14 अगस्त 2026
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करूर भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरी: सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर रोक हटाई

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करूर भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरी: सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर रोक हटाई

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने करूर भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने पर मद्रास हाईकोर्ट की रोक हटा दी। सितंबर 2025 की उस त्रासदी में 41 लोगों की जान गई थी। अब तमिलनाडु सरकार यह प्रक्रिया आगे बढ़ा सकेगी।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 14 अगस्त 2026 को मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगाई, जिससे करूर भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने का रास्ता साफ हुआ।
करूर भगदड़ सितंबर 2025 में TVK नेता विजय की रैली के दौरान हुई थी, जिसमें 41 लोगों की मौत हुई — इनमें 8 बच्चे शामिल थे — और 46 लोग घायल हुए।
मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने 27 जुलाई को सरकार के फैसले को असंवैधानिक बताते हुए रद्द किया था।
पीठ ने टिप्पणी की — 'त्रासदी के पीड़ितों को रोज़गार देने में दिक्कत क्या है?' — जो हाईकोर्ट के रुख से स्पष्ट असहमति दर्शाती है।
तमिलनाडु सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी और मुकुल रोहतगी पेश हुए।

सर्वोच्च न्यायालय ने 14 अगस्त 2026 को मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी, जिसमें करूर भगदड़ के पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने के तमिलनाडु सरकार के फैसले को रद्द किया गया था। इस फैसले से अब राज्य सरकार उन परिवारों को रोज़गार देने की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकेगी, जिन्होंने सितंबर 2025 की भगदड़ में अपने प्रियजन खोए थे।

मामले की पृष्ठभूमि

सितंबर 2025 में करूर में तमिलनाडु वेट्री कझगम (TVK) नेता और अभिनेता-राजनेता विजय की एक रैली के दौरान भयावह भगदड़ मच गई थी। अधिकारियों के अनुसार, विजय को दोपहर करीब 12 बजे पहुँचना था, लेकिन वे शाम 6 बजे के बाद पहुँचे। इस देरी के कारण करीब 30,000 समर्थक एकत्र हो गए, और अत्यधिक भीड़ के दबाव में भगदड़ मच गई। इस हादसे में 41 लोगों की मौत हुई, जिनमें 8 बच्चे शामिल थे, और 46 लोग घायल हुए।

हाईकोर्ट का आदेश और विवाद

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने 27 जुलाई को तमिलनाडु सरकार के उस फैसले को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था, जिसमें पीड़ित परिवारों को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी देने का प्रावधान किया गया था। हाईकोर्ट का तर्क था कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य सेवाकाल के दौरान किसी सरकारी कर्मचारी की मृत्यु होने पर उसके परिवार को तत्काल आर्थिक राहत देना है — इसे किसी सार्वजनिक त्रासदी के बाद सामान्य पुनर्वास उपाय के रूप में नहीं बढ़ाया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और टिप्पणी

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने तमिलनाडु सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए अंतरिम आदेश दिया। पीठ ने कहा, 'राज्य ने एक दुखद त्रासदी के बाद पीड़ित परिवारों को रोज़गार देने की पेशकश की थी। इसके खिलाफ चुनौती क्यों?' पीठ ने यह भी पूछा कि 'राज्य द्वारा त्रासदी के पीड़ितों को रोज़गार देने में दिक्कत क्या है?' — यह टिप्पणी हाईकोर्ट के रुख से स्पष्ट असहमति की ओर इशारा करती है।

सरकार का पक्ष

तमिलनाडु सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी और मुकुल रोहतगी पेश हुए। सरकार का तर्क था कि यह नियुक्ति विशुद्ध रूप से मानवीय आधार पर की गई थी और पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने की दिशा में उठाया गया कदम है।

आगे क्या होगा

सर्वोच्च न्यायालय के इस अंतरिम आदेश के बाद तमिलनाडु सरकार अब पीड़ित परिवारों को नौकरी देने की प्रक्रिया पुनः शुरू कर सकती है। यह मामला अब सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन रहेगा और अंतिम सुनवाई में यह तय होगा कि सार्वजनिक त्रासदी के पीड़ितों को अनुकंपा नियुक्ति के दायरे में लाया जा सकता है या नहीं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन मानवीय दृष्टिकोण से सरकार का कदम उचित जान पड़ता है। असली परीक्षा यह होगी कि सर्वोच्च न्यायालय अंतिम सुनवाई में इस नज़ीर को किस रूप में स्थापित करता है — क्योंकि इसका असर भविष्य में ऐसी तमाम त्रासदियों में पीड़ित परिवारों के अधिकारों पर पड़ेगा।
RashtraPress
14 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

करूर भगदड़ क्या थी और कब हुई?
करूर भगदड़ सितंबर 2025 में तमिलनाडु के करूर में TVK नेता और अभिनेता-राजनेता विजय की रैली के दौरान हुई थी। विजय के देरी से पहुँचने के कारण करीब 30,000 समर्थक एकत्र हो गए और भगदड़ में 41 लोगों की मौत हुई, जिनमें 8 बच्चे शामिल थे, तथा 46 लोग घायल हुए।
सुप्रीम कोर्ट ने 14 अगस्त को क्या आदेश दिया?
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच के 27 जुलाई के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी, जिसमें करूर भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने के तमिलनाडु सरकार के फैसले को रद्द किया गया था।
मद्रास हाईकोर्ट ने सरकार का फैसला क्यों रद्द किया था?
हाईकोर्ट का कहना था कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य केवल सेवाकाल के दौरान किसी सरकारी कर्मचारी की मृत्यु पर उसके परिवार को राहत देना है। अदालत ने इसे किसी सार्वजनिक त्रासदी के बाद सामान्य पुनर्वास उपाय के रूप में विस्तारित करने को असंवैधानिक बताया।
इस फैसले का पीड़ित परिवारों पर क्या असर होगा?
सर्वोच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश के बाद तमिलनाडु सरकार अब भगदड़ में मारे गए 41 लोगों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने की प्रक्रिया पुनः शुरू कर सकेगी। अंतिम निर्णय सर्वोच्च न्यायालय की अगली सुनवाई पर निर्भर करेगा।
इस मामले में तमिलनाडु सरकार की ओर से कौन पेश हुए?
तमिलनाडु सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी और मुकुल रोहतगी सर्वोच्च न्यायालय में पेश हुए। सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच के 27 जुलाई के आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।
राष्ट्र प्रेस
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