'द वॉयस ऑफ जस्टिस' का विमोचन: उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने जस्टिस गवई की न्यायिक विरासत को सराहा
सारांश
मुख्य बातें
उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने 14 जुलाई 2026 को नई दिल्ली स्थित उपराष्ट्रपति भवन में आयोजित एक विशेष समारोह में 'द वॉयस ऑफ जस्टिस: जस्टिस गवई स्पीक्स' पुस्तक का औपचारिक विमोचन किया। यह पुस्तक पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.आर. गवई के भाषणों, व्याख्यानों और विचारों का संकलन है, जिसे प्रो. (डॉ.) एस. शिवकुमार ने संपादित किया है और थॉमसन रॉयटर्स ने कॉमनवेल्थ लीगल एजुकेशन एसोसिएशन (CLEA) के सहयोग से प्रकाशित किया है।
पुस्तक का महत्व और संवैधानिक संदर्भ
विमोचन समारोह में उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने कहा कि यह पुस्तक महज भाषणों का संग्रह नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण संवैधानिक दस्तावेज है। उनके अनुसार, यह कृति न्यायिक अनुभव, संवैधानिक अनुशासन और सार्वजनिक उत्तरदायित्व से उपजी न्यायिक सोच को प्रतिबिंबित करती है। उन्होंने यह भी कहा कि यह पुस्तक संविधानवाद, कानून के शासन, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था पर गहन दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है तथा भारत में संवैधानिक विमर्श और विधिक अध्ययन को और समृद्ध करेगी।
गौरतलब है कि न्यायमूर्ति गवई का कार्यकाल संवैधानिक मूल्यों की रक्षा और न्याय तक समान पहुँच सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता के लिए जाना जाता है। यह पुस्तक उनके उन्हीं विचारों को एक स्थायी रूप देती है।
संविधान पर उपराष्ट्रपति के विचार
राधाकृष्णन ने कहा कि पुस्तक में भारतीय संविधान को एक जीवंत और निरंतर विकसित होने वाले दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसने पिछले 75 वर्षों में निरंतरता और परिवर्तन, अधिकार और जवाबदेही तथा अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन बनाए रखा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संसद की संशोधन शक्ति समय की आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायक है, जबकि संविधान लोकतांत्रिक स्थिरता और राष्ट्रीय एकता की आधारशिला बना रहता है।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि संवैधानिक लोकतंत्र में अधिकार जितना आवश्यक है, उतना ही संयम भी ज़रूरी है। मजबूत न्याय व्यवस्था संस्थागत ईमानदारी, संवैधानिक अनुशासन, जनविश्वास और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता पर टिकी होती है।
सामाजिक न्याय और न्यायपालिका की भूमिका
उपराष्ट्रपति ने न्यायपालिका की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि संविधान की रक्षा और कानून के शासन में लोगों के विश्वास को बनाए रखने में न्यायपालिका की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक शासन व्यवस्था को आम नागरिकों की आकांक्षाओं और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप संवेदनशील बने रहना चाहिए।
राधाकृष्णन ने समाज के वंचित वर्गों को सशक्त बनाने पर बल देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान, अवसर और उम्मीद मिलना न्याय का मूल उद्देश्य है। समारोह के अंत में उन्होंने विधि जगत से जुड़े लोगों से अपील की कि वे प्रो बोनो (निःशुल्क) आधार पर समाज के सबसे गरीब और जरूरतमंद लोगों का प्रतिनिधित्व करें, ताकि न्याय सभी के लिए सुलभ हो सके।
समारोह में उपस्थित गणमान्य व्यक्ति
इस विशेष अवसर पर भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.आर. गवई, CLEA के अध्यक्ष एवं संपादक प्रो. (डॉ.) एस. शिवकुमार, थॉमसन रॉयटर्स के प्रकाशक गौरी शंकर नटेशन तथा विधि जगत से जुड़े अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
यह पुस्तक ऐसे समय में सामने आई है जब भारत में संवैधानिक विमर्श और न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर व्यापक चर्चा जारी है — और न्यायमूर्ति गवई के विचार इस बहस में एक प्रामाणिक आवाज़ के रूप में स्थापित होने की क्षमता रखते हैं।