विदिशा के रावण गांव में दशहरे पर पुतला दहन नहीं, रावण बाबा की होती है पूजा
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश के विदिशा जिले की नटेरन तहसील में स्थित रावण गांव में दशहरे पर रावण का पुतला नहीं जलाया जाता — बल्कि यहाँ लंका के राजा रावण को रावण बाबा के नाम से पूजा जाता है। देशभर में जहाँ 19 अक्टूबर 2026 को दशहरे के अवसर पर रावण-दहन का आयोजन हुआ, वहीं इस गाँव की सदियों पुरानी परंपरा इस उत्सव को बिल्कुल अलग रूप में मनाती है।
मंदिर और मूर्ति का परिचय
रावण गांव में एक प्राचीन मंदिर है जिसके बारे में स्थानीय मान्यता है कि यह परमार काल का है। मंदिर में 12 फुट ऊँची रावण की मूर्ति विश्राम (लेटी हुई) मुद्रा में स्थापित है, जहाँ प्रतिदिन विधिवत पूजा-अर्चना होती है। रावण मंदिर के पुजारी पंडित नरेश तिवारी ने बताया, 'हमारे रावण गांव में रावण महाराज की प्रतिमा स्थापित है। रावण बाबा महाराज यहाँ विराजमान हैं और हमारा पूरा गांव उनकी सुरक्षा में रहता है। हमारे सभी कार्य उन्हीं के द्वारा पूर्ण होते हैं।'
पुजारी के अनुसार ग्रामीण विवाह, विवाह-पूर्व अनुष्ठानों, भागवत कीर्तन और रामायण पाठ से पहले रावण बाबा का आशीर्वाद लेते हैं। उनका मानना है कि बिना आशीर्वाद के किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करने पर बाधाएँ आती हैं।
दशहरे पर विशेष आयोजन
दशहरे के दिन इस गाँव में पुतला दहन के स्थान पर रामायण पाठ, भक्ति गीत और एक भव्य सामुदायिक भोज (भंडारा) का आयोजन किया जाता है। विदिशा, भोपाल और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं। ग्राम प्रधान के प्रतिनिधि राजेश धाकड़ ने बताया कि गाँव से बाहर बस चुके निवासी भी दशहरे के दिन लौट आते हैं। उन्होंने कहा, 'बहुत से लोग अपनी मनोकामनाएँ लेकर यहाँ आते हैं, और अतीत में उनकी मनोकामनाएँ पूरी हुई हैं।'
गाँव के नामकरण की लोककथा
राजेश धाकड़ ने स्थानीय लोककथा के हवाले से बताया कि एक शक्तिशाली राक्षस ने रावण को चुनौती देने का प्रयास किया था। किंवदंती के अनुसार, रावण बाबा यहाँ आए और उस राक्षस का अहंकार चकनाचूर कर दिया — इसीलिए मूर्ति को विश्राम मुद्रा में दिखाया गया है, जो उनकी विजय का प्रतीक माना जाता है। धाकड़ ने कहा, 'गांव के नामकरण की कहानी पीढ़ियों से चली आ रही है। कोई निश्चित तिथि नहीं है, लेकिन रावण बाबा की मूर्ति यहाँ होने के कारण गाँव को उनके नाम से जाना जाता है।'
सामाजिक जीवन में रावण बाबा की भूमिका
स्थानीय निवासी पंडित गोविंद नारायण तिवारी ने बताया कि गाँव में रावण की पूजा एक देवता के रूप में होती है और धार्मिक व पारिवारिक समारोहों में उन्हें सर्वोच्च स्थान दिया जाता है। उन्होंने कहा, 'यहाँ हर शुभ अवसर पर रावण बाबा की पूजा सर्वप्रथम की जाती है।' परंपरा के अनुसार विवाह समारोह में तेल का पहला अर्पण भी रावण बाबा को ही किया जाता है। ग्रामीण नए वाहन की खरीद जैसे महत्वपूर्ण व्यक्तिगत अवसरों पर भी मंदिर में पहले दर्शन करते हैं और रावण बाबा को विवाह का पहला निमंत्रण दिया जाता है।
परंपरा की व्यापक पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि भारत के कई हिस्सों में रावण को खलनायक के बजाय ज्ञानी, शिव-भक्त और पराक्रमी राजा के रूप में पूजने की परंपरा रही है। मध्य प्रदेश के ही मंदसौर और उज्जैन जैसे क्षेत्रों में भी इसी तरह की लोक-आस्था मौजूद है। विदिशा का रावण गांव इस अनोखी सांस्कृतिक विविधता की एक जीवंत मिसाल है — जहाँ एक ही पात्र को लेकर भारतीय समाज में कई दृष्टिकोण एक साथ जीवित हैं। आने वाले वर्षों में यह गाँव धार्मिक पर्यटन के नक्शे पर और उभर सकता है।