3 नवंबर 2026
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एसआईआर विवाद: भाजपा का सवाल — क्या कांग्रेस का अस्तित्व रोहिंग्या और घुसपैठियों के फर्जी वोटों पर टिका है?

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एसआईआर विवाद: भाजपा का सवाल — क्या कांग्रेस का अस्तित्व रोहिंग्या और घुसपैठियों के फर्जी वोटों पर टिका है?

सारांश

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के एसआईआर-बचाव वाले बयान के बाद बिहार भाजपा ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने सवाल किया कि कांग्रेस का राजनीतिक अस्तित्व क्या रोहिंग्या और घुसपैठियों के फर्जी वोटों पर टिका है। जदयू ने संतुलित रुख अपनाते हुए प्रशासनिक जवाबदेही की माँग की।

मुख्य बातें

बिहार भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने 3 नवंबर 2026 को कांग्रेस पर सवाल उठाया कि क्या उसका अस्तित्व रोहिंग्या और घुसपैठियों के फर्जी वोटों पर निर्भर है।
गृह मंत्री अमित शाह के अनुसार एसआईआर के तहत तीन करोड़ फर्जी, मृत व अवैध नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए।
सरावगी ने कहा कि कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के तहत एक करोड़ नाम काटे गए और वहाँ के मंत्री खुद एसआईआर को सही बता रहे हैं।
बिहार के मंत्री रामकृपाल यादव ने भी अमित शाह के बयान का समर्थन किया और अवैध घुसपैठियों पर कार्रवाई को जरूरी बताया।
जदयू के राष्ट्रीय महासचिव श्याम रजक ने निर्वाचन अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की जरूरत पर जोर दिया।

बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने 3 नवंबर 2026 को पटना में तीखा सवाल उठाया कि क्या कांग्रेस का पूरा राजनीतिक अस्तित्व रोहिंग्या और अवैध घुसपैठियों के फर्जी वोटों पर टिका है। यह बयान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस वक्तव्य के समर्थन में आया, जिसमें शाह ने आरोप लगाया था कि विपक्षी दल विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का विरोध इसलिए कर रहे हैं क्योंकि अवैध घुसपैठिए उनका वोट बैंक हैं।

भाजपा की मुख्य दलीलें

सरावगी ने कहा, 'अमित शाह हर मंच से बार-बार यही बात कह रहे हैं लेकिन विपक्ष को न तो दिखाई दे रहा है और न ही सुनाई दे रहा है।' उनका तर्क था कि गृह मंत्री ने स्पष्ट किया है कि तीन करोड़ फर्जी, मृत और अवैध घुसपैठियों के बोगस नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, फिर भी विपक्ष आपत्ति जता रहा है।

सरावगी ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस शासित राज्यों में ही एसआईआर को उचित माना जा रहा है। उनके अनुसार, कर्नाटक में एक करोड़ नाम काटे गए हैं और वहाँ के वरिष्ठ मंत्री स्वयं कह रहे हैं कि एसआईआर सही हुआ। इसी प्रकार केरल के मंत्री भी इसे सही ठहरा रहे हैं।

बिहार के संदर्भ में दावे

सरावगी ने दावा किया कि बिहार में जिन लोगों के नाम काटे गए हैं, वे या तो मृत थे, स्थायी रूप से अन्यत्र स्थानांतरित हो चुके थे, अथवा उनका नाम दो जगह दर्ज था। उनके अनुसार, विपक्ष एक भी ऐसा व्यक्ति सामने नहीं ला सका जो यह कह सके कि वह जीवित मतदाता है और उसका नाम गलत तरीके से काटा गया।

सरावगी ने चेतावनी दी कि जो नेता देश की सुरक्षा और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया के बजाय विदेशी घुसपैठियों की ढाल बनकर खड़ा होगा, उसे 140 करोड़ भारतीय कभी देश का नेतृत्व नहीं सौंपेंगे।

बिहार सरकार की प्रतिक्रिया

बिहार सरकार के मंत्री रामकृपाल यादव ने भी अमित शाह के बयान को सही ठहराया। उन्होंने कहा कि एसआईआर के दौरान तीन करोड़ ऐसे लोग पाए गए जिन्होंने कथित तौर पर अवैध तरीके से देश में अपना नाम जुड़वाकर राष्ट्रीय संसाधनों का लाभ उठाया। यादव ने कहा, 'खाएगा हमारा और गाएगा दूसरा, ऐसा नहीं चल सकता। कुछ विदेशी ताकतें घुसपैठियों के जरिए देश में अव्यवस्था फैलाने की कोशिश कर रही हैं।'

