उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन का बड़ा बयान: लेखापरीक्षा से मज़बूत होता है राज्य-नागरिक विश्वास, सशक्त बनता लोकतंत्र
सारांश
मुख्य बातें
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने 3 जून को उपराष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में लेखापरीक्षा को 'लोकतंत्र को मज़बूत करने का एक महत्वपूर्ण साधन' बताते हुए कहा कि यह राज्य और नागरिकों के बीच विश्वास को सुदृढ़ करती है। यह बयान उन्होंने भारत के पूर्व नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) विनोद राय द्वारा संपादित पुस्तक ‘व्हेन ऑडिट मैटर्स: सीएजी इंटरवेंशन्स दैट मेड ए डिफरेंस’ के विमोचन समारोह में दिया।
मुख्य संदेश: सार्वजनिक धन और जवाबदेही
राधाकृष्णन ने कहा कि लेखापरीक्षा नागरिकों को आश्वस्त करती है कि सार्वजनिक धन का उपयोग ‘कानून, दक्षता और निष्पक्षता’ के अनुरूप जनहित में हो रहा है। उन्होंने ज़ोर दिया कि ऑडिट केवल खामियाँ पकड़ने का साधन नहीं, बल्कि सरकारों को प्रणालियों में सुधार और कमियाँ दूर करने में मदद करता है।
नैतिकता और शासन का संयोजन
उपराष्ट्रपति ने कहा कि नैतिकता और लेखापरीक्षा का संयोजन ‘परिवर्तनकारी’ साबित हो सकता है — इससे सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता बेहतर होगी, संसाधनों का कुशल उपयोग होगा और जनता का भरोसा बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि नैतिक शासन को लोक प्रशासन का नैतिक आधार बनना चाहिए।
परंपरा से संविधान तक: जवाबदेही की जड़ें
राधाकृष्णन ने जवाबदेही और नैतिक शासन की भारतीय परंपराओं को ‘धर्म, राजधर्म और जन कर्तव्य’ की अवधारणाओं में निहित बताया। उन्होंने कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वर्णित वित्तीय निगरानी सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वतंत्रता के बाद संविधान ने इन आदर्शों को संस्थागत रूप दिया — विधि का शासन, वित्तीय जवाबदेही और संसदीय निगरानी के तहत एक स्वतंत्र CAG की स्थापना के रूप में।
संसदीय जवाबदेही चक्र
उपराष्ट्रपति ने संसदीय लोकतंत्र के ‘जवाबदेही चक्र’ की भी व्याख्या की — जो बजट की विधायी स्वीकृति से शुरू होकर लोक लेखा समितियों (PAC) की जाँच तक चलता है। उनके अनुसार यह प्रक्रिया राजकोषीय निगरानी का व्यापक ढाँचा खड़ा करती है और सार्वजनिक वित्त पर लोकतांत्रिक नियंत्रण को मज़बूत करती है।
आधुनिक ऑडिट के लिए सुधार ज़रूरी
राधाकृष्णन ने लेखापरीक्षा प्रणालियों में निरंतर सुधार पर बल देते हुए प्रशिक्षण, प्रौद्योगिकी उन्नयन, प्रदर्शन मूल्यांकन, डेटा विश्लेषण और क्षेत्रीय विशेषज्ञता को अनिवार्य बताया। उन्होंने यह भी कहा कि लेखापरीक्षकों को स्वयं भी सत्यनिष्ठा और नैतिक आचरण के उच्चतम मानकों का पालन करना चाहिए।
पुस्तक और परियोजना का संदर्भ
उपराष्ट्रपति ने विनोद राय और उनके सहयोगियों की पूर्व वरिष्ठ लेखापरीक्षा अधिकारियों के अनुभवों को सरल, रोचक शैली में प्रस्तुत करने के लिए सराहना की। यह प्रकाशन सिंगापुर राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के दक्षिण एशियाई अध्ययन संस्थान की एक परियोजना के अंतर्गत दक्षिण एशिया में शासन और जवाबदेही का विश्लेषण करता है।
समारोह में विनोद राय, दक्षिण एशियाई अध्ययन संस्थान के निदेशक डॉ. इकबाल सिंह सेविया, रूपा पब्लिकेशंस के प्रबंध निदेशक कपिश मेहरा, तथा भारतीय लेखापरीक्षा एवं लेखा सेवा के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। राधाकृष्णन ने भरोसा जताया कि पुस्तक व्यापक रूप से पढ़ी और चर्चित होगी, तथा एक जीवंत लोकतंत्र में संस्थागत जवाबदेही के स्थायी महत्व को सुदृढ़ करेगी।