एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मुस्लिम नेताओं ने किया स्वागत, बोले — चुनावी प्रक्रिया पर आपत्ति का कोई आधार नहीं
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को संवैधानिक रूप से वैध ठहराए जाने के बाद लखनऊ में इस्लामिक धर्मगुरुओं और मुस्लिम संगठनों के नेताओं ने बुधवार, 27 मई को इस फैसले का खुलकर स्वागत किया। नेताओं ने एकस्वर में कहा कि अब चुनावी प्रक्रिया पर किसी को भी आपत्ति जताने का कोई आधार शेष नहीं रहा।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा की गई एसआईआर प्रक्रिया ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA) 1950 के किसी भी प्रावधान या उसके तहत बनाए गए नियमों का उल्लंघन नहीं किया है। खंडपीठ ने यह भी माना कि चुनाव आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत — जिसे RPA की धारा 21(3) के साथ पढ़ा जाए — इस प्रकार का पुनरीक्षण कराने के लिए पूर्णतः अधिकृत है।
मुस्लिम धर्मगुरुओं की प्रतिक्रिया
ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि चुनाव आयोग द्वारा हाल ही में असम, पश्चिम बंगाल, पुडुचेरी, केरल और तमिलनाडु में कराए गए विधानसभा चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष रहे हैं। उन्होंने कहा, 'इसमें भारत निर्वाचन आयोग की ओर से किसी भी तरह की गड़बड़ी का कोई सवाल ही नहीं उठता। किसी को भी इस पर आपत्ति करने का कोई आधार नहीं है।'
मौलाना बरेलवी के अनुसार, स्वच्छ और स्पष्ट मतदाता सूची तैयार करने के लिए एसआईआर आवश्यक है, क्योंकि ऐसे अनेक मतदाता हैं जो या तो दिवंगत हो चुके हैं या अन्यत्र स्थानांतरित हो गए हैं।
शिया पर्सनल लॉ बोर्ड का रुख
ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना मिर्जा मोहम्मद यासूब अब्बास ने कहा कि देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले पर अब किसी को उंगली उठाने की आवश्यकता नहीं है। उनके शब्दों में, 'जब यह मामला विवादित हुआ तो सुप्रीम कोर्ट में गया। कोर्ट ने अब इसकी वैधता को सही ठहराया है।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर आपत्ति उठाना वस्तुतः देश की न्यायिक व्यवस्था पर ही प्रश्नचिह्न लगाना होगा।
एसआईआर की आवश्यकता और संदर्भ
गौरतलब है कि एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची से मृत, स्थानांतरित या दोहरे नामांकित मतदाताओं को हटाकर चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता सुनिश्चित करना है। यह प्रक्रिया तब विवाद में आई जब कुछ राजनीतिक दलों ने इस पर आपत्ति जताते हुए इसे न्यायालय में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने उन आशंकाओं को निराधार करार दिया है।
आगे क्या
सर्वोच्च न्यायालय की इस स्वीकृति के बाद भारत निर्वाचन आयोग एसआईआर की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की स्थिति में है। मुस्लिम धार्मिक नेताओं की सकारात्मक प्रतिक्रिया इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है, क्योंकि एसआईआर को लेकर अल्पसंख्यक समुदायों में भी कुछ आशंकाएँ व्यक्त की जा रही थीं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला आगामी चुनावों में मतदाता सूची की विश्वसनीयता को और मजबूत करने का आधार बनेगा।