23 अक्टूबर 2026
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केरल RTI विवाद: भाजपा के सुरेंद्रन का सतीशन सरकार पर आरोप, सतर्कता फाइलें छुपाने की कोशिश

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केरल RTI विवाद: भाजपा के सुरेंद्रन का सतीशन सरकार पर आरोप, सतर्कता फाइलें छुपाने की कोशिश

सारांश

केरल में RTI विवाद गहराया — भाजपा के सुरेंद्रन का आरोप है कि सतर्कता विभाग के टी अनुभागों को पारदर्शिता कानून से छूट देना भ्रष्ट नेताओं को बचाने की कोशिश है। 2016 में हाईकोर्ट ऐसे ही प्रयास पर रोक लगा चुका है — यूडीएफ और एलडीएफ दोनों पर एक जैसे आरोप।

मुख्य बातें

भाजपा के राष्ट्रीय सचिव के.
सुरेंद्रन ने 23 अक्टूबर 2026 को केरल की वीडी सतीशन सरकार पर सतर्कता विभाग के टी-1 और टी-2 अनुभागों को RTI से छूट देकर भ्रष्टाचार में लिप्त नेताओं को बचाने का आरोप लगाया।
गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने कहा कि सतर्कता जाँच की गोपनीय प्रकृति के कारण यह छूट आवश्यक है।
टी अनुभागों में मुख्यमंत्री, मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार से जुड़ी गोपनीय फाइलें रखी जाती हैं।
2016 में केरल उच्च न्यायालय ऐसी ही RTI छूट पर रोक लगा चुका है; 2025 में LDF सरकार ने भी इसी तरह का प्रयास किया था।
सुरेंद्रन के अनुसार, यूडीएफ और एलडीएफ दोनों ने बार-बार सतर्कता विभाग को पारदर्शिता कानून से बाहर रखने की कोशिश की है।

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय सचिव के. सुरेंद्रन ने शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026 को तिरुवनंतपुरम में वीडी सतीशन के नेतृत्व वाली केरल सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि सतर्कता विभाग के टी-1 और टी-2 अनुभागों को सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम से छूट देकर भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे राजनीतिक नेताओं और अधिकारियों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। सुरेंद्रन ने इस नवीनतम अधिसूचना को 'अलोकतांत्रिक' और 'भ्रष्टाचार को संरक्षण देने का प्रयास' करार दिया।

टी अनुभाग और उनकी संवेदनशीलता

सतर्कता विभाग के टी अनुभागों में मुख्यमंत्री, मंत्रियों, राजनीतिक नेताओं और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों से जुड़ी गोपनीय फाइलें रखी जाती हैं। इन्हीं अनुभागों को RTI के दायरे से बाहर करने की अधिसूचना विवाद का केंद्र बन गई है। सुरेंद्रन ने चेतावनी दी कि सतर्कता निदेशक को यह तय करने का पूर्ण विवेकाधिकार देना कि कौन सी फाइलें टी अनुभागों के तहत रखी जाएँ, इस अधिकार के दुरुपयोग का रास्ता खोलता है।

सरकार का बचाव

केरल के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने इस निर्णय का बचाव करते हुए कहा कि सतर्कता विभाग की जाँच गोपनीय प्रकृति की होती है और उसके प्रभावी संचालन के लिए गोपनीयता आवश्यक है। उनका तर्क था कि पिछली सरकार ने टी अनुभागों को RTI अधिनियम के तहत लाया था, जबकि ये अनुभाग वास्तव में इसके दायरे में नहीं आते। सरकार ने इस कदम को प्रशासनिक स्पष्टता के रूप में प्रस्तुत किया है।

राजनीतिक आरोप और पूर्व मिसालें

सुरेंद्रन ने इस निर्णय के समय पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने पूछा कि क्या इस कदम का उद्देश्य पूर्व मुख्यमंत्री और सीपीआई (एम) नेता पिनाराई विजयन — जो अब विपक्ष के नेता हैं — के खिलाफ चल रही सतर्कता जाँच को कमज़ोर करना है। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF) सरकार के कुछ मंत्री भी जाँच का सामना कर रहे हैं और इस छूट से उन्हें राहत मिल सकती है।

गौरतलब है कि यह पहला मौका नहीं है। सुरेंद्रन के अनुसार, 2016 में ओमन चांडी के नेतृत्व वाली यूडीएफ सरकार ने इसी तरह की RTI छूट पाने का प्रयास किया था, जिस पर केरल उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप कर सरकारी आदेश पर रोक लगानी पड़ी थी। इसके बाद 2025 में पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली वामपंथी लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) सरकार ने भी यही प्रयास किया था।

