31 जुलाई 2026
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लखनऊ सीबीआई कोर्ट ने रेलवे गुड्स क्लर्क को रिश्वत मामले में सुनाई 4 साल की सजा, ₹10,000 जुर्माना

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लखनऊ सीबीआई कोर्ट ने रेलवे गुड्स क्लर्क को रिश्वत मामले में सुनाई 4 साल की सजा, ₹10,000 जुर्माना

सारांश

लखनऊ की सीबीआई अदालत ने रेलवे गुड्स क्लर्क को ₹7,200 की रिश्वत लेने पर 4 साल की सज़ा सुनाई — 2017 में दर्ज मामले में आया यह फैसला उसी सप्ताह आया जब सीबीआई ने वाराणसी में एनईआर के वरिष्ठ अधिकारी को ₹1.70 लाख की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों दबोचा।

मुख्य बातें

लखनऊ सीबीआई कोर्ट ने 30 जुलाई 2026 को रेलवे गुड्स क्लर्क दुर्गेश बहादुर सिंह को 4 साल की जेल और ₹10,000 जुर्माने की सज़ा सुनाई।
आरोपी ने रायबरेली दरियापुर जंक्शन पर तैनाती के दौरान ₹1,26,000 के डेमरेज चार्ज को घटाने के बदले ₹7,200 रिश्वत ली थी।
सीबीआई ने 13 अक्टूबर 2017 को मामला दर्ज कर जाल बिछाया और आरोपी को रंगे हाथों पकड़ा; 30 नवंबर 2017 को चार्जशीट दाखिल हुई।
उसी सप्ताह सीबीआई ने वाराणसी में एनईआर के वरिष्ठ मंडल सामग्री प्रबंधक को ₹1.70 लाख रिश्वत लेते हुए 23 जुलाई 2026 को गिरफ्तार किया।
वाराणसी मामले में आरोप है कि अधिकारी ने ₹9.47 लाख के फर्नीचर आपूर्ति का भुगतान रोककर रिश्वत माँगी और भविष्य के अनुबंध न देने की धमकी दी।

लखनऊ की सीबीआई विशेष अदालत ने 30 जुलाई 2026 को रिश्वत मामले में दुर्गेश बहादुर सिंह को दोषी करार देते हुए चार साल के कारावास और ₹10,000 के जुर्माने की सज़ा सुनाई। सिंह रायबरेली के दरियापुर जंक्शन रेलवे स्टेशन पर गुड्स क्लर्क के पद पर तैनात थे, जब उन्हें रंगे हाथों गिरफ्तार किया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) ने 13 अक्टूबर 2017 को मैसर्स आरडी सीमेंट इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड, लखनऊ के निदेशक की शिकायत पर यह मामला दर्ज किया था। शिकायत के अनुसार, आरोपी गुड्स क्लर्क ने कंपनी पर लगाए गए ₹1,26,000 के डेमरेज चार्ज (देरी-शुल्क) को घटाने के बदले ₹60,000 की रिश्वत माँगी थी। यह शुल्क तब लगाया गया था जब कंपनी निर्धारित समय के भीतर एक रैक से कच्चा माल नहीं उतार सकी थी।

सीबीआई का जाल और गिरफ्तारी

बातचीत के दौरान आरोपी ने डेमरेज की राशि कम करने के बदले ₹7,200 नकद रिश्वत और घटाए गए डेमरेज के रूप में ₹37,800 लेने पर सहमति जताई। शिकायत मिलते ही सीबीआई ने जाल बिछाया और दुर्गेश बहादुर सिंह को ₹7,200 की रिश्वत स्वीकार करते हुए रंगे हाथों दबोच लिया। जाँच पूरी होने के बाद 30 नवंबर 2017 को आरोपी के विरुद्ध चार्जशीट दाखिल की गई, और लंबे ट्रायल के बाद अदालत ने दोष सिद्ध करते हुए सज़ा सुनाई।

वाराणसी में भी रेलवे अधिकारी रंगे हाथों पकड़ा गया

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सीबीआई ने उत्तर प्रदेश के वाराणसी में नॉर्थ ईस्टर्न रेलवे (एनईआर) के एक वरिष्ठ मंडल सामग्री प्रबंधक को ₹1.70 लाख की रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया है। गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) पर पंजीकृत एक निजी फर्म के मालिक की शिकायत के आधार पर 23 जुलाई 2026 को मामला दर्ज किया गया था।

शिकायत के अनुसार, उक्त फर्म ने फरवरी से जून 2026 के बीच एनईआर, वाराणसी के कार्यालय को ₹9.47 लाख का फर्नीचर आपूर्ति किया था, किंतु भुगतान का केवल एक हिस्सा ही मिला। आरोप है कि रेलवे अधिकारी ने 15 जुलाई को रुके हुए भुगतान को प्रोसेस करने और भविष्य के अनुबंधों में सहायता के बदले ₹1.70 लाख की रिश्वत माँगी। अधिकारियों के अनुसार, आरोपी ने शिकायतकर्ता को यह भी धमकी दी थी कि रिश्वत न देने पर भविष्य में कोई अनुबंध नहीं मिलेगा। सीबीआई ने 23 जुलाई को जाल बिछाकर अधिकारी को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया।

