भवाईया लोक संगीत पर पुस्तक का विमोचन: उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन बोले — यह आम जन की आत्मा की आवाज़ है
सारांश
मुख्य बातें
उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने 25 जून 2026 को उपराष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में लोकसभा सांसद डॉ. जयंत कुमार रॉय और संगीता रॉय द्वारा लिखित पुस्तक 'संस्कृति रत्न भंडार: भौवैयार इतिब्रिटो' (भवाईया: ए कल्चरल ट्रेजर एंड इट्स हिस्टोरिकल जर्नी) का विधिवत विमोचन किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि भवाईया लोक परंपरा पीढ़ियों से उत्तर बंगाल और आसपास के क्षेत्रों के आम लोगों की भावनाओं, आकांक्षाओं, संघर्षों और ज्ञान को प्रतिबिंबित करती आई है।
पुस्तक और उसका महत्व
राधाकृष्णन ने कहा कि यह पुस्तक भवाईया के ऐतिहासिक विकास का व्यवस्थित वर्णन करती है और इसके उद्भव एवं विकास पर एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। उन्होंने बताया कि यह कृति लोक परंपराओं, धार्मिक प्रथाओं, कृषि रीति-रिवाजों, मौसमी त्योहारों और सामुदायिक जीवन की भूमिका को उजागर करती है — जो भवाईया को लोगों के सामाजिक और सांस्कृतिक अनुभवों की एक स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में आकार देती है। उन्होंने प्रकाशक कथा-ओ-कहिनी के योगदान की भी सराहना की, जिसने इस विरासत के दस्तावेजीकरण और संरक्षण में अहम भूमिका निभाई।
भवाईया की सांस्कृतिक जड़ें
भवाईया उत्तरी बंगाल, असम और आसपास के क्षेत्रों की एक पारंपरिक लोक संगीत शैली है, जो कोच राजबंशी समुदाय की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है। राधाकृष्णन ने कहा कि यह परंपरा इस क्षेत्र के सामाजिक, सांस्कृतिक और कृषि परिदृश्य में गहराई से समाई हुई है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आधुनिकीकरण, शहरीकरण और वैश्वीकरण की ताकतों के बावजूद भवाईया जीवित और विकसित होती रहती है, क्योंकि यह प्रामाणिक मानवीय अनुभवों और सार्वभौमिक भावनाओं में निहित है।
संगीत और भारतीय सभ्यता का संबंध
उपराष्ट्रपति ने कहा कि प्राचीन भारत में संगीत को मानवीय चेतना को ब्रह्मांडीय व्यवस्था से जोड़ने का साधन माना जाता था। सामवेद, नाद ब्रह्म की अवधारणा और भक्ति एवं सूफीवाद की परंपराओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि संगीत को हमेशा ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग माना गया है। उन्होंने स्मरण दिलाया कि पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के उदय से बहुत पहले, भारत में भरत मुनि का नाट्य शास्त्र मौजूद था, जिसमें संगीत को मानवीय भावनाओं और आध्यात्मिक अनुभूति की मूलभूत अभिव्यक्ति माना गया है।
युवा पीढ़ी और सांस्कृतिक संरक्षण
राधाकृष्णन ने युवा पीढ़ी से सांस्कृतिक संरक्षण में सक्रिय भागीदारी का आह्वान किया और उनसे भाषाओं, रीति-रिवाजों, मूल्यों और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों की रक्षा के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए सांस्कृतिक संरक्षण राष्ट्रीय विकास का अभिन्न अंग बना रहना चाहिए। महाकवि सुब्रमण्यम भारती को उद्धृत करते हुए उन्होंने जोर दिया कि भारत की शक्ति एकरूपता में नहीं, बल्कि एक साझा सभ्यतागत भावना से एकजुट इसकी जीवंत विविधता में निहित है।
कार्यक्रम में उपस्थित गणमान्य व्यक्ति
इस विमोचन समारोह में राज्यसभा सांसद हर्ष वर्धन श्रृंगला, पुस्तक के लेखक डॉ. जयंत कुमार रॉय, सह-लेखिका संगीता रॉय, कूच बिहार पंचानन बर्मा विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर (डॉ.) निखिल चंद्र राय और प्रकाशक देबराज पात्रा सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। यह आयोजन भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित और प्रचारित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है।