15 अक्टूबर 2026
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सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में धर्मांतरित मुसलमानों का आरक्षण रद्द किया, भाजपा ने किया स्वागत

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सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में धर्मांतरित मुसलमानों का आरक्षण रद्द किया, भाजपा ने किया स्वागत

सारांश

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में धर्म परिवर्तन के बाद मुस्लिम पिछड़ा वर्ग श्रेणी में आरक्षण देने वाले सरकारी आदेश को असंवैधानिक ठहराया। अदालत ने कहा — धर्म बदलने पर आरक्षण का अधिकार स्वतः नहीं चलता। भाजपा ने फैसले का खुलकर स्वागत किया, जबकि मामला आरक्षण की संवैधानिक सीमाओं पर बड़ी बहस छेड़ गया है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 15 अक्टूबर 2026 को तमिलनाडु में धर्मांतरित मुसलमानों के आरक्षण लाभ को रद्द करने का मद्रास उच्च न्यायालय का फैसला बरकरार रखा।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति वी.
चंद्रशेखर की पीठ ने तमिलनाडु सरकार की एसएलपी खारिज की।
अदालत ने कहा — धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण का लाभ स्वतः किसी व्यक्ति के साथ नहीं जाता।
तमिलनाडु का विवादित सरकारी आदेश 9 मार्च 2024 को मद्रास हाईकोर्ट ने पहले ही रद्द किया था।
भाजपा प्रवक्ताओं अजय आलोक और राकेश त्रिपाठी ने फैसले का स्वागत किया; UP मंत्री दानिश अंसारी ने इसे 'सर्वमान्य' बताया।

सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 को तमिलनाडु में धर्म परिवर्तन कर इस्लाम अपनाने वाले व्यक्तियों को दिए जाने वाले आरक्षण लाभ को रद्द करने के मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति वी. चंद्रशेखर की पीठ ने तमिलनाडु सरकार की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन के बाद कोई व्यक्ति स्वतः आरक्षण का लाभ अपने साथ नहीं ले जा सकता। इस फैसले के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर तेज हो गया है।

मामले की पृष्ठभूमि

दरअसल, तमिलनाडु सरकार ने एक सरकारी आदेश जारी किया था जिसमें पिछड़े वर्गों, अतिपिछड़े वर्गों, विमुक्त समुदायों और अनुसूचित जातियों के उन लोगों को पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) के तहत आरक्षण का लाभ देने की अनुमति दी गई थी, जिन्होंने इस्लाम अपना लिया था। मद्रास उच्च न्यायालय ने 9 मार्च 2024 को इस सरकारी आदेश को रद्द कर दिया था। तमिलनाडु सरकार ने इस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी, जिसे अदालत ने अब अस्वीकार कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट का संवैधानिक आधार

सर्वोच्च न्यायालय ने संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर अपना निर्णय सुनाया। अदालत ने कहा कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था में पिछड़े वर्ग या अनुसूचित जाति से संबंधित कोई व्यक्ति यदि धर्म परिवर्तन कर किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो वह आरक्षण का लाभ स्वतः अपने साथ नहीं ले जा सकता। गौरतलब है कि यह निर्णय भारतीय संविधान में आरक्षण के मूल आधार — छुआछूत और सामाजिक भेदभाव — से जुड़े सिद्धांतों पर टिका है।

भाजपा की प्रतिक्रिया

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय प्रवक्ता अजय आलोक ने कहा, 'मैं इस फैसले के लिए सुप्रीम कोर्ट और उसके पहले मद्रास हाईकोर्ट की खुले शब्दों से प्रशंसा करता हूं। इस पर और स्पष्टता होनी चाहिए कि ये आरक्षण का लाभ कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका तीनों जगह हर स्तर पर लागू हो।' उन्होंने इसे देश के लिए आवश्यक बताया।