जदयू का संतुलित रुख

जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के राष्ट्रीय महासचिव श्याम रजक ने कुछ अलग स्वर में बात की। उन्होंने कहा कि यह सवाल केवल राहुल गांधी या अमित शाह का नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र के काम करने का है। रजक के अनुसार, यदि कोई अवैध व्यक्ति मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने में सफल होता है, तो इसमें निर्वाचन से जुड़े अधिकारियों की भी जिम्मेदारी बनती है।

रजक ने कहा, 'भाषण देकर जनता को गुमराह करने की कोशिश की जा रही है। सीधी सी बात है — जो गलत है वह गलत है और जो सही है वह सही है। केवल भाषणबाजी से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।' यह ऐसे समय में आया है जब एनडीए के भीतर एसआईआर पर राजनीतिक सहमति और प्रशासनिक जवाबदेही दोनों पर बहस जारी है।

आगे की राह

गौरतलब है कि एसआईआर के आंकड़ों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर विवाद गहराता जा रहा है। विपक्षी दल जहाँ इसे मतदाताओं के अधिकारों पर हमला बता रहे हैं, वहीं सत्तारूढ़ गठबंधन इसे मतदाता सूची की शुद्धता के लिए आवश्यक कदम करार दे रहा है। इस बहस का अगला पड़ाव संभवतः संसद में देखने को मिलेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

एनडीए की एकजुट कथा में एक दरार खोलती है। मुख्यधारा की कवरेज जो चूक जाती है वह यह है कि कर्नाटक और केरल के उदाहरण भाजपा के लिए दोधारी तलवार हैं — यदि कांग्रेस शासित राज्यों में भी एसआईआर 'सही' हुआ, तो यह विवाद दलीय नहीं, प्रशासनिक है। असली परीक्षा यह है कि वे कौन से जीवित, वैध मतदाता हैं जिनके नाम इस प्रक्रिया में गलती से कट गए — और उनकी आवाज़ इस राजनीतिक शोर में दबती जा रही है।
RashtraPress
3 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एसआईआर (SIR) क्या है और इसे लेकर विवाद क्यों है?
एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण एक चुनावी प्रक्रिया है जिसके तहत मतदाता सूचियों की समीक्षा कर मृत, डुप्लीकेट और अवैध नामों को हटाया जाता है। विवाद इसलिए है क्योंकि विपक्ष का दावा है कि इस प्रक्रिया में वैध मतदाताओं के नाम भी काटे गए हैं, जबकि सत्तारूढ़ गठबंधन इसे सूची शुद्धता के लिए जरूरी बताता है।
अमित शाह ने एसआईआर पर क्या कहा था?
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि विपक्षी दल एसआईआर का विरोध इसलिए कर रहे हैं क्योंकि अवैध घुसपैठिए उनका वोट बैंक हैं। उन्होंने यह भी बताया कि इस प्रक्रिया में तीन करोड़ फर्जी, मृत और अवैध घुसपैठियों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं।
भाजपा ने कर्नाटक और केरल का उदाहरण क्यों दिया?
भाजपा का तर्क है कि कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के अंतर्गत एक करोड़ नाम काटे गए और वहाँ के वरिष्ठ मंत्री खुद एसआईआर को उचित बता रहे हैं, वैसे ही केरल में भी। इससे भाजपा यह साबित करना चाहती है कि एसआईआर का विरोध राजनीतिक दोहरेपन पर आधारित है।
जदयू ने इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाया?
जदयू के राष्ट्रीय महासचिव श्याम रजक ने कहा कि यदि अवैध व्यक्ति मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने में सफल हुए, तो इसमें निर्वाचन से जुड़े सरकारी अधिकारियों की भी जिम्मेदारी है। उन्होंने केवल भाषणबाजी की बजाय व्यावहारिक सुधार की माँग की।
बिहार में एसआईआर के तहत किनके नाम काटे गए?
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी के अनुसार बिहार में जिन लोगों के नाम हटाए गए, वे मृत थे, स्थायी रूप से अन्यत्र स्थानांतरित हो चुके थे या उनके नाम दो जगह दर्ज थे। उनका दावा है कि विपक्ष एक भी ऐसा जीवित मतदाता सामने नहीं ला सका जिसका नाम गलत तरीके से काटा गया हो।
राष्ट्र प्रेस
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