कानपुर का दशानन मंदिर: साल में सिर्फ दशहरे पर खुलता है, रावण की पूजा की जाती है अनोखी परंपरा से
सारांश
मुख्य बातें
कानपुर के शिवाला इलाके में स्थित दशानन मंदिर हर साल केवल एक दिन — विजयादशमी — पर अपने द्वार खोलता है, जब देश के बाकी हिस्सों में रावण का पुतला दहन किया जा रहा होता है। यह मंदिर कैलाश मंदिर परिसर के भीतर स्थित है और 1868 से चली आ रही एक विशिष्ट पूजा-परंपरा का जीवित उदाहरण है। शेष 364 दिन मंदिर के द्वार बंद रहते हैं।
मंदिर का इतिहास और परंपरा
मंदिर के पुजारी पंडित राम बाजपेयी के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण 1868 में महाराज गुरु प्रसाद शुक्ला ने करवाया था। दशहरे के दिन प्रातःकाल द्वार खोलने के बाद रावण की प्रतिमा को दूध और पवित्र जल से स्नान कराया जाता है। उन्होंने बताया, 'इसके बाद पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चना और आरती की जाती है।'
पूजा का आधार: रावण का विद्वान स्वरूप
इस अनूठी परंपरा के पीछे यह मान्यता है कि रावण को केवल बुराई के प्रतीक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यहाँ आने वाले श्रद्धालु उसे एक अत्यंत विद्वान, बुद्धिमान शासक और भगवान शिव के परम भक्त के रूप में सम्मान देते हैं। विजयादशमी के दिन श्रद्धालु यहाँ फूल और तेल के दीपक अर्पित करते हैं तथा रावण के ज्ञान और धार्मिक निष्ठा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
मध्य प्रदेश में भी है रावण-पूजा की परंपरा
यह परंपरा केवल कानपुर तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश के विदिशा जिले की नटेरन तहसील में 'रावण' नाम का एक गाँव है, जहाँ रावण को 'रावण बाबा' कहकर मुख्य देवता के रूप में पूजा जाता है। इस गाँव के प्राचीन मंदिर — जिसे स्थानीय मान्यताओं के अनुसार परमार काल का बताया जाता है — में रावण की 12 फुट लंबी लेटी हुई प्रतिमा है, जहाँ प्रतिदिन पूजा-अर्चना होती है। गौरतलब है कि दशहरे पर पुतला जलाने के बजाय यहाँ रामायण पाठ, भक्ति-गीत और सामुदायिक भोज का आयोजन किया जाता है, जिसमें विदिशा, भोपाल और आसपास के इलाकों से श्रद्धालु शामिल होते हैं।
दशहरे को नया दृष्टिकोण
कानपुर का दशानन मंदिर उस व्यापक उत्सव को एक भिन्न कोण से देखने का अवसर देता है, जिसे आमतौर पर बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। यह मंदिर इस बात का प्रमाण है कि भारत की सांस्कृतिक विविधता में एक ही पौराणिक पात्र की परस्पर भिन्न, फिर भी सह-अस्तित्व में जीवित, व्याख्याएँ मौजूद हैं। आने वाले वर्षों में इस मंदिर की अनोखी परंपरा देश-विदेश के जिज्ञासु तीर्थयात्रियों और शोधार्थियों को आकर्षित करती रहेगी।