3 जुलाई 2026
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उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने 'ऑर्गनाइजर' के 80 वर्ष पूरे होने पर लोकतांत्रिक पत्रकारिता की सराहना की

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उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने 'ऑर्गनाइजर' के 80 वर्ष पूरे होने पर लोकतांत्रिक पत्रकारिता की सराहना की

सारांश

'ऑर्गनाइजर' के 80 साल पूरे होने पर उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने नई दिल्ली में कहा कि साहस और जिम्मेदारी के बिना प्रेस की स्वतंत्रता अधूरी है। 1949 के सेंसरशिप संघर्ष से लेकर आपातकाल तक, 'ऑर्गनाइजर' की यात्रा को उन्होंने लोकतांत्रिक विमर्श की मिसाल बताया।

मुख्य बातें

उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने 3 जुलाई 2026 को इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली में 'ऑर्गनाइजर' के 80वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित किया।
उन्होंने 1949 में 'ऑर्गनाइजर' के सेंसरशिप-विरोधी कानूनी संघर्ष को मीडिया स्वतंत्रता का ऐतिहासिक मील का पत्थर बताया।
आपातकाल के दौरान 'ऑर्गनाइजर' और सहयोगी पत्रिका 'द मदरलैंड' को संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का केंद्र बताया गया।
प्रफुल्ला केतकर व गौतम चौबे की पुस्तक 'हिंदुत्व डिस्कोर्स आफ्टर इंडिपेंडेंस' और डॉ.
उज्ज्वला चक्रदेव की 'टेम्पल्स बियॉन्ड भारत' का विमोचन किया गया।
कार्यक्रम में RSS सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले , संपादक प्रफुल्ला केतकर और अरुण कुमार गोयल सहित प्रमुख हस्तियाँ उपस्थित रहीं।

उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने शुक्रवार, 3 जुलाई 2026 को नई दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित साप्ताहिक पत्रिका 'ऑर्गनाइजर' के 80वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है जब प्रेस तथ्यों के आधार पर जनता को सूचित करे, प्रश्न उठाए और सूचित सार्वजनिक बहस को प्रोत्साहित करे। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रेस की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ तभी है जब उसका प्रयोग साहस और जिम्मेदारी के साथ उच्चतम पेशेवर मानकों के अनुरूप किया जाए।

आठ दशकों की यात्रा का मूल्यांकन

राधाकृष्णन ने 'ऑर्गनाइजर' की 80 वर्षों की यात्रा को 'निरंतरता, दृढ़ता और पीढ़ियों तक सार्वजनिक विमर्श के प्रति सतत प्रतिबद्धता' का प्रतीक बताया। उन्होंने वर्ष 1949 में इस प्रकाशन के सेंसरशिप के विरुद्ध कानूनी संघर्ष का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रकरण स्वतंत्र भारत में मीडिया स्वतंत्रता के विकास का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ। उनके अनुसार, इस संघर्ष ने यह सिद्ध किया कि एक स्वतंत्र प्रेस कठिन प्रश्न उठाने का साहस रखती है।

राष्ट्रीय विमर्श में 'ऑर्गनाइजर' की भूमिका

उपराष्ट्रपति ने कहा कि दशकों से 'ऑर्गनाइजर' ने राष्ट्रीय एकता, अखंडता, सुरक्षा, संस्कृति और शासन से जुड़े विषयों पर सक्रिय रूप से भागीदारी की है। उन्होंने जम्मू-कश्मीर से जुड़े मुद्दों, प्रजा परिषद आंदोलन, चीन और पाकिस्तान के साथ युद्धों के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा, स्वदेशी आंदोलन, राम जन्मभूमि आंदोलन तथा भारत के सार्वजनिक जीवन की अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं में इस पत्रिका की सहभागिता को रेखांकित किया।

आपातकाल में प्रतिबद्धता

राधाकृष्णन ने आपातकाल के दौरान 'ऑर्गनाइजर' की भूमिका को विशेष रूप से उल्लेखनीय बताया। उन्होंने कहा कि उस कठिन दौर में 'ऑर्गनाइजर' और इसकी सहयोगी पत्रिका 'द मदरलैंड' लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गईं। उनके अनुसार, ऐसे अवसर यह स्मरण कराते हैं कि प्रेस की स्वतंत्रता का वास्तविक मूल्य तभी प्रकट होता है जब उसका उपयोग साहस के साथ किया जाए।

