4 अगस्त 2026
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सीबीआई कोर्ट का फैसला: रिश्वत मामले में पूर्व रेलवे इंजीनियर गिरिजेश कुमार गौड़ को 4 साल की कठोर कैद

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सीबीआई कोर्ट का फैसला: रिश्वत मामले में पूर्व रेलवे इंजीनियर गिरिजेश कुमार गौड़ को 4 साल की कठोर कैद

सारांश

लखनऊ की सीबीआई कोर्ट ने उत्तर मध्य रेलवे के पूर्व एडीएसटीई गिरिजेश कुमार गौड़ को ₹9,700 की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े जाने के मामले में 4 साल की कठोर कैद की सजा सुनाई। 2016 में दर्ज इस मामले में लंबे ट्रायल के बाद आया यह फैसला रेलवे में ठेका-आधारित भ्रष्टाचार के खिलाफ न्यायिक सख्ती का संकेत है।

मुख्य बातें

लखनऊ की सीबीआई कोर्ट ने 4 अगस्त 2026 को पूर्व रेलवे इंजीनियर गिरिजेश कुमार गौड़ को दोषी ठहराया।
गौड़ को 4 वर्ष की कठोर कैद और ₹20,000 जुर्माने की सजा सुनाई गई।
आरोपी उत्तर मध्य रेलवे, बांदा (यूपी) में एडीएसटीई के पद पर तैनात थे।
गौड़ ने ₹80,000 के बिल पास कराने के लिए ₹20,000 रिश्वत मांगी थी।
सीबीआई ने 27 मई 2016 को जाल बिछाकर ₹9,700 की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा था।
चार्जशीट 24 जून 2016 को दाखिल की गई थी।

लखनऊ की केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) कोर्ट ने 4 अगस्त 2026 को रिश्वतखोरी के एक मामले में पूर्व रेलवे इंजीनियर गिरिजेश कुमार गौड़ को दोषी करार देते हुए 4 वर्ष की कठोर कैद और ₹20,000 जुर्माने की सजा सुनाई। गौड़ उत्तर मध्य रेलवे, बांदा (उत्तर प्रदेश) में असिस्टेंट डिविजनल सिग्नल एंड टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियर (एडीएसटीई) के पद पर कार्यरत थे, जब उन्हें 27 मई 2016 को रंगे हाथों पकड़ा गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

सीबीआई के अनुसार, यह मामला एक शिकायत के आधार पर 27 मई 2016 को दर्ज किया गया था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि गौड़ ने उनके ₹80,000 के बिल को पास और मंजूर करने के बदले ₹20,000 की रिश्वत की मांग की थी। ये बिल एडीएसटीई कार्यालय, बांदा के साथ अनुबंध के तहत लगाए गए वाहन से संबंधित थे।

रिश्वत की राशि दो किस्तों में तय की गई थी — बिल मंजूरी से पहले ₹10,000 और मंजूरी के बाद ₹10,000। यह ढांचा भ्रष्टाचार की एक सुनियोजित कार्यशैली की ओर संकेत करता है।

सीबीआई का जाल और गिरफ्तारी

शिकायत मिलने के बाद सीबीआई ने त्वरित कार्रवाई करते हुए उसी दिन — 27 मई 2016 को — एक जाल बिछाया। आरोपी गौड़ को उनके घर पर ₹9,700 की अवैध रिश्वत मांगते और स्वीकार करते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया गया। यह राशि ₹10,000 की कथित मांग के विरुद्ध ली गई थी। जांच पूरी होने के बाद सीबीआई ने 24 जून 2016 को गौड़ के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की।

अदालत का फैसला

लंबे ट्रायल के बाद लखनऊ की सीबीआई कोर्ट ने गौड़ को दोषी पाते हुए 4 वर्ष की कठोर कैद और ₹20,000 के जुर्माने की सजा सुनाई। यह फैसला सरकारी सेवा में भ्रष्टाचार के खिलाफ न्यायिक कड़ाई का एक स्पष्ट संदेश है। गौरतलब है कि सीबीआई कोर्टों में भ्रष्टाचार के मामलों में सजा की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक रही है।

व्यापक संदर्भ

यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब सरकारी विभागों में ठेकेदारों से रिश्वत वसूली के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। रेलवे जैसे बड़े सार्वजनिक उपक्रमों में ठेका-आधारित भुगतान प्रणाली को भ्रष्टाचार का एक संवेदनशील बिंदु माना जाता है। सीबीआई की इस कार्रवाई को भ्रष्ट अधिकारियों के प्रति जीरो-टॉलरेंस नीति की दिशा में एक अहम कदम के रूप में देखा जा रहा है।

इस फैसले के बाद अब यह देखना होगा कि क्या गौड़ उच्च न्यायालय में अपील करते हैं या सजा को स्वीकार करते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

जहाँ छोटे ठेकेदार अपने वैध बिलों के लिए भी अधिकारियों की मनमानी का शिकार होते हैं। ₹80,000 के बिल पर ₹20,000 की रिश्वत — यानी 25% की 'कट' — यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार संस्थागत रूप ले चुका था। 2016 से 2026 तक चले इस ट्रायल की लंबाई यह भी रेखांकित करती है कि भ्रष्टाचार के मामलों में न्याय की गति अभी भी चिंताजनक रूप से धीमी है। सजा का यह फैसला स्वागतयोग्य है, लेकिन असली सवाल यह है कि ऐसी प्रणालीगत खामियों को दूर करने के लिए संरचनात्मक सुधार कब होंगे।
RashtraPress
4 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गिरिजेश कुमार गौड़ को किस मामले में सजा हुई है?
गिरिजेश कुमार गौड़ को उत्तर मध्य रेलवे, बांदा में एडीएसटीई के पद पर रहते हुए एक ठेकेदार से ₹20,000 की रिश्वत मांगने और ₹9,700 लेते हुए रंगे हाथों पकड़े जाने के मामले में दोषी ठहराया गया है। लखनऊ की सीबीआई कोर्ट ने उन्हें 4 वर्ष की कठोर कैद और ₹20,000 जुर्माने की सजा सुनाई।
सीबीआई ने यह मामला कब और कैसे दर्ज किया?
सीबीआई ने 27 मई 2016 को एक शिकायत के आधार पर यह मामला दर्ज किया। उसी दिन जाल बिछाकर गौड़ को उनके घर पर ₹9,700 की रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया गया। जांच के बाद 24 जून 2016 को चार्जशीट दाखिल की गई।
रिश्वत की मांग किस काम के लिए की गई थी?
शिकायतकर्ता का एडीएसटीई कार्यालय, बांदा के साथ वाहन अनुबंध था। उनके ₹80,000 के बिल को पास और मंजूर करने के बदले गौड़ ने ₹20,000 की रिश्वत मांगी थी — बिल मंजूरी से पहले ₹10,000 और बाद में ₹10,000।
इस फैसले का क्या महत्व है?
यह फैसला सरकारी सेवाओं में भ्रष्टाचार के खिलाफ न्यायिक सख्ती का संकेत है। रेलवे जैसे बड़े सार्वजनिक उपक्रमों में ठेका-भुगतान प्रणाली में रिश्वतखोरी के मामलों में दोषसिद्धि दर अपेक्षाकृत कम रही है, इसलिए यह सजा एक महत्वपूर्ण नजीर मानी जा रही है।
राष्ट्र प्रेस
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