रांची में 1948 में पाकिस्तान से आए शरणार्थियों ने किया था पहला रावण दहन, जानें दशहरे की पौराणिक कथाएं
सारांश
मुख्य बातें
विजयादशमी पर रावण दहन महज एक पुतला जलाने की रस्म नहीं है — यह बुराई पर अच्छाई की जीत का सदियों पुराना प्रतीक है। हर वर्ष विजयादशमी के अवसर पर देशभर में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतले जलाए जाते हैं, जो यह संदेश देते हैं कि अहंकार और अन्याय चाहे कितना भी प्रबल हो, अंततः सत्य और धर्म की ही विजय होती है। इस वर्ष 20 अक्टूबर 2026 को दशहरा मनाया जाएगा, हालाँकि आश्विन शुक्ल दशमी तिथि 21 अक्टूबर की दोपहर तक रहने के कारण कुछ क्षेत्रों में पर्व की तिथि भिन्न हो सकती है।
रावण दहन का ऐतिहासिक आरंभ
उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार, भारत का पहला रावण दहन 1948 में रांची में हुआ था और इसका आयोजन पाकिस्तान से आए शरणार्थियों द्वारा किया गया था। यह एक उल्लेखनीय तथ्य है — विभाजन की पीड़ा झेल चुके इन लोगों ने अपनी नई धरती पर इस परंपरा की नींव रखी। इसी वर्ष नागपुर में भी 35 फुट ऊँचे रावण पुतले की स्थापना के साथ यह परंपरा शुरू हुई।
इसके कुछ वर्षों बाद, 1953 में दिल्ली के रामलीला मैदान में पहली बार रावण दहन का आयोजन हुआ, जो आज देश के सबसे बड़े आयोजनों में से एक बन चुका है। गौरतलब है कि रावण दहन की यह प्रथा अपेक्षाकृत नई है और मुख्यतः भारत की स्वतंत्रता के बाद लोकप्रिय हुई — इसके पहले का कोई सटीक ऐतिहासिक अभिलेख उपलब्ध नहीं है।
रामायण में दशहरे की पौराणिक पृष्ठभूमि
रामायण के अनुसार, त्रेतायुग में लंका के राजा रावण ने माता सीता का अपहरण किया था। इसके प्रत्युत्तर में भगवान श्रीराम ने वानर सेना की सहायता से लंका पर आक्रमण किया। इस महासमर में रावण के भाई कुंभकर्ण और पुत्र मेघनाद सहित अनेक योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए।
युद्ध के अंतिम चरण में श्रीराम ने रावण का वध कर माता सीता को मुक्त कराया। इसी विजय को बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है और तभी से प्रतीकात्मक रूप से रावण दहन की परंपरा प्रचलित हुई।
माँ दुर्गा और महिषासुर वध की कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, राक्षस महिषासुर ने कठोर तपस्या द्वारा ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त किया था कि किसी मानव के हाथों उसकी मृत्यु न हो। इस वरदान के बल पर उसने तीनों लोकों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया।
महिषासुर के अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए देवताओं की संयुक्त शक्ति से एक दिव्य स्त्री-शक्ति प्रकट हुई, जो अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित थीं और सिंह पर आरूढ़ थीं। आदि शक्ति ने 9 दिनों के घोर संग्राम के बाद 10वें दिन महिषासुर का वध किया। इस विजय दिवस को ही विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है।
पुतला निर्माण की परंपरा और आधुनिक बदलाव
परंपरागत रूप से रावण का पुतला बाँस, कपड़े, रस्सी और कागज से बनाया जाता था। वर्तमान में फाइबरग्लास जैसी आधुनिक सामग्रियों का भी उपयोग होने लगा है, जिससे पुतलों की ऊँचाई और भव्यता दोनों बढ़ी हैं।
इस पर्व का एक कृषि-सांस्कृतिक पहलू भी है — खरीफ फसल की कटाई का यह मौसम किसानों के लिए उल्लास का समय होता है। वे सुनहरी फसल घर लाते हैं, ईश्वर की कृपा को मानते हैं और पूजा-अर्चना के माध्यम से अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।
इस वर्ष कब मनेगा दशहरा
इस वर्ष दशहरा 20 अक्टूबर 2026 को मनाया जाएगा। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि 21 अक्टूबर की दोपहर तक रहने के कारण कुछ क्षेत्रों और परंपराओं में पर्व की तिथि भिन्न हो सकती है। देशभर में रावण दहन के विशाल आयोजन इस पर्व की धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना को जीवंत रखते हैं।