अगस्त्य ऋषि हैं भारत की सांस्कृतिक एकता के प्रतीक: उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन
सारांश
मुख्य बातें
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने 16 जून 2025 को नई दिल्ली स्थित उपराष्ट्रपति भवन में आयोजित एक विशेष समारोह में 'अगथियार — द यूनिफायर' नामक पुस्तक का विमोचन किया। इस अवसर पर उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत की एकता कोई आधुनिक या राजनीतिक अवधारणा नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से संतों और ऋषियों द्वारा पोषित एक प्राचीन सभ्यतागत वास्तविकता है।
अगस्त्य ऋषि: उत्तर और दक्षिण के बीच सेतु
राधाकृष्णन ने कहा कि राष्ट्रीय एकता की चर्चाओं में अक्सर राजाओं और राजनीतिक संस्थाओं का उल्लेख होता है, किंतु भारत की वास्तविक एकता के शिल्पकार इसके संत और ऋषि रहे हैं। उन्होंने अगस्त्य ऋषि को उत्तर और दक्षिण भारतीय परंपराओं में समान रूप से पूजनीय बताते हुए कहा कि वे हिमालय से हिंद महासागर तक फैले भारत की एकता के सर्वोच्च प्रतीकों में से एक हैं।
तमिलनाडु की पोथिगई पहाड़ियों और कावेरी नदी का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि ये स्थान अगस्त्य की जीवंत स्मृति को आज भी संजोए हुए हैं। उन्होंने तमिल व्याकरण और तमिल संगम परंपरा के विकास में अगस्त्य के महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित करते हुए उन्हें दो महान सभ्यताओं के बीच एक अटूट सांस्कृतिक सेतु बताया।
भाषाएँ प्रतिस्पर्धी नहीं, बहनें हैं
उपराष्ट्रपति ने कहा कि अगस्त्य की विरासत यह सिद्ध करती है कि भारत की भाषाएँ आपस में प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि बहन भाषाएँ हैं, जिन्होंने सदियों के सांस्कृतिक आदान-प्रदान और परस्पर सम्मान के ज़रिए एक-दूसरे को समृद्ध किया है। उन्होंने चेतावनी दी कि कुछ तत्व भाषाई विभाजन को बढ़ावा देते हैं और अनावश्यक विवाद खड़े करते हैं — इसे वे राष्ट्रीय एकता के लिए हानिकारक मानते हैं।
यह ऐसे समय में आया है जब हिंदी-तमिल भाषा विवाद राष्ट्रीय राजनीति में बार-बार उभरता रहा है। राधाकृष्णन ने इस संदर्भ में युवाओं से आग्रह किया कि वे भारत की सभ्यतागत विरासत को सकारात्मक दृष्टि से समझें।
स्वामीनाथ अय्यर को उचित सम्मान न मिलने पर चिंता
राधाकृष्णन ने तमिल धर्मगुरु स्वामीनाथ अय्यर के अमूल्य योगदान का उल्लेख करते हुए खेद व्यक्त किया कि तमिल साहित्यिक धरोहरों को क्षय और विस्मृति से बचाने वाले इस महान विद्वान की सेवाएँ आज भी जन-मानस तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुँची हैं। उन्होंने कहा कि जिन्होंने तमिल भाषा के संवर्धन के लिए अपना जीवन समर्पित किया, उन्हें समाज का उचित सम्मान मिलना चाहिए।
काशी से तमिलनाडु तक: एकता के मंदिर
उन्होंने बताया कि तमिलनाडु में 100 से अधिक मंदिर अगस्त्य को समर्पित हैं, जिन्हें अगथीश्वरार मंदिर कहा जाता है। गौरतलब है कि काशी और तमिलनाडु — दोनों स्थानों पर एक ही नाम से मंदिरों का होना भारत की अखंड सांस्कृतिक एकता का ठोस प्रमाण है।
उपराष्ट्रपति ने इस धारणा को भी सिरे से खारिज किया कि ब्रिटिश शासन के बिना भारत एकजुट नहीं रह पाता। उनके अनुसार, भारत की संस्कृति और सभ्यता ने सदा से ही इसके लोगों को क्षेत्रों और पीढ़ियों की सीमाओं से परे एकसूत्र में बाँधे रखा है।
पुस्तक और कलाईमगल पत्रिका की सराहना
राधाकृष्णन ने पुस्तक के लेखकों — ओ. शमा भट और डॉ. एम.एन. सुधा — की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने शोध के माध्यम से भारत के उत्तरी, दक्षिणी, पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्रों में अगस्त्य से जुड़ी परंपराओं, कहानियों और संदर्भों को विस्तारपूर्वक प्रलेखित किया है। पुस्तक का तमिल अनुवाद प्रोफेसर कल्याणी ने किया है।
उन्होंने कलाईमगल पत्रिका को भी विशेष रूप से सराहा, जो 95 वर्षों से अधिक समय से तमिल साहित्य, संस्कृति और विरासत को भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित कर रही है। समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील अंबेकर, कलाईमगल पत्रिका के संपादक कीलंबुर शंकर सुब्रमणियन और वरिष्ठ लेखक-पत्रकार मालन सहित अनेक विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे।
यह पुस्तक अगस्त्य की महानता और भारत की सांस्कृतिक एकता के संदेश को वैश्विक स्तर तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी — ऐसा विश्वास उपराष्ट्रपति ने व्यक्त किया।