महाराष्ट्र के सांगोला गांव में दशहरे पर रावण की पूजा, सैकड़ों साल पुरानी अनोखी परंपरा
सारांश
मुख्य बातें
महाराष्ट्र के अकोला जिले के सांगोला गांव में विजयादशमी का उत्सव देश के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग तरीके से मनाया जाता है — यहाँ रावण का पुतला नहीं जलाया जाता, बल्कि उसकी पूजा-अर्चना की जाती है। अकोला शहर से लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में एक ही पत्थर से निर्मित रावण की प्राचीन प्रतिमा है, जो इस अनोखी आस्था का केंद्र बनी हुई है।
मूर्ति की विशेषता और स्थापना की कथा
गांव के प्रवेश द्वार पर स्थापित यह प्रतिमा एकाश्म पत्थर अर्थात एक ही पत्थर से तराशी गई है, जिसमें रावण को दस सिरों वाले शस्त्रधारी राजा के रूप में दर्शाया गया है। ग्रामीणों की मान्यता के अनुसार, यह मूर्ति पास के चिखल गांव में बनाई गई थी और बैलगाड़ी में किसी अन्य स्थान पर ले जाई जा रही थी। किंतु निकटवर्ती नदी के पास सांगोला की सीमा पर पहुँचते ही मूर्ति को आगे ले जाना संभव नहीं हुआ। ग्रामीणों ने इसे दैवीय संकेत माना और गांव के प्रवेश द्वार पर ही प्रतिमा की स्थापना कर दी।
पुजारी की आस्था और पूजा की परंपरा
गांव के पुजारी बालकृष्ण जाधव ने बताया कि यह मूर्ति सैकड़ों वर्ष पुरानी है। उन्होंने कहा, 'हमारे गुरुजी ने बताया था कि रावण की मूर्ति को दूसरी जगह से एक बैलगाड़ी में लाया गया था। जिस वक्त इस मूर्ति को ले जाया जा रहा था तो ये हमारे गांव के इस स्थान से आगे नहीं बढ़ी थी। इसलिए गांव के लोगों ने मूर्ति की यहीं स्थापना की।' जाधव के अनुसार, प्रतिदिन इस प्रतिमा का पूजन किया जाता है और विशेष रूप से शनिवार को नारियल के तेल से अभिषेक किया जाता है, साथ ही धूप-दीप और अगरबत्ती अर्पित की जाती है।
ग्रामीणों की सोच — दुर्गुण नहीं, सद्गुण अपनाओ
गांव के लोगों का दर्शन उल्लेखनीय है। उनका मानना है कि रावण में जहाँ कुछ दुर्गुण थे, वहीं उसमें विद्वता, शौर्य और भक्ति जैसे अनेक सद्गुण भी विद्यमान थे। इसलिए केवल घृणा की दृष्टि से देखने के बजाय रावण के अच्छे गुणों को अपनाने में ही श्रेय है। यह सोच इस गांव की पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही परंपरा की नींव है।
स्थानीय युवा की गवाही
गांव के एक स्थानीय युवक ने बताया कि मान्यता के अनुसार यह मूर्ति 200 से 300 वर्ष पहले यहाँ स्थापित हुई थी। उन्होंने कहा कि जब चिखल गांव से मूर्ति को ले जाया जा रहा था, तब नदी के निकट यह मूर्ति आगे नहीं बढ़ पाई और तभी से सांगोला में उसकी पूजा होती चली आ रही है।
भारत में रावण पूजा की व्यापक परंपरा
गौरतलब है कि सांगोला अकेला ऐसा स्थान नहीं है। भारत के विभिन्न कोनों में — मध्य प्रदेश के मंदसौर, उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों, राजस्थान और कर्नाटक के कुछ भागों में भी विजयादशमी पर रावण दहन के बजाय रावण पूजन की परंपरा है। यह वैविध्य भारतीय लोक-आस्था और धार्मिक दर्शन की बहुलता को रेखांकित करता है, जहाँ एक ही पौराणिक पात्र को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा जाता है। सांगोला की यह परंपरा उस सांस्कृतिक विविधता की जीवंत मिसाल है जो भारत को अनूठा बनाती है।