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कानपुर के दशानन मंदिर में दशहरे पर होती है रावण की पूजा, साल में सिर्फ एक दिन खुलते हैं कपाट

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कानपुर के दशानन मंदिर में दशहरे पर होती है रावण की पूजा, साल में सिर्फ एक दिन खुलते हैं कपाट

सारांश

जब पूरा देश रावण का पुतला जलाता है, कानपुर का 157 साल पुराना दशानन मंदिर उसकी पूजा करता है। विद्वान और शिवभक्त रावण के इस अनूठे स्वरूप को सम्मान देने की यह परंपरा सिर्फ एक दिन के लिए कपाट खोलती है — और एक गहरा संदेश दे जाती है।

मुख्य बातें

कानपुर के शिवाला क्षेत्र स्थित दशानन मंदिर में हर वर्ष विजयादशमी के दिन रावण की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है।
मंदिर के कपाट साल में केवल एक बार — दशहरे के दिन — खोले जाते हैं और शाम को पुनः बंद कर दिए जाते हैं।
मंदिर का निर्माण वर्ष 1868 में महाराज गुरु प्रसाद शुक्ल ने कराया था; पूजा की जिम्मेदारी पुजारी पंडित राम बाजपेयी के परिवार की तीसरी पीढ़ी निभा रही है।
यहाँ रावण को प्रकांड विद्वान, बुद्धिमान और भगवान शिव के परम भक्त के रूप में पूजा जाता है।
पुजारी के अनुसार रावण दहन का उद्देश्य रावण नहीं, बल्कि उसके अहंकार का अंत करना है।
मंदिर में रावण का जन्मदिन भी मनाने की परंपरा है; श्रद्धालु बल, बुद्धि और विवेक का आशीर्वाद माँगते हैं।

उत्तर प्रदेश के कानपुर के शिवाला क्षेत्र स्थित दशानन मंदिर में हर वर्ष विजयादशमी के दिन एक अनूठी परंपरा निभाई जाती है — जब देशभर में रावण का पुतला जलाया जाता है, तब इस मंदिर में रावण की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। कैलाश मंदिर परिसर में स्थित यह मंदिर अपनी विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं के कारण न केवल स्थानीय श्रद्धालुओं, बल्कि दूर-दूर से आने वाले दर्शनार्थियों के बीच भी विशेष स्थान रखता है। मंदिर के कपाट वर्ष में केवल इसी एक दिन खोले जाते हैं और दिनभर पूजन के बाद शाम को पुनः एक वर्ष के लिए बंद कर दिए जाते हैं।

मंदिर का इतिहास और स्थापना

मंदिर के पुजारी पंडित राम बाजपेयी के अनुसार, इस दशानन मंदिर का निर्माण वर्ष 1868 में महाराज गुरु प्रसाद शुक्ल ने कराया था। तब से लेकर आज तक यह परंपरा अनवरत चली आ रही है। पंडित बाजपेयी ने बताया कि यह मंदिर उनके परिवार की तीसरी पीढ़ी द्वारा संचालित है और पूजा-अर्चना की यह जिम्मेदारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रही है। 157 वर्षों से अधिक पुरानी इस परंपरा का निर्वाह आज भी उसी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ किया जाता है।

पूजा का विधि-विधान

विजयादशमी की सुबह कपाट खुलते ही मंदिर में रावण की प्रतिमा का दूध और पवित्र जल से अभिषेक किया जाता है। इसके पश्चात विधिवत पूजा-अर्चना और आरती संपन्न होती है। श्रद्धालु रावण की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करते हैं और तेल के दीपक प्रज्वलित कर अपनी मनोकामनाएँ व्यक्त करते हैं। पंडित बाजपेयी ने बताया कि यहाँ आने वाले अधिकांश श्रद्धालु बल, बुद्धि और विवेक का आशीर्वाद माँगते हैं। उल्लेखनीय है कि मंदिर में रावण का जन्मदिन भी मनाने की परंपरा है।