विपक्ष का व्यापक आरोप

सुरेंद्रन ने तर्क दिया कि यूडीएफ और एलडीएफ, दोनों ही राजनीतिक खेमे, सतर्कता विभाग को RTI के दायरे से बाहर रखने के मामले में एकजुट रहे हैं। उनके अनुसार दोनों मोर्चों ने बार-बार यह साबित किया है कि भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे लोगों को बचाने और संवेदनशील मामलों को जनता की नज़रों से दूर रखने में उनकी नीयत एक जैसी है। उन्होंने कहा कि नवीनतम अधिसूचना सत्ता में बैठे लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों के निपटारे में पारदर्शिता को गंभीर रूप से कमज़ोर करेगी।

आगे क्या होगा

यह ऐसे समय में आया है जब केरल में सतर्कता जाँच की प्रक्रिया पहले से ही राजनीतिक विवाद के केंद्र में है। 2016 की हाईकोर्ट की रोक को देखते हुए, विधिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस अधिसूचना को भी न्यायिक चुनौती मिल सकती है। भाजपा ने संकेत दिए हैं कि वह इस मुद्दे को संसद और अदालत दोनों स्तरों पर उठाएगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि केरल की राजनीतिक संस्कृति के एक गहरे दोष का प्रतिबिंब है। 2016 में हाईकोर्ट की रोक और 2025 के असफल प्रयास के बावजूद, अब तीसरी बार यही कोशिश होना बताता है कि सत्ता की परवाह किए बिना पारदर्शिता को दरकिनार करने की प्रवृत्ति दोनों मोर्चों में समान रूप से मौजूद है। असली सवाल यह है कि सतर्कता निदेशक को असीमित विवेकाधिकार देना — बिना किसी स्वतंत्र निगरानी तंत्र के — जाँच प्रक्रिया की विश्वसनीयता को किस हद तक नुकसान पहुँचाएगा। जब तक फाइल वर्गीकरण की शक्ति पूरी तरह कार्यपालिका के हाथों में रहेगी, तब तक RTI केवल कागज पर पारदर्शिता का औज़ार बनकर रह जाएगी।
RashtraPress
23 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

केरल में RTI छूट का विवाद क्या है?
केरल सरकार ने सतर्कता विभाग के टी-1 और टी-2 अनुभागों को सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम से छूट देने की अधिसूचना जारी की है। इन अनुभागों में मुख्यमंत्री, मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार से जुड़ी गोपनीय फाइलें रखी जाती हैं, जिस वजह से विपक्ष ने इसे पारदर्शिता पर हमला बताया है।
भाजपा के के. सुरेंद्रन ने क्या आरोप लगाए हैं?
भाजपा के राष्ट्रीय सचिव के. सुरेंद्रन ने आरोप लगाया है कि यह छूट भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे राजनीतिक नेताओं और अधिकारियों को बचाने के लिए दी गई है। उन्होंने यह भी कहा कि सतर्कता निदेशक को असीमित विवेकाधिकार देना सरकार के लिए संवेदनशील मामलों को जनता से छुपाना आसान बना देगा।
सरकार ने इस फैसले का बचाव कैसे किया?
गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने कहा कि सतर्कता जाँच की गोपनीय प्रकृति के कारण टी अनुभागों को RTI से छूट देना प्रशासनिक रूप से आवश्यक है। उनका तर्क था कि पिछली सरकार ने गलती से इन्हें RTI के दायरे में शामिल किया था।
क्या पहले भी ऐसा प्रयास हुआ है?
हाँ, 2016 में ओमन चांडी की यूडीएफ सरकार ने ऐसी ही छूट देने का प्रयास किया था, जिसे केरल उच्च न्यायालय ने रोक दिया था। इसके बाद 2025 में पिनाराई विजयन की LDF सरकार ने भी इसी तरह का प्रयास किया था।
इस विवाद का आगे क्या असर हो सकता है?
विधिक विशेषज्ञों के अनुसार, 2016 की हाईकोर्ट रोक को देखते हुए इस अधिसूचना को भी न्यायिक चुनौती मिल सकती है। भाजपा ने संकेत दिए हैं कि वह इस मुद्दे को संसद और न्यायालय दोनों स्तरों पर उठाएगी।
राष्ट्र प्रेस
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