30 जुलाई 2026
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करूर भगदड़: मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती

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करूर भगदड़: मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती

सारांश

करूर भगदड़ के पीड़ितों के परिजनों को अनुकंपा नियुक्ति देने का तमिलनाडु सरकार का फैसला कानूनी पेच में फँस गया है। मद्रास हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताया, अब राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी लेकर पहुँची है। फैसला तय करेगा कि सार्वजनिक त्रासदियों में राज्य की राहत की संवैधानिक सीमा कहाँ तक है।

मुख्य बातें

तमिलनाडु सरकार ने 30 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दाखिल की।
मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने 27 जुलाई को करूर भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को दी गई अनुकंपा नियुक्तियों को असंवैधानिक करार दिया था।
खंडपीठ ने कहा कि इससे संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन होता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति केवल सेवाकाल में मृत सरकारी कर्मचारी के परिजनों के लिए है, न कि सार्वजनिक त्रासदी के पीड़ितों के लिए।
यह भगदड़ सितंबर 2025 में करूर, तमिलनाडु में हुई थी, जिसमें कई लोगों की मौत हुई थी।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला भविष्य में राज्यों द्वारा त्रासदी-राहत के स्वरूप को परिभाषित करेगा।

तमिलनाडु सरकार ने सितंबर 2025 में करूर भगदड़ में मारे गए लोगों के परिजनों को दी गई अनुकंपा नियुक्तियों को असंवैधानिक ठहराने वाले मद्रास हाईकोर्ट के आदेश के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। राज्य सरकार ने 30 जुलाई को मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ के फैसले के खिलाफ विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दाखिल की है।

मद्रास हाईकोर्ट का फैसला

27 जुलाई को न्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति आर. शक्तिवेल की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि कार्यकारी विवेकाधिकार के आधार पर इस प्रकार की अनुकंपा नियुक्तियाँ नहीं दी जा सकतीं, क्योंकि इससे संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 16 के तहत सार्वजनिक रोजगार में समानता और समान अवसर की गारंटी का उल्लंघन होता है। खंडपीठ ने यह भी कहा कि राज्य सरकार ने अनुच्छेद 162 के अंतर्गत अपनी कार्यकारी शक्तियों की सीमा का अतिक्रमण किया है।

अदालत ने टिप्पणी की, 'कार्यकारी शक्ति का प्रयोग संवैधानिक सीमाओं के भीतर होना चाहिए। अगर कार्यकारी कार्रवाई को खुली छूट दे दी जाए तो अराजकता फैल जाएगी।'

अनुकंपा नियुक्ति की कानूनी सीमा

हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत आदेश में स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति का मूल उद्देश्य किसी सरकारी कर्मचारी की सेवाकाल के दौरान मृत्यु होने पर उसके परिवार को तत्काल आर्थिक सहारा देना है। इसे किसी सार्वजनिक त्रासदी के बाद सामान्य पुनर्वास उपाय के रूप में लागू नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को इस प्रकार नियुक्ति देने से वे उन हजारों योग्य आवेदकों से आगे निकल जाएंगे जो पहले से अनुकंपा नियुक्ति की प्रतीक्षा सूची में हैं।

राज्य सरकार का पक्ष

तमिलनाडु सरकार ने हाईकोर्ट के इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए एसएलपी दाखिल की है। सरकार का तर्क है कि भगदड़ जैसी असाधारण सार्वजनिक त्रासदी के पीड़ितों के परिजनों को राहत देना राज्य की नैतिक जिम्मेदारी है। गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने स्वयं स्वीकार किया था कि सरकार पीड़ित परिवारों को वित्तीय सहायता या अन्य राहत उपाय प्रदान कर सकती है, परंतु भर्ती प्रक्रिया के संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करके सार्वजनिक रोजगार नहीं दे सकती।

पृष्ठभूमि: करूर भगदड़

यह विवाद सितंबर 2025 में करूर में हुई उस भगदड़ से उपजा है जिसमें कई लोगों की जान गई थी। घटना के बाद तमिलनाडु सरकार ने मृतकों के परिजनों को अनुकंपा नियुक्ति देने की घोषणा की थी, जिसे बाद में हाईकोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में सार्वजनिक आयोजनों में भीड़ प्रबंधन और त्रासदी के बाद राहत के स्वरूप पर गंभीर बहस चल रही है।

आगे क्या होगा

अब सर्वोच्च न्यायालय तमिलनाडु सरकार की एसएलपी पर सुनवाई करेगा और मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश की संवैधानिक वैधता की जाँच करेगा जिसमें अनुकंपा नियुक्तियों को रद्द किया गया था। इस मामले का फैसला देशभर में सार्वजनिक त्रासदियों के बाद राज्य सरकारों द्वारा दी जाने वाली राहत की प्रकृति और सीमाओं को परिभाषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह एक असहज सवाल भी उठाता है — क्या हमारा कानूनी ढाँचा सार्वजनिक त्रासदियों में राज्य की नैतिक जिम्मेदारी को पर्याप्त रूप से स्वीकार करता है? अनुकंपा नियुक्ति का दायरा सीमित रखना न्यायसंगत हो सकता है, परंतु इससे यह भी उजागर होता है कि भारत में आपदा-पश्चात पुनर्वास के लिए कोई सुस्पष्ट वैधानिक तंत्र नहीं है। तमिलनाडु सरकार की एसएलपी सुप्रीम कोर्ट को यह अवसर देती है कि वह राज्य की कार्यकारी शक्ति और संवैधानिक समानता के बीच की रेखा को स्पष्ट करे — एक ऐसा प्रश्न जो केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए प्रासंगिक है।
RashtraPress
30 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

करूर भगदड़ अनुकंपा नियुक्ति विवाद क्या है?
सितंबर 2025 में करूर में हुई भगदड़ में मारे गए लोगों के परिजनों को तमिलनाडु सरकार ने अनुकंपा नियुक्ति देने की घोषणा की थी। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने 27 जुलाई को इसे असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया, जिसके बाद राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुँची है।
मद्रास हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्तियाँ क्यों रद्द कीं?
हाईकोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति केवल सेवाकाल में मृत सरकारी कर्मचारी के परिजनों को दी जा सकती है। सार्वजनिक त्रासदी के पीड़ितों को इस आधार पर नियुक्ति देना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है और पहले से प्रतीक्षा सूची में मौजूद योग्य आवेदकों के साथ अन्याय है।
तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्या दाखिल किया है?
तमिलनाडु सरकार ने 30 जुलाई को मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ के 27 जुलाई के फैसले के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दाखिल की है। सुप्रीम कोर्ट अब इस एसएलपी पर सुनवाई करेगा।
क्या सरकार भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को कोई राहत दे सकती है?
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार पीड़ित परिजनों को वित्तीय सहायता या अन्य राहत उपाय दे सकती है, लेकिन सार्वजनिक रोजगार में संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करके अनुकंपा नियुक्ति नहीं दी जा सकती।
इस मामले का व्यापक कानूनी महत्व क्या है?
सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि सार्वजनिक त्रासदियों के बाद राज्य सरकारें अपनी कार्यकारी शक्तियों का किस हद तक उपयोग कर सकती हैं। यह निर्णय देशभर में आपदा-पश्चात पुनर्वास नीतियों के लिए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मिसाल स्थापित करेगा।
राष्ट्र प्रेस
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