रावण को लेकर विशेष मान्यता

पंडित बाजपेयी के अनुसार, इस मंदिर में रावण को केवल बुराई के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि प्रकांड विद्वान, कुशल बुद्धिजीवी और भगवान शिव के परम भक्त के रूप में देखा जाता है। इसी मान्यता के आधार पर उनकी पूजा की जाती है। गौरतलब है कि भारत में कानपुर के अलावा भी कुछ स्थानों पर — विशेषतः आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों में — रावण को शिवभक्त के रूप में सम्मान देने की परंपराएँ मौजूद हैं। यह मंदिर इस दृष्टि से उत्तर भारत में एक अपवाद-स्वरूप उदाहरण माना जाता है।

रावण दहन और अहंकार का संदेश

पुजारी पंडित राम बाजपेयी ने स्पष्ट किया कि दशहरे की शाम को रावण के पुतले का दहन अवश्य किया जाता है, किंतु इसका उद्देश्य रावण के चरित्र का नहीं, बल्कि उसके अहंकार का अंत करना है। उनके शब्दों में, 'यदि रावण में अहंकार नहीं होता, तो उसका पतन नहीं होता।' इस प्रकार मंदिर की परंपरा यह संदेश देती है कि विद्या और शक्ति के बावजूद अहंकार ही पतन का कारण बनता है।

श्रद्धालुओं की उपस्थिति और आगे की परंपरा

प्रत्येक वर्ष विजयादशमी के दिन कपाट खुलते ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं। दिनभर अबाध रूप से पूजा-अर्चना और दर्शन का सिलसिला चलता है। शाम को पुतला दहन के पश्चात मंदिर के कपाट एक वर्ष के लिए पुनः बंद कर दिए जाते हैं। यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों को भी इसी समर्पण के साथ सौंपी जाएगी, यह विश्वास पंडित बाजपेयी का परिवार रखता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और भारत के कई कोनों में उसकी पूजा इसी समझ का प्रमाण है। यह परंपरा 157 वर्षों से चली आ रही है, फिर भी राष्ट्रीय विमर्श में इसे हाशिये पर रखा जाता है। दशहरे को केवल प्रतीकात्मक बुराई-उन्मूलन के रूप में देखने की बजाय, यह मंदिर 'अहंकार ही पतन का कारण है' — इस दार्शनिक संदेश को केंद्र में रखता है, जो आज के राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ में भी उतना ही प्रासंगिक है।
RashtraPress
20 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कानपुर का दशानन मंदिर कहाँ स्थित है और यह क्यों प्रसिद्ध है?
दशानन मंदिर उत्तर प्रदेश के कानपुर में शिवाला क्षेत्र स्थित कैलाश मंदिर परिसर में है। यह मंदिर इसलिए प्रसिद्ध है क्योंकि यहाँ विजयादशमी के दिन रावण की पूजा-अर्चना की जाती है — जो देश की सामान्य रावण दहन परंपरा से बिल्कुल भिन्न है।
दशानन मंदिर के कपाट साल में कितनी बार खुलते हैं?
इस मंदिर के कपाट वर्ष में केवल एक बार, विजयादशमी (दशहरे) के दिन खोले जाते हैं। दिनभर पूजा-अर्चना और दर्शन के बाद शाम को पुनः बंद कर दिए जाते हैं, जो अगले वर्ष दशहरे पर ही फिर खुलते हैं।
इस मंदिर में रावण की पूजा क्यों की जाती है?
यहाँ रावण को केवल बुराई के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि प्रकांड विद्वान, बुद्धिमान और भगवान शिव के परम भक्त के रूप में देखा जाता है। पुजारी पंडित राम बाजपेयी के अनुसार, पूजा का उद्देश्य रावण के इसी विद्वान और शिवभक्त स्वरूप के प्रति सम्मान प्रकट करना है।
दशानन मंदिर का इतिहास क्या है?
इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1868 में महाराज गुरु प्रसाद शुक्ल ने कराया था। तब से 157 वर्षों से अधिक समय से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है और पुजारी राम बाजपेयी के परिवार की तीसरी पीढ़ी इस परंपरा का निर्वाह कर रही है।
क्या दशानन मंदिर में रावण दहन भी होता है?
पुजारी पंडित राम बाजपेयी के अनुसार, दशहरे की शाम को रावण के पुतले का दहन किया जाता है, लेकिन इसका उद्देश्य रावण के बजाय उसके अहंकार का अंत करना है। उनका मानना है कि यदि रावण में अहंकार नहीं होता, तो उसका पतन नहीं होता।
राष्ट्र प्रेस
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