20 अक्टूबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

कानपुर का दशानन मंदिर: साल में सिर्फ दशहरे पर खुलता है, रावण की पूजा की जाती है अनोखी परंपरा से

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
कानपुर का दशानन मंदिर: साल में सिर्फ दशहरे पर खुलता है, रावण की पूजा की जाती है अनोखी परंपरा से

सारांश

जब देशभर में रावण का पुतला जलाया जा रहा था, कानपुर के शिवाला इलाके में एक मंदिर के द्वार 364 दिन बाद खुले — और वहाँ रावण की पूजा हुई। 1868 में बना दशानन मंदिर हर विजयादशमी को यह सवाल उठाता है कि क्या पौराणिक पात्र सिर्फ एक ही नज़रिये से देखे जाने चाहिए।

मुख्य बातें

कानपुर के शिवाला इलाके में स्थित दशानन मंदिर साल में केवल एक दिन — विजयादशमी — पर खुलता है।
मंदिर का निर्माण 1868 में महाराज गुरु प्रसाद शुक्ला ने करवाया था।
पुजारी पंडित राम बाजपेयी के अनुसार दशहरे पर रावण की प्रतिमा को दूध और पवित्र जल से स्नान कराया जाता है, फिर आरती और पूजा होती है।
मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में 'रावण' नाम के गाँव में 12 फुट लंबी रावण की प्रतिमा वाला प्राचीन मंदिर है, जहाँ प्रतिदिन पूजा होती है।
दोनों स्थलों पर रावण को भगवान शिव का परम भक्त और विद्वान शासक के रूप में सम्मान दिया जाता है।

कानपुर के शिवाला इलाके में स्थित दशानन मंदिर हर साल केवल एक दिन — विजयादशमी — पर अपने द्वार खोलता है, जब देश के बाकी हिस्सों में रावण का पुतला दहन किया जा रहा होता है। यह मंदिर कैलाश मंदिर परिसर के भीतर स्थित है और 1868 से चली आ रही एक विशिष्ट पूजा-परंपरा का जीवित उदाहरण है। शेष 364 दिन मंदिर के द्वार बंद रहते हैं।

मंदिर का इतिहास और परंपरा

मंदिर के पुजारी पंडित राम बाजपेयी के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण 1868 में महाराज गुरु प्रसाद शुक्ला ने करवाया था। दशहरे के दिन प्रातःकाल द्वार खोलने के बाद रावण की प्रतिमा को दूध और पवित्र जल से स्नान कराया जाता है। उन्होंने बताया, 'इसके बाद पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चना और आरती की जाती है।'

पूजा का आधार: रावण का विद्वान स्वरूप

इस अनूठी परंपरा के पीछे यह मान्यता है कि रावण को केवल बुराई के प्रतीक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यहाँ आने वाले श्रद्धालु उसे एक अत्यंत विद्वान, बुद्धिमान शासक और भगवान शिव के परम भक्त के रूप में सम्मान देते हैं। विजयादशमी के दिन श्रद्धालु यहाँ फूल और तेल के दीपक अर्पित करते हैं तथा रावण के ज्ञान और धार्मिक निष्ठा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं।

मध्य प्रदेश में भी है रावण-पूजा की परंपरा

यह परंपरा केवल कानपुर तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश के विदिशा जिले की नटेरन तहसील में 'रावण' नाम का एक गाँव है, जहाँ रावण को 'रावण बाबा' कहकर मुख्य देवता के रूप में पूजा जाता है। इस गाँव के प्राचीन मंदिर — जिसे स्थानीय मान्यताओं के अनुसार परमार काल का बताया जाता है — में रावण की 12 फुट लंबी लेटी हुई प्रतिमा है, जहाँ प्रतिदिन पूजा-अर्चना होती है। गौरतलब है कि दशहरे पर पुतला जलाने के बजाय यहाँ रामायण पाठ, भक्ति-गीत और सामुदायिक भोज का आयोजन किया जाता है, जिसमें विदिशा, भोपाल और आसपास के इलाकों से श्रद्धालु शामिल होते हैं।

