चुनाव आयोग के नोटिस पर कांग्रेस का पलटवार: खड़गे मामले में विसंगतियां उजागर, मांगा एक हफ्ते का समय
सारांश
Key Takeaways
- कांग्रेस ने 23 अप्रैल 2026 को चुनाव आयोग को पत्र लिखकर मल्लिकार्जुन खड़गे को भेजे नोटिसों में गंभीर विसंगतियां उजागर कीं।
- आयोग ने एक ही संदर्भ संख्या एफआईआर नंबर 437/TN-LA/2026/SS-I पर दो अलग-अलग नोटिस जारी किए, जिन पर अलग-अलग अधिकारियों के हस्ताक्षर हैं।
- तृणमूल कांग्रेस नेता डेरेक ओ'ब्रायन की शिकायत का नाम एक नोटिस में है, जबकि आयोग की वेबसाइट पर अपलोड दूसरे नोटिस में यह नाम हटा दिया गया।
- कांग्रेस ने 24 घंटे की समय-सीमा को अपर्याप्त बताते हुए एक सप्ताह का समय और वरिष्ठ प्रतिनिधिमंडल की सुनवाई की मांग की।
- पार्टी ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री अमित शाह के बयानों को जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 123 के तहत उल्लंघन बताया, लेकिन आयोग की निष्क्रियता पर सवाल उठाया।
- कांग्रेस ने आरोप लगाया कि खड़गे का स्पष्टीकरण सार्वजनिक डोमेन में होने के बावजूद आयोग ने उसे जानबूझकर नजरअंदाज किया।
नई दिल्ली, 23 अप्रैल 2026। कांग्रेस पार्टी ने भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) को कड़ा पत्र लिखकर पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को जारी किए गए कारण बताओ नोटिसों में गंभीर विसंगतियों की ओर ध्यान दिलाया है। पार्टी ने आरोप लगाया कि आयोग ने एक ही संदर्भ संख्या पर दो अलग-अलग नोटिस जारी किए, जिनमें शिकायतकर्ता का नाम तक अलग-अलग है — और यह प्रक्रिया प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन करती है।
दो नोटिस, एक नंबर — कांग्रेस ने उठाए तीखे सवाल
एआईसीसी महासचिव (संचार) जयराम रमेश द्वारा भेजे गए पत्र में बताया गया कि पार्टी को 22 अप्रैल 2026 की तारीख वाले दो नोटिस प्राप्त हुए, जिन दोनों पर एक ही संदर्भ संख्या एफआईआर नंबर 437/TN-LA/2026/SS-I (MCC शिकायत) दर्ज है, लेकिन दोनों पर आयोग के अलग-अलग अधिकारियों के हस्ताक्षर हैं।
पहले नोटिस में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरेक ओ'ब्रायन की 21 अप्रैल 2026 की शिकायत का उल्लेख है। वहीं, ईसीआई की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड किए गए दूसरे नोटिस से शिकायतकर्ता का नाम ही हटा दिया गया है। कांग्रेस ने इसे "लापरवाह" और "संदिग्ध" प्रक्रिया करार दिया।
24 घंटे की समय-सीमा पर कड़ी आपत्ति
कांग्रेस ने जवाब देने के लिए दी गई 24 घंटे की समय-सीमा को पूरी तरह अपर्याप्त बताया। पार्टी का तर्क है कि जब देश के कई राज्यों में चुनाव प्रचार अपने चरम पर हो, तब इतने कम समय में किसी भी कानूनी और तथ्यात्मक जवाब की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं है।
पार्टी ने आयोग से एक सप्ताह का अतिरिक्त समय देने और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के प्रतिनिधिमंडल को व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दिए जाने की मांग की है।
खड़गे के बयान का बचाव — संदर्भ से काटकर देखने का आरोप
जिन टिप्पणियों के आधार पर नोटिस जारी हुआ, उनके बारे में कांग्रेस ने कहा कि खड़गे पहले ही सार्वजनिक स्पष्टीकरण दे चुके हैं। उन्होंने साफ किया था कि उनके शब्द ईडी, आईटी और सीबीआई जैसी जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली के संदर्भ में थे, न कि प्रधानमंत्री के विरुद्ध कोई व्यक्तिगत टिप्पणी।
पार्टी ने आरोप लगाया कि यह स्पष्टीकरण सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध होने के बावजूद आयोग ने इसे जानबूझकर नजरअंदाज किया। पत्र में लिखा गया, "ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस अध्यक्ष के खिलाफ किसी न किसी तरह कार्रवाई करने के लिए स्पष्ट स्पष्टीकरण को जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा है — इसमें छिपे मकसद की बू आती है।"
भाजपा और सत्ताधारी दलों की शिकायतों पर भी उठाए सवाल
कांग्रेस ने अपने जवाब में दो ऐसी घटनाओं का उल्लेख किया जिन्हें उसने आदर्श आचार संहिता (एमसीसी) का उल्लंघन बताया। पहला — 131वां संविधान संशोधन पारित न हो पाने के बाद प्रधानमंत्री के एक भाषण में कांग्रेस को निशाना बनाने वाली टिप्पणियां, जो कई राज्यों में चुनावों से ठीक पहले दी गईं।
दूसरा — गृह मंत्री अमित शाह का एक बयान जिसे भाजपा के आधिकारिक सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया। कांग्रेस ने इसे "लेन-देन वाला वादा" बताया और दावा किया कि यह जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123 के तहत "अनुचित प्रभाव" और "रिश्वतखोरी" की श्रेणी में आता है।
पार्टी ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि ये मामले आयोग की नजर से "छूट" गए, जबकि विपक्ष के खिलाफ त्वरित कार्रवाई शुरू कर दी गई।
विश्लेषण: चुनावी मौसम में विपक्ष और आयोग का टकराव
यह पूरा विवाद उस व्यापक राजनीतिक पैटर्न की ओर इशारा करता है जहां चुनावी मौसम में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठना नई बात नहीं है। गौरतलब है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने आयोग पर एकतरफा कार्रवाई का आरोप लगाया था।
इस बार तृणमूल कांग्रेस के एक नेता की शिकायत पर कांग्रेस अध्यक्ष को नोटिस भेजा जाना — जबकि दोनों दल विपक्ष में हैं — इस मामले को और जटिल बनाता है। एक ही नोटिस संख्या पर दो अलग-अलग दस्तावेजों का अस्तित्व प्रशासनिक लापरवाही की ओर संकेत करता है, जो आयोग की विश्वसनीयता के लिए भी चिंताजनक है।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चुनाव आयोग इन विसंगतियों पर क्या स्पष्टीकरण देता है, क्या वह कांग्रेस को अतिरिक्त समय और सुनवाई का अवसर देता है, और क्या पीएम व गृह मंत्री के खिलाफ दर्ज शिकायतों पर भी कोई कार्रवाई होती है।