लखनऊ सीबीआई कोर्ट ने रेलवे गुड्स क्लर्क को रिश्वत मामले में सुनाई 4 साल की सजा, ₹10,000 जुर्माना
सारांश
मुख्य बातें
लखनऊ की सीबीआई विशेष अदालत ने 30 जुलाई 2026 को रिश्वत मामले में दुर्गेश बहादुर सिंह को दोषी करार देते हुए चार साल के कारावास और ₹10,000 के जुर्माने की सज़ा सुनाई। सिंह रायबरेली के दरियापुर जंक्शन रेलवे स्टेशन पर गुड्स क्लर्क के पद पर तैनात थे, जब उन्हें रंगे हाथों गिरफ्तार किया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) ने 13 अक्टूबर 2017 को मैसर्स आरडी सीमेंट इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड, लखनऊ के निदेशक की शिकायत पर यह मामला दर्ज किया था। शिकायत के अनुसार, आरोपी गुड्स क्लर्क ने कंपनी पर लगाए गए ₹1,26,000 के डेमरेज चार्ज (देरी-शुल्क) को घटाने के बदले ₹60,000 की रिश्वत माँगी थी। यह शुल्क तब लगाया गया था जब कंपनी निर्धारित समय के भीतर एक रैक से कच्चा माल नहीं उतार सकी थी।
सीबीआई का जाल और गिरफ्तारी
बातचीत के दौरान आरोपी ने डेमरेज की राशि कम करने के बदले ₹7,200 नकद रिश्वत और घटाए गए डेमरेज के रूप में ₹37,800 लेने पर सहमति जताई। शिकायत मिलते ही सीबीआई ने जाल बिछाया और दुर्गेश बहादुर सिंह को ₹7,200 की रिश्वत स्वीकार करते हुए रंगे हाथों दबोच लिया। जाँच पूरी होने के बाद 30 नवंबर 2017 को आरोपी के विरुद्ध चार्जशीट दाखिल की गई, और लंबे ट्रायल के बाद अदालत ने दोष सिद्ध करते हुए सज़ा सुनाई।
वाराणसी में भी रेलवे अधिकारी रंगे हाथों पकड़ा गया
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सीबीआई ने उत्तर प्रदेश के वाराणसी में नॉर्थ ईस्टर्न रेलवे (एनईआर) के एक वरिष्ठ मंडल सामग्री प्रबंधक को ₹1.70 लाख की रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया है। गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) पर पंजीकृत एक निजी फर्म के मालिक की शिकायत के आधार पर 23 जुलाई 2026 को मामला दर्ज किया गया था।
शिकायत के अनुसार, उक्त फर्म ने फरवरी से जून 2026 के बीच एनईआर, वाराणसी के कार्यालय को ₹9.47 लाख का फर्नीचर आपूर्ति किया था, किंतु भुगतान का केवल एक हिस्सा ही मिला। आरोप है कि रेलवे अधिकारी ने 15 जुलाई को रुके हुए भुगतान को प्रोसेस करने और भविष्य के अनुबंधों में सहायता के बदले ₹1.70 लाख की रिश्वत माँगी। अधिकारियों के अनुसार, आरोपी ने शिकायतकर्ता को यह भी धमकी दी थी कि रिश्वत न देने पर भविष्य में कोई अनुबंध नहीं मिलेगा। सीबीआई ने 23 जुलाई को जाल बिछाकर अधिकारी को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया।
आम जनता और व्यापारियों पर असर
रेलवे में भ्रष्टाचार के ये मामले छोटे और मझोले व्यापारियों को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं, जो माल ढुलाई और सरकारी आपूर्ति के लिए रेलवे तंत्र पर निर्भर हैं। गौरतलब है कि डेमरेज जैसे शुल्कों की मनमानी व्याख्या और भुगतान में जानबूझकर देरी भ्रष्टाचार के सामान्य माध्यम बन चुके हैं। सीबीआई की सक्रियता इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की दिशा में एक संकेत है।
आगे क्या होगा
वाराणसी मामले में जाँच जारी है और सीबीआई आगे की कार्रवाई करेगी। लखनऊ मामले में दोषसिद्धि यह स्पष्ट करती है कि रेलवे कर्मचारियों द्वारा पद का दुरुपयोग कर रिश्वत लेने पर न्यायालय कड़ा रुख अपना रहे हैं। भविष्य में इस तरह के मामलों में त्वरित ट्रायल और सख्त सज़ा भ्रष्टाचार पर प्रभावी निरोधक साबित हो सकती है।