दशहरे को नया दृष्टिकोण

कानपुर का दशानन मंदिर उस व्यापक उत्सव को एक भिन्न कोण से देखने का अवसर देता है, जिसे आमतौर पर बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। यह मंदिर इस बात का प्रमाण है कि भारत की सांस्कृतिक विविधता में एक ही पौराणिक पात्र की परस्पर भिन्न, फिर भी सह-अस्तित्व में जीवित, व्याख्याएँ मौजूद हैं। आने वाले वर्षों में इस मंदिर की अनोखी परंपरा देश-विदेश के जिज्ञासु तीर्थयात्रियों और शोधार्थियों को आकर्षित करती रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि भारत की उस वैचारिक बहुलता के जीवित प्रमाण हैं जिसे मुख्यधारा की मीडिया प्रायः 'विचित्र परंपरा' तक सीमित कर देती है। रावण को शिव-भक्त और विद्वान के रूप में पूजने की परंपरा दक्षिण भारत, श्रीलंका और अब उत्तर व मध्य भारत में भी सदियों से मौजूद है — यह कोई नई खोज नहीं। असली सवाल यह है कि इन परंपराओं को संरक्षण और दस्तावेज़ीकरण क्यों नहीं मिलता, जबकि वे सांस्कृतिक पर्यटन और अंतर-धार्मिक संवाद के लिए अत्यंत मूल्यवान हैं।
RashtraPress
20 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कानपुर का दशानन मंदिर क्या है और यह कहाँ स्थित है?
दशानन मंदिर कानपुर के शिवाला इलाके में कैलाश मंदिर परिसर के भीतर स्थित एक ऐतिहासिक मंदिर है, जहाँ रावण की पूजा की जाती है। इसका निर्माण 1868 में महाराज गुरु प्रसाद शुक्ला ने करवाया था।
दशानन मंदिर साल में कितनी बार खुलता है?
यह मंदिर वर्ष में केवल एक बार विजयादशमी (दशहरे) के दिन खुलता है। शेष 364 दिन मंदिर के द्वार बंद रहते हैं।
दशहरे पर इस मंदिर में रावण की पूजा कैसे की जाती है?
दशहरे की सुबह मंदिर के द्वार खोले जाते हैं, जिसके बाद रावण की प्रतिमा को दूध और पवित्र जल से स्नान कराया जाता है। इसके उपरांत पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चना और आरती की जाती है, तथा श्रद्धालु फूल और तेल के दीपक अर्पित करते हैं।
क्या भारत में और भी स्थान हैं जहाँ रावण की पूजा होती है?
हाँ, मध्य प्रदेश के विदिशा जिले की नटेरन तहसील में 'रावण' नाम का एक गाँव है जहाँ रावण को 'रावण बाबा' कहकर मुख्य देवता के रूप में पूजा जाता है। वहाँ के प्राचीन मंदिर में 12 फुट लंबी रावण की लेटी हुई प्रतिमा है, जहाँ प्रतिदिन पूजा होती है और दशहरे पर पुतला दहन के बजाय रामायण पाठ व सामुदायिक भोज का आयोजन होता है।
लोग रावण की पूजा क्यों करते हैं?
इन परंपराओं के पीछे यह मान्यता है कि रावण केवल बुराई का प्रतीक नहीं था, बल्कि वह एक अत्यंत विद्वान, बुद्धिमान शासक और भगवान शिव का परम भक्त भी था। श्रद्धालु उसके ज्ञान, बुद्धिमत्ता और धार्मिक निष्ठा का सम्मान करने के लिए पूजा करते हैं।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 4 घंटे पहले
  2. 6 घंटे पहले
  3. 21 घंटे पहले
  4. 23 घंटे पहले
  5. कल
  6. कल
  7. 1 साल पहले
  8. 1 साल पहले