भाजपा प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने संविधान सभा की बहस का हवाला देते हुए कहा, 'जो लोग भी आरक्षण की बात करते हैं, उन्हें संविधान सभा की उस बहस को पढ़ना चाहिए जिसमें बताया गया है कि भारतीय संविधान में आरक्षण का प्रावधान कैसे आया। इसका आधार छुआछूत था।' त्रिपाठी ने आरोप लगाया कि कुछ दल वोट बैंक की राजनीति के चलते धर्म परिवर्तन के बाद भी आरक्षण जारी रखने का समर्थन करते हैं।

अन्य राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ

उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री दानिश अंसारी ने कहा, 'हम सभी एकता और विश्वास के साथ देश को आगे लेकर जाएं, यही हमारा प्रयास होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला है, वह सर्वमान्य है।' यह ऐसे समय में आया है जब आरक्षण की संवैधानिक सीमाओं और धर्म परिवर्तन से जुड़े सवाल राष्ट्रीय विमर्श में तेज़ी से उभर रहे हैं।

आगे क्या होगा

सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद तमिलनाडु में प्रभावित समुदायों की कानूनी स्थिति पर असर पड़ेगा। यह फैसला भविष्य में अन्य राज्यों में समान प्रावधानों को चुनौती देने के मामलों में मिसाल बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय आरक्षण की संवैधानिक संरचना और धर्म के बीच संबंध पर व्यापक बहस को और गहरा करेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन मुख्यधारा की कवरेज जो अनदेखा करती है वह यह है कि प्रभावित समुदायों के हज़ारों लोगों की शैक्षणिक और रोज़गार स्थिति पर इसका तात्कालिक असर क्या होगा — इसका उत्तर अभी किसी के पास नहीं है।
RashtraPress
15 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में धर्मांतरित मुसलमानों के आरक्षण पर क्या फैसला दिया?
सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार की वह याचिका खारिज कर दी जिसमें मद्रास उच्च न्यायालय के उस निर्णय को चुनौती दी गई थी जिसने धर्म परिवर्तन कर इस्लाम अपनाने वाले व्यक्तियों को पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) श्रेणी में आरक्षण देने वाले सरकारी आदेश को रद्द किया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि धर्म बदलने के बाद आरक्षण का लाभ स्वतः व्यक्ति के साथ नहीं जाता।
तमिलनाडु सरकार का वह सरकारी आदेश क्या था जिसे रद्द किया गया?
तमिलनाडु सरकार ने एक आदेश जारी किया था जिसमें पिछड़े वर्गों, अतिपिछड़े वर्गों, विमुक्त समुदायों और अनुसूचित जातियों के उन लोगों को पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) के तहत आरक्षण देने की अनुमति दी गई थी जिन्होंने इस्लाम अपना लिया था। मद्रास उच्च न्यायालय ने 9 मार्च 2024 को इस आदेश को पहले ही रद्द कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले का क्या संवैधानिक आधार दिया?
अदालत ने कहा कि भारतीय संविधान में आरक्षण का प्रावधान हिंदू सामाजिक व्यवस्था में छुआछूत और सामाजिक भेदभाव के आधार पर किया गया था। धर्म परिवर्तन करने पर व्यक्ति उस सामाजिक संरचना से बाहर हो जाता है, इसलिए आरक्षण का लाभ स्वतः जारी नहीं रह सकता।
भाजपा ने इस फैसले पर क्या प्रतिक्रिया दी?
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता अजय आलोक ने सुप्रीम कोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट दोनों की प्रशंसा की और कहा कि आरक्षण लाभ कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका तीनों स्तरों पर स्पष्टता से लागू होना चाहिए। भाजपा प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने इसे वोट बैंक की राजनीति से जोड़ते हुए संविधान सभा की बहस का हवाला दिया।
इस फैसले का भविष्य में क्या असर पड़ेगा?
यह निर्णय अन्य राज्यों में समान प्रावधानों को चुनौती देने वाले मामलों में कानूनी मिसाल बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला आरक्षण की संवैधानिक संरचना और धर्म के बीच संबंध पर व्यापक राष्ट्रीय बहस को और गहरा करेगा।
राष्ट्र प्रेस
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