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दशहरे पर रावण-पूजा: बिसरख, कानपुर और विदिशा में जलता नहीं पुतला, होती है आराधना

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दशहरे पर रावण-पूजा: बिसरख, कानपुर और विदिशा में जलता नहीं पुतला, होती है आराधना

सारांश

जब देश रावण जलाता है, तब बिसरख, कानपुर और विदिशा में उनकी आरती उतरती है। तीन अलग-अलग राज्यों की ये परंपराएं बताती हैं कि भारत में रावण की छवि केवल खलनायक की नहीं — वे कहीं पूर्वज हैं, कहीं ग्राम देवता, कहीं परम शिव-भक्त।

मुख्य बातें

बिसरख गांव (ग्रेटर नोएडा) को रावण की जन्मस्थली माना जाता है; यहां साल भर रोज रावण की पूजा होती है और दशहरे पर यज्ञ का आयोजन किया जाता है।
कानपुर के दशानन मंदिर का निर्माण 1868 में हुआ था; इसके दरवाजे साल में केवल एक बार विजयादशमी पर खुलते हैं।
विदिशा की नटेरन तहसील के 'रावण' गांव में 12 फुट लंबी रावण की लेटी हुई प्रतिमा है; मंदिर परमार काल का बताया जाता है।
तीनों स्थानों पर दशहरे पर पुतला दहन के बजाय पूजा, हवन, रामायण पाठ और सामुदायिक भोज का आयोजन होता है।
महंत रामदास महाराज (बिसरख) और पंडित नरेश तिवारी (विदिशा) के अनुसार, ग्रामीण रावण को पूर्वज व ग्राम रक्षक के रूप में मानते हैं।

जब पूरा भारत विजयादशमी पर रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाता है, तब उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा स्थित बिसरख गांव, कानपुर के शिवाला इलाके और मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में एक बिल्कुल अलग परंपरा जीवित है — यहां रावण की पूजा होती है, पुतला नहीं जलता। 20 अक्टूबर 2026 को दशहरे के अवसर पर इन तीनों स्थानों पर विशेष अनुष्ठान, यज्ञ और भजन-कीर्तन के साथ लंकापति को श्रद्धांजलि दी गई। ये परंपराएँ भारत की सांस्कृतिक विविधता का एक दुर्लभ और उल्लेखनीय उदाहरण हैं।

बिसरख: रावण की जन्मस्थली का दावा

राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित बिसरख गांव को हिंदू महाकाव्य रामायण के अनुसार राक्षसराज रावण की जन्मस्थली माना जाता है। ग्रामीणों की मान्यता है कि रावण का पुतला जलाना अपने पूर्वज का अपमान करने के समान है, इसलिए यहां कभी दहन नहीं होता।

स्थानीय परंपरा के अनुसार, बिसरख को पहले 'विश्वेश्वर' के नाम से जाना जाता था, जो रावण के पिता ऋषि विश्रवा के नाम से जुड़ा है। माना जाता है कि त्रेता युग में ऋषि विश्रवा का जन्म इसी गांव में हुआ था और उन्होंने यहां एक शिवलिंग स्थापित किया था। भगवान शिव के परम भक्त रावण ने भी कथित तौर पर इसी स्थान पर आराधना की थी।

महंत रामदास महाराज ने बताया, 'यह रावण की जन्मस्थली है और कभी यहां ऋषि ब्रह्मा और ऋषि पुलस्त्य का आश्रम हुआ करता था। यहां साल भर रोज रावण की पूजा की जाती है। आज दशहरा है, और यहां एक यज्ञ किया जा रहा है। मंदिर को बहुत सुंदर ढंग से सजाया गया है और रावण के लिए विशेष प्रार्थनाएं की जा रही हैं।' उन्होंने आगे बताया कि इस अवसर पर कई इलाकों से लोग यहां आते हैं और रावण को फूल व मिठाइयाँ अर्पित करते हैं, तथा दिन भर हवन जैसे धार्मिक अनुष्ठान शाम तक चलते हैं।

कानपुर का दशानन मंदिर: साल में एक दिन खुलता है द्वार

कानपुर के शिवाला इलाके में कैलाश मंदिर परिसर के भीतर स्थित 'दशानन मंदिर' अपनी अनूठी परंपरा के लिए पूरे देश में जाना जाता है। इस मंदिर के दरवाजे साल में केवल एक बार, विजयादशमी के दिन ही खोले जाते हैं। शेष 364 दिन यह मंदिर पूर्णतः बंद रहता है।

मंदिर के पुजारी पंडित राम बाजपेयी ने बताया कि इस मंदिर का निर्माण 1868 में महाराज गुरु प्रसाद शुक्ला ने करवाया था। दशहरे के दिन सुबह मंदिर के दरवाजे खुलते हैं, जिसके बाद रावण की प्रतिमा को दूध और पवित्र जल से स्नान कराया जाता है। तत्पश्चात् पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-पाठ और आरती संपन्न होती है।

इस मंदिर की मान्यता यह है कि रावण को केवल बुराई के प्रतीक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें एक अत्यंत विद्वान, बुद्धिमान शासक और भगवान शिव के परम भक्त के रूप में भी स्मरण किया जाना चाहिए। विजयादशमी पर भक्त यहां आशीर्वाद लेने आते हैं और फूल तथा तेल के दीपक अर्पित करते हैं।

विदिशा का 'रावण' गांव: परमार काल का प्राचीन मंदिर

मध्य प्रदेश के विदिशा जिले की नटेरन तहसील में एक गांव है जिसका नाम ही 'रावण' है। यहां एक प्राचीन मंदिर है जिसे स्थानीय लोग परमार काल का बताते हैं। इस मंदिर में रावण की 12 फुट लंबी लेटी हुई प्रतिमा स्थापित है, जहां प्रतिदिन पूजा और आरती होती है।

यहां रावण को 'रावण बाबा' के रूप में गांव का मुख्य देवता माना जाता है। रावण मंदिर के पुजारी पंडित नरेश तिवारी ने बताया, 'रावण बाबा महाराज यहां विराजमान हैं और हमारा पूरा गांव उनकी शरण में है। हमारे सभी काम उन्हीं की कृपा से पूरे होते हैं।' उनके अनुसार ग्रामीण शादियों, भागवत कीर्तन और रामायण पाठ से पहले रावण बाबा का आशीर्वाद लेते हैं, और माना जाता है कि बिना आशीर्वाद के शुभ कार्य में बाधाएं आ सकती हैं।

दशहरे पर यहां पुतला दहन के बजाय रामायण पाठ, भजन-कीर्तन और एक बड़े सामुदायिक भोज का आयोजन होता है, जिसमें विदिशा, भोपाल और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।

सोशल मीडिया से बढ़ रही है पहचान

गौरतलब है कि इन स्थानों की अनूठी परंपराएं अब सोशल मीडिया के माध्यम से व्यापक रूप से चर्चित हो रही हैं। बिसरख का मंदिर विशेष रूप से देश भर के जिज्ञासु श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित कर रहा है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत के सांस्कृतिक और धार्मिक वैविध्य को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता बढ़ रही है।

आने वाले वर्षों में इन परंपराओं की पहचान और बढ़ने की संभावना है, जो भारत की बहुरंगी धार्मिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

कानपुर और विदिशा की ये परंपराएं भारत के उस बहुस्तरीय धार्मिक मानस की याद दिलाती हैं जो एक ही पौराणिक पात्र की परस्पर विरोधी व्याख्याओं को समान श्रद्धा के साथ जीता है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर इन परंपराओं को 'अनोखी' या 'अपवाद' कहकर आगे बढ़ जाती है, लेकिन असली सवाल यह है कि सदियों पुरानी ये स्थानीय मान्यताएं — जो महाकाव्य के प्रचलित पाठ को चुनौती देती हैं — आज सोशल मीडिया युग में किस तरह संरक्षित और लोकप्रिय हो रही हैं। यह सांस्कृतिक विविधता का उत्सव है, लेकिन साथ ही यह प्रश्न भी खड़ा होता है कि क्या बढ़ता पर्यटन और वायरल सामग्री इन परंपराओं की मौलिकता को सुरक्षित रखेगी या धीरे-धीरे उन्हें एक 'इवेंट' में बदल देगी।
RashtraPress
20 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बिसरख गांव में रावण की पूजा क्यों की जाती है?
बिसरख गांव (ग्रेटर नोएडा) को रावण की जन्मस्थली माना जाता है। यहां के ग्रामीण रावण को अपना पूर्वज मानते हैं और उनका पुतला जलाना अपने पूर्वजों का अपमान समझते हैं। इसीलिए यहां साल भर रोज रावण की पूजा होती है और दशहरे पर विशेष यज्ञ व अनुष्ठान किए जाते हैं।
कानपुर का दशानन मंदिर कब बना और यह खास क्यों है?
कानपुर के शिवाला इलाके में स्थित दशानन मंदिर का निर्माण 1868 में महाराज गुरु प्रसाद शुक्ला ने करवाया था। यह मंदिर साल में केवल एक बार, विजयादशमी के दिन ही खुलता है — शेष 364 दिन बंद रहता है। उस दिन रावण की प्रतिमा को दूध और पवित्र जल से स्नान कराकर पूजा-आरती की जाती है।
मध्य प्रदेश के विदिशा में रावण की पूजा कैसे होती है?
विदिशा जिले की नटेरन तहसील में 'रावण' नामक एक गांव है, जहां परमार काल का एक प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर में रावण की 12 फुट लंबी लेटी हुई प्रतिमा है और रोजाना पूजा होती है। दशहरे पर पुतला दहन के बजाय रामायण पाठ, भजन-कीर्तन और सामुदायिक भोज का आयोजन होता है।
क्या भारत में और भी जगहें हैं जहां रावण को पूजा जाता है?
हां, बिसरख (उत्तर प्रदेश), कानपुर (उत्तर प्रदेश) और विदिशा (मध्य प्रदेश) के अलावा भी देश के कुछ हिस्सों में रावण को पूर्वज, ग्राम देवता या भगवान शिव के परम भक्त के रूप में पूजा जाता है। ये परंपराएं भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता की मिसाल हैं।
बिसरख गांव का नाम पहले क्या था और इसका रावण से क्या संबंध है?
स्थानीय परंपरा के अनुसार, बिसरख गांव को पहले 'विश्वेश्वर' के नाम से जाना जाता था, जो रावण के पिता ऋषि विश्रवा के नाम से जुड़ा है। माना जाता है कि त्रेता युग में ऋषि विश्रवा का जन्म यहीं हुआ था और उन्होंने यहां एक शिवलिंग स्थापित किया था।
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