम रखा है।
बाज़ार की बढ़त पर क्या है अगली चुनौती
बर्नस्टीन ने चेताया है कि बिगड़ते व्यापक आर्थिक हालात, कच्चे तेल की महंगाई और कॉरपोरेट आय पर दबाव के बीच दीर्घकालिक बढ़त की संभावना सीमित है। अमेरिका-भारत ट्रेड डील की अनिश्चितता भी निर्यातमुखी क्षेत्रों की आय दृष्टि को धुंधला कर रही है।
आने वाली तिमाही में कॉरपोरेट आय के नतीजे और वैश्विक कमोडिटी क्षेत्र में उतार-चढ़ाव यह तय करेंगे कि निफ्टी 25,000 के टारगेट के करीब टिका रह सकता है या नहीं।