जस्टिस यशवंत वर्मा कैश कांड: 'ब्रदर जज एक-दूसरे को बचाते हैं' — रिटायर्ड जस्टिस ढींगरा
सारांश
मुख्य बातें
सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति एस.एन. ढींगरा ने 13 अगस्त 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास से नकदी बरामदगी मामले में गठित जाँच समिति की रिपोर्ट पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय समिति के निष्कर्षों की पुष्टि की है, और साथ ही यह भी आरोप लगाया कि न्यायपालिका के भीतर 'ब्रदर जज' एक-दूसरे की रक्षा करते हैं, जिसके चलते पहले दिन ही दर्ज होनी वाली एफआईआर आज तक नहीं हुई।
जाँच समिति की रिपोर्ट
जाँच समिति ने अपनी कार्यवाही पूरी कर 12 अगस्त, बुधवार को अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिटायर्ड जस्टिस ढींगरा ने कहा, 'इस रिपोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट कमेटी की रिपोर्ट को कन्फर्म किया है। रिपोर्ट ने यह कहा है कि उनके घर के स्टोर से जो कैश मिला है, वह उन्हीं का था और उन्हीं की जवाबदेही है। उन्होंने सबूत हटाने की भी कोशिश की। वे इस बात के लिए दोषी हैं।'
एफआईआर क्यों नहीं हुई
जस्टिस ढींगरा ने इस मामले में एफआईआर न होने पर गहरी आपत्ति जताई। उनके अनुसार, अनुमानित ₹15 से ₹50 करोड़ की नकदी बरामद होने के बावजूद पहले दिन कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई। उन्होंने कहा, 'ये सभी ब्रदर जज हैं। ये एक-दूसरे की रक्षा करते हैं। ये सुरक्षा कानून को दें या न दें, लेकिन ब्रदर जज को ज़रूर देते हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को रिपोर्ट मिलते ही पुलिस को एफआईआर दर्ज करने और साइट सील करने का आदेश देना चाहिए था, किंतु ऐसा नहीं हुआ। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय एफआईआर के लिए दायर दो याचिकाएँ पहले ही खारिज कर चुका है — एक इस आधार पर कि किसी ने औपचारिक शिकायत नहीं की, और दूसरी याचिकाकर्ता वकील को फटकार लगाते हुए।
महाभियोग की सीमाएँ
जस्टिस ढींगरा ने महाभियोग प्रक्रिया की संवैधानिक सीमाओं को भी रेखांकित किया। उनके अनुसार, जस्टिस वर्मा इस्तीफा दे चुके हैं, इसलिए संसद उन्हें पद से नहीं हटा सकती। उन्होंने कहा, 'हमारे संविधान के अनुसार, अगर किसी जज ने अपने हाथ से इस्तीफा लिखकर राष्ट्रपति को दिया है, तो वह इस्तीफा उसी दिन से लागू माना जाता है।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि जाँच समिति का गठन लोकसभा अध्यक्ष ने किया था, और आगे की कार्रवाई का दायित्व भी उन्हीं का है।
आपराधिक कार्रवाई की माँग
रिटायर्ड जस्टिस ढींगरा ने स्पष्ट किया कि जाँच समिति स्वयं कोई आपराधिक कार्रवाई नहीं कर सकती — उसका एकमात्र दायित्व यह निर्धारित करना था कि जस्टिस वर्मा दोषी हैं या नहीं। उन्होंने कहा कि नकदी का लिंक जस्टिस वर्मा से स्थापित होने पर उनके विरुद्ध एफआईआर दर्ज होनी चाहिए थी, 'क्योंकि पैसे लेना न्यायिक कार्रवाई नहीं है।' उन्होंने चेताया कि ऐसे मामलों में जवाबदेही न होने से 'ऐसे जज छाती चौड़ी करके घूमते हैं।'
आगे क्या होगा
फिलहाल मामला लोकसभा अध्यक्ष के विवेक पर निर्भर है। जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के बाद महाभियोग का रास्ता संवैधानिक रूप से बंद हो चुका है, और आपराधिक जाँच की माँग अभी भी लंबित है। यह मामला न्यायपालिका की आंतरिक जवाबदेही तंत्र और पुलिस की स्वायत्त कार्रवाई की सीमाओं पर बड़े सवाल खड़े करता है।