आम जनता और व्यापारियों पर असर

रेलवे में भ्रष्टाचार के ये मामले छोटे और मझोले व्यापारियों को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं, जो माल ढुलाई और सरकारी आपूर्ति के लिए रेलवे तंत्र पर निर्भर हैं। गौरतलब है कि डेमरेज जैसे शुल्कों की मनमानी व्याख्या और भुगतान में जानबूझकर देरी भ्रष्टाचार के सामान्य माध्यम बन चुके हैं। सीबीआई की सक्रियता इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की दिशा में एक संकेत है।

आगे क्या होगा

वाराणसी मामले में जाँच जारी है और सीबीआई आगे की कार्रवाई करेगी। लखनऊ मामले में दोषसिद्धि यह स्पष्ट करती है कि रेलवे कर्मचारियों द्वारा पद का दुरुपयोग कर रिश्वत लेने पर न्यायालय कड़ा रुख अपना रहे हैं। भविष्य में इस तरह के मामलों में त्वरित ट्रायल और सख्त सज़ा भ्रष्टाचार पर प्रभावी निरोधक साबित हो सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह भी उजागर करता है कि 2017 में दर्ज मामले को दोषसिद्धि तक पहुँचने में लगभग नौ साल लगे — जो न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति का प्रतीक है। रेलवे में डेमरेज और भुगतान-प्रसंस्करण जैसे नियमित प्रशासनिक कार्य बार-बार भ्रष्टाचार के माध्यम बनते हैं, जो प्रणालीगत खामी की ओर इशारा करते हैं। वाराणसी में उसी सप्ताह हुई गिरफ्तारी यह दर्शाती है कि यह कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक पैटर्न है। GeM जैसे पारदर्शी प्लेटफॉर्म के बावजूद भुगतान रोककर रिश्वत माँगना यह सिद्ध करता है कि डिजिटल सुधार अकेले भ्रष्टाचार की संस्कृति को नहीं बदल सकते — जब तक जवाबदेही और त्वरित न्याय सुनिश्चित न हो।
RashtraPress
31 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लखनऊ सीबीआई कोर्ट ने रेलवे गुड्स क्लर्क को किस मामले में सज़ा सुनाई?
लखनऊ की सीबीआई विशेष अदालत ने दुर्गेश बहादुर सिंह को ₹7,200 की रिश्वत लेने के मामले में दोषी ठहराते हुए 4 साल की जेल और ₹10,000 जुर्माने की सज़ा सुनाई। सिंह रायबरेली के दरियापुर जंक्शन रेलवे स्टेशन पर गुड्स क्लर्क थे और उन्होंने ₹1,26,000 के डेमरेज चार्ज को घटाने के बदले रिश्वत माँगी थी।
सीबीआई ने यह मामला कब और कैसे दर्ज किया?
सीबीआई ने 13 अक्टूबर 2017 को मैसर्स आरडी सीमेंट इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक की शिकायत पर मामला दर्ज किया। इसके बाद जाल बिछाकर आरोपी को ₹7,200 की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया और 30 नवंबर 2017 को चार्जशीट दाखिल की।
डेमरेज चार्ज क्या होता है और इस मामले में यह कैसे जुड़ा?
डेमरेज चार्ज वह शुल्क है जो रेलवे तब लगाता है जब कोई कंपनी निर्धारित समय में माल की लोडिंग या अनलोडिंग नहीं कर पाती। इस मामले में आरडी सीमेंट इंडस्ट्रीज पर ₹1,26,000 का डेमरेज लगाया गया था, जिसे घटाने के बदले आरोपी क्लर्क ने रिश्वत माँगी।
वाराणसी में सीबीआई ने किस रेलवे अधिकारी को गिरफ्तार किया?
सीबीआई ने 23 जुलाई 2026 को वाराणसी में नॉर्थ ईस्टर्न रेलवे (एनईआर) के वरिष्ठ मंडल सामग्री प्रबंधक को ₹1.70 लाख की रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया। आरोप है कि अधिकारी ने GeM पर पंजीकृत एक फर्म के ₹9.47 लाख के फर्नीचर आपूर्ति का भुगतान रोककर रिश्वत माँगी और भविष्य में अनुबंध न देने की धमकी दी।
रेलवे में भ्रष्टाचार के इन मामलों का आम व्यापारियों पर क्या असर पड़ता है?
माल ढुलाई और सरकारी आपूर्ति के लिए रेलवे पर निर्भर छोटे और मझोले व्यापारी इन मामलों से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। डेमरेज की मनमानी व्याख्या और भुगतान में जानबूझकर देरी भ्रष्टाचार के सामान्य माध्यम बन चुके हैं, जो व्यापार की लागत बढ़ाते हैं और छोटे उद्यमियों को आर्थिक नुकसान पहुँचाते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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