पुस्तक विमोचन

समारोह में उपराष्ट्रपति ने दो पुस्तकों का विमोचन किया — प्रफुल्ला केतकर और गौतम चौबे द्वारा लिखित 'हिंदुत्व डिस्कोर्स आफ्टर इंडिपेंडेंस – रीडिंग विद ऑर्गनाइजर पेजेज' तथा डॉ. उज्ज्वला चक्रदेव द्वारा लिखित 'टेम्पल्स बियॉन्ड भारत'। 'हिंदुत्व डिस्कोर्स आफ्टर इंडिपेंडेंस' का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि 'ऑर्गनाइजर' के आठ दशकों का यह दस्तावेज़ भारत के राजनीतिक, सामाजिक और बौद्धिक विकास का एक महत्वपूर्ण अभिलेखीय रिकॉर्ड है और स्वतंत्र भारत में हिंदुत्व विमर्श के विकास को समझने का माध्यम प्रदान करता है।

समारोह में उपस्थित प्रमुख हस्तियाँ

उपराष्ट्रपति ने भारत प्रकाशन लिमिटेड, संपादकीय टीम तथा पाठकों को इस उपलब्धि पर बधाई दी। कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले, भारत प्रकाशन लिमिटेड के प्रबंध निदेशक अरुण कुमार गोयल, 'ऑर्गनाइजर' के संपादक प्रफुल्ला केतकर तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, दिल्ली प्रांत के संघचालक डॉ. अनिल अग्रवाल उपस्थित रहे। होसबाले के विचारों का उल्लेख करते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि 'ऑर्गनाइजर' 'राष्ट्र की आत्मा की आवाज' के रूप में कार्य करता रहा है — किसी संकीर्ण उद्देश्य से नहीं, बल्कि एक सशक्त, समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के संकल्प से प्रेरित होकर। आने वाले दशकों में यह पत्रिका किस दिशा में अपनी पत्रकारिता को आकार देती है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

किंतु वर्तमान मीडिया स्वतंत्रता सूचकांकों में भारत की गिरती रैंकिंग के परिप्रेक्ष्य में यह भाषण अधिक गहरे प्रश्न छोड़ता है। लोकतांत्रिक विमर्श की प्रशंसा तब अधिक विश्वसनीय होती है जब वह सभी वैचारिक धाराओं पर समान रूप से लागू हो।
RashtraPress
3 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'ऑर्गनाइजर' का 80वाँ स्थापना दिवस समारोह कहाँ और कब हुआ?
यह समारोह 3 जुलाई 2026 को नई दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित हुआ। इसमें उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन मुख्य वक्ता रहे और RSS सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले सहित कई प्रमुख हस्तियाँ उपस्थित थीं।
उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने प्रेस स्वतंत्रता पर क्या कहा?
उन्होंने कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ तभी है जब उसका प्रयोग साहस और जिम्मेदारी के साथ, उच्चतम पेशेवर मानकों का पालन करते हुए किया जाए। लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है जब प्रेस तथ्यों के आधार पर जनता को सूचित करे और सूचित सार्वजनिक बहस को प्रोत्साहित करे।
1949 में 'ऑर्गनाइजर' का सेंसरशिप संघर्ष क्या था?
उपराष्ट्रपति के अनुसार, वर्ष 1949 में 'ऑर्गनाइजर' ने सेंसरशिप के विरुद्ध कानूनी लड़ाई लड़ी, जो स्वतंत्र भारत में मीडिया स्वतंत्रता के विकास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानी जाती है। इस संघर्ष ने यह स्थापित किया कि एक स्वतंत्र प्रेस कठिन प्रश्न उठाने का साहस रखती है।
समारोह में कौन-सी पुस्तकों का विमोचन हुआ?
दो पुस्तकें जारी की गईं — प्रफुल्ला केतकर और गौतम चौबे द्वारा लिखित 'हिंदुत्व डिस्कोर्स आफ्टर इंडिपेंडेंस – रीडिंग विद ऑर्गनाइजर पेजेज' तथा डॉ. उज्ज्वला चक्रदेव द्वारा लिखित 'टेम्पल्स बियॉन्ड भारत'। पहली पुस्तक को उपराष्ट्रपति ने भारत के राजनीतिक और बौद्धिक विकास का महत्वपूर्ण अभिलेखीय रिकॉर्ड बताया।
आपातकाल के दौरान 'ऑर्गनाइजर' की क्या भूमिका रही?
उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने कहा कि आपातकाल के दौरान 'ऑर्गनाइजर' और सहयोगी पत्रिका 'द मदरलैंड' लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गई थीं। उन्होंने इसे प्रेस की साहसिक भूमिका का उदाहरण बताया।
राष्ट्र प्रेस
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