चेन्नई ऑटो चालकों की कैंडललाइट मार्च: 2013 से नहीं बदला किराया, मोहम्मद इब्राहिम की मौत ने भड़काया आक्रोश
सारांश
मुख्य बातें
चेन्नई में फेडरेशन ऑफ ऑल ऑटो ट्रेड यूनियंस ने मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 की शाम एग्मोर से फोर्ट सेंट जॉर्ज तक कैंडललाइट मार्च आयोजित किया, जिसमें ऑटो-रिक्शा किराए में तत्काल संशोधन और चालकों की दीर्घकालिक समस्याओं पर सरकारी कार्रवाई की माँग की गई। यह विरोध मार्च व्यासार्पडी के 61 वर्षीय चालक मोहम्मद इब्राहिम की त्रासद मृत्यु की पृष्ठभूमि में निकाला गया, जिन्होंने आत्महत्या से पूर्व एक वीडियो जारी कर मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय से किराया बढ़ाने की अपील की थी।
13 साल से जस-का-तस किराया ढाँचा
फेडरेशन के समन्वयक एस. बालासुब्रमण्यम ने बताया कि तमिलनाडु सरकार ने ऑटो-रिक्शा किराए में आखिरी बार 2013 में संशोधन किया था। तब से ईंधन की कीमतें, बीमा प्रीमियम और स्पेयर पार्ट्स की लागत में भारी वृद्धि के बावजूद चालक उसी पुरानी किराया संरचना पर काम करने को मजबूर हैं।
बालासुब्रमण्यम ने यह भी आरोप लगाया कि पूर्व के किराया संशोधनों के दौरान मीटर लागू करने को लेकर चालकों को क्षेत्रीय परिवहन अधिकारियों और पुलिस द्वारा कथित उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था। फेडरेशन के अनुसार, इस प्रशासनिक दबाव ने चालकों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
ऐप-आधारित सेवाओं से बढ़ती असमानता
ओला, उबर और रैपिडो जैसे ऐप-आधारित एग्रीगेटर सर्ज प्राइसिंग के ज़रिये मनमाना किराया वसूल पाते हैं, जबकि परंपरागत ऑटो-रिक्शा चालक सरकार द्वारा निर्धारित सीमा में बँधे हैं। फेडरेशन के अनुसार यह असमानता व्यक्तिगत ऑपरेटरों को सीधे नुकसान पहुँचा रही है।
इसके अतिरिक्त, चेन्नई मेट्रो रेल के विस्तार, महिलाओं के लिए मुफ़्त बस यात्रा और बाइक-टैक्सी सेवाओं के प्रसार ने ऑटो-रिक्शा सवारियों की माँग को उल्लेखनीय रूप से प्रभावित किया है। यूनियनों का कहना है कि इन बदलावों ने चालकों की आय पर गहरी चोट की है।
चालकों पर आर्थिक और प्रशासनिक बोझ
यूनियनों के अनुसार बढ़ते घरेलू खर्च, चिकित्सा बिल और फिटनेस प्रमाण पत्र प्राप्त करने में देरी ने इस पेशे को आर्थिक रूप से अव्यावहारिक बना दिया है। फेडरेशन ने बताया कि परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में चालक यह पेशा छोड़कर अन्य रोज़गार की तलाश में चले गए हैं।
यह ऐसे समय में आया है जब शहरी परिवहन क्षेत्र में अनौपचारिक श्रमिकों की आजीविका सुरक्षा राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन रही है। गौरतलब है कि मोहम्मद इब्राहिम का मामला इस व्यापक संकट का एक दुखद प्रतीक बन गया है।
फेडरेशन की प्रमुख माँगें
फेडरेशन ने सरकार के समक्ष कई माँगें रखी हैं — मीटर के अनुरूप संशोधित किराया, ऑटो-रिक्शा के लिए सरकार समर्थित मोबाइल ऐप्लिकेशन, बाइक-टैक्सी सेवाओं का विनियमन या प्रतिबंध, और क्षेत्रीय परिवहन कार्यालयों में कथित भ्रष्टाचार पर अंकुश। संगठन ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने शीघ्र कदम नहीं उठाए तो चालकों और उनके परिवारों की तकलीफें और गहरी होती जाएँगी।
आगे क्या होगा
फेडरेशन ने राज्य सरकार से तत्काल वार्ता बुलाने की माँग की है। यदि सरकार ने इन माँगों पर ध्यान नहीं दिया, तो यूनियन और बड़े विरोध प्रदर्शनों का संकेत दे रही है। चेन्नई में लाखों परिवारों की आजीविका से जुड़े इस मुद्दे पर राज्य सरकार की प्रतिक्रिया का इंतज